Pitthoo Ka Sach by @ityaadii

{Often reading a poem brings you to cry a little or smile a bit or meander a thought temporarily. But rarely does a poem lift you and transport you to childhood like it never ended. This poem not only does that but it also leaves you with a lasting souvenir – Peace. Truly elevating! A thought-provoking free flow poem by  @ityaadii }

Pitthoo Ka Sach

Link: http://khokhle-words.blogspot.ca/2014/02/pittoo.html

तमाम दुनिया का चक्कर लगा कर
सबसे जीत, खुद से हार कर
थके पांवों से जब मैं अपने शहर लौटा
तो ज़रा मायूस लौटा.
सच की तलाश में जो सफ़र था जिया
वो सफ़र आज घर लौट रहा था
सारी कायनात में खोजा जिस सच को
वो कहीं नहीं मिला
बादलों से रास्ते पूछे
पर्वतों से पते निकाले
वादियों की सरगोशियों में इसके किस्से सुने
मगर जो भी मिला, जितना भी मिला
कुछ उखड़ा उखड़ा सा मिला
झूठ की परतों पर परतें मिलीं
चेहरों पर गिले-शिकवे, झगडे और समझौते
गालों पर सूखे आंसुओं के निशाँ
आँखों में दर्द के साये पलते हुए मिले
कहीं सच नहीं मिला
कहीं ख़ुशी नहीं मिली
कहीं खुदा नहीं मिला
आज जब थक-हार कर
अपने घर के करीब पहुंचा
तब ध्यान मोहल्ले में खेलते हुए बच्चों पर गया
करीने से रखे हुए पिरामिड के आकर में पत्थर के ऊपर पत्थर
एक गेंद हवा में
लहराती हुई
उन छोटे पत्थरों से टकराती हुई
हवा में उछलते हुए पत्थर
कुछ बच्चे गेंद की ओर भागते हुए
तो कुछ बच्चे पत्थरों को वापिस जमाने की ताक में
“पिट्टू (pittoo) बना!”, “बॉल मार!”, का शोर
बच्चों का ध्यान खेल पर था
और मेरा बच्चों पर
इतनी शिद्दत से मैंने ज़िन्दगी में कभी कुछ नहीं चाहा था
जितनी शिद्दत से ये बच्चे पिट्टू बनाना चाह रहे थे
मानो उनकी दुनिया बस उस एक पत्थरों के पिंड – “पिट्टू” पर टिकी हो
ध्यान लगाना इसी को तो कहते हैं
यही चाबी है
यही ‘सच’ है.
मैं हँस पड़ा
खामखा सच की तलाश में इतना भटका!

 Humans have a tendency to complicate things. Ease up. And don’t forget to leave a comment. What’s a writer without an applause?

– Aaj Sirhaane

3 Comments Add yours

  1. Sandeep Bhutani says:

    Khoobsoorat rachna

    1. aajsirhaane says:

      Thank You, Sandeep! You are the first commenter of this blog. Here is a hug for you! 🙂

  2. Nimit says:

    It took me to the period when I played this game.
    Seriously, how focused we used to be.

    The way it is penned, the way poet found path on a game of Pitthoo. Commendable.
    Loved it.

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