छबीस ग्यारह

 

Theme: आतंकवाद के खिलाफ एकीकृत

Plot: चार अजनबी 26 /11/08 का दिन याद करते हुए अपने थोड़े कड़वे थोड़े मीठे व्यक्तिगत अनुभव सुनाते हैं..

Prop Words: गुलाब के फूल, टैक्सी ड्राइवर, तुलसी का पौधा, पाजेब, गर्दन पर निशान, पुरानी दोस्ती, शान्ति, देशद्रोही

Our Writers:

वोह १५ मिनट – लेखक: सुहेल जैदी

तुलसी का विवाह  – लेखक: निमित रस्तोगी

फटका – लेखक: आशीष मिश्रा

निर्जीव – लेखक: कुनाल कुशवाह


 

वोह १५ मिनट

अभी तो पुछा था, शोना ! और कितनी बार?
अब तो टैक्सी ड्राईवर  भी देख कर हंसने लगा है।
अच्छा सुनो, बैलेंस ख़त्म होने वाला है; १५ मिनट में तो मिल ही रहे हैं ना।
तुम लियोपोल्ड में ही वेट करना, मैं बस आ गया।  लव यू। हाँ हाँ .. सी यू ..

“गुलदस्ता  बड़ा अच्छा लग रहा है भैया। किसी ख़ास के लिए होगा।”
टैक्सी ड्राईवर ने रियरव्यू मिरर से गुलाब के फूलों की तरफ देख कर मुस्कुराते हुए कहा।

हा हा .. बहुत ख़ास। ७ महीने बाद वापस बम्बई आया हूँ। मैं खुद तो दिल्ली रहता हूँ।

और कितनी दूर का रास्ता है?

हाहाहा। बस भैया, १५ मिनट और। आप को पहुंचा देंगे आपकी मंज़िल तक…
टैक्सी ड्राईवर ने हंस के कहा।

वो दिन कोई ख़ास दिन नहीं था। बम्बई में एक आम सा बुधवार था।
दिसंबर आने वाला था। 4 दिन बचे थे…

सब कहते हैं वक़्त रुकता नहीं। मैंने उस दिन मगर वक़्त को रुकते देखा…

वो १४ मिनट कभी नहीं आये नहीं ..

 


तुलसी का विवाह

“रिंकू बेटा! कॉलेज के बाद सीधा घर आना। आज बाजार से बहुत सारा सामान लाना है। कल कार्तिक का महीना ख़त्म हो रहा है, अगर कल भी तुलसी विवाह न कराया तो घर की तुलसी इस बरस कुंवारी ही रह जायेगी।” उस दिन सुबह के नाश्ते के साथ माँ ने ये आर्डर भी परोस दिया था।

पूरी शाम सामान खरीदने में ही कट गयी। क्या क्या नहीं लिया – सिन्दूर, टीका, चूड़ियाँ, और एक नयी साड़ी भी। ये सब श्रृंगार का सामान वो भी एक पौधे के लिए।

वापस आते हुए माँ को याद आया कि उसने पाजेब बनने के लिए दी थी। सर्राफ की दुकान से छत्रपति शिवाजी टर्मिनस तक आते आते नौ बज गए थे । मैं माँ को किनारे बैठाकर दादर की टिकट लेने लाइन में लग गया। थोड़ी ही देर बाद गोलियाँ चलने की आवाज़ आने लगी और भगदड़ मच गयी।

आज माँ उन दोनों में से एक पाजेब अपने दाहिने पैर में पहनती है और दूसरी पाजेब उस तुलसी के पौधे को पहनाती है। माँ का बांया पैर वो काली रात खा गयी थी। वो भगदड़ में जाने कौन.. खैर छोडो ..

मैं अक्सर माँ से कहता हूँ उनका पैर इस पूजा पाठ की वजह से ही कटा है और वो कहती है, “ये पूजा पाठ ही है जिसकी वजह से आज जिन्दा हूँ। उस रात मर भी सकती थी।”

 


 

फटका

चॉपर की गड़गड़ाहट में भी अबीर के मन की आवाज़ें साफ़ सुनाई दे रही थी। यकायक ही उसका हाथ अपने गर्दन के निशान पर चला गया। एक मुस्कराहट उसके चेहरे पर खेल गयी। “अली देख तेरे एक फटके ने मुझे कहाँ पंहुचा दिया”। एन एस जी कैडेट्स को लेकर चॉपर मुम्बई के होटल ताज की तरफ पूरी तेज़ी से जा रहा था। अबीर उन पच्चीस कमांडोज़ में से एक था। उसका पहला ही मिशन था ये ज्वाइन करने के बाद।

“ये सब नहीं करना मुझे, मैनेजमेंट कर के अमेरिका चला जाऊँगा। यहाँ कुछ नहीं हो सकता किसी का।” अबीर चिल्ला कर बोला था।

“तेरी मर्ज़ी भाई। लेकिन फिर रोना बंद कर दे, यहाँ ये नहीं होता, वो नहीं होता। सब भ्रष्ट हैं। और इस देश का कुछ नहीं हो सकता।” अली ने एक फ़ीकी सी मुस्कराहट के साथ कहा।

चॉपर को एक झटका लगा और अबीर अपने विचारों से बाहर आ गया। कमांडर ने आकर कहा की वो अब पहुँचने वाले हैं। प्लान फिर से डिस्कस किया गया। सबको अपना अपना पार्ट फिर से दुहराकर बताया गया। अबीर को अब थोडा सा डर लग रहा था। अपने बटुए में से माँ पापा की तस्वीर निकाल कर एक बार देखी और फिर अली की तस्वीर निकाल कर बोला, “भाई एक बार बेस्ट ऑफ़ लक तो बोल दे”


 

निर्जीव

भागलपुर एक्सप्रेस के सातवें शयनयान में रात के खाने की तैयारी शुरू हो चुकी थी| पूरियों की खुश्बू में सराबोर हो उठे माहौल में सीट नंबर ५४ पर बैठे नीतेश ने अख़बार पर तारीख देखी तो चेहरा उतर गया | सामने ५१ पर बैठे त्यागी जी ने पूछा,” ऐसा क्या देख लिया?” तारीख की तरफ इशारा करते हुए नीतेश गंभीर स्वर में बोला,”६ वर्ष हो गए, मेरा बेटा उस दिन ताज में ही था| अपनी प्रेमिका को शादी के लिए प्रोपोस करने  वाला था|”

सीट नंबर ५५ का १९ वर्षीय राहुल को जैसे जोश चढ़ गया,”इन आतंकियों को तो चौराहे पर लटका कर एक एक अंग अलग कर देना चाहिए और जो हमारे देश के ही लोग उनकी मदद करते हैं उनका क्या? इन कुत्तों को तो फाँसी दे कर जला देना चाहिए|  | सब देशद्रोहियों को परिवार समेत बिना कोर्ट ख़त्म कर देना चाहिए|”

सब मौन हो गए | उसी मंज़र को त्यागी जी ने तोड़ते हुए कहा,”मेरा बेटा भी उस दिन मुंबई में था| १७ साल से उस से बात नहीं हुई है| नकली सिम बेचता था| उसके द्वारा बेचे गए सिम कार्ड्स  में से २ का इस्तेमाल हमले की तैयारी में हुआ था| वह फरार है| मैने आज तक ३२ साल की सरकारी नौकरी में कभी रिश्वत नहीं ली| सब हमें मारना ही चाहते हैं तो मार दें| एक गुज़ारिश है बेटा, कुत्ता बोलो, फाँसी दे दो, जला दो| पर देशद्रोही मत बोलो| सुलगते घाव जब छिल्ते हैं तो आत्मा भी कराहती है| खून दूसरों का बहा, और निर्जीव हम हो गए हैं|


 

6 Comments Add yours

  1. hetaxi says:

    सारी कहानियां एक से बढ कर एक हैं … बेहतरीन चित्रांकन किया है … आज भी उस दिन को याद करते हुए दुख होता है … शुक्रिया आप लेखकों का की आपने कहानियों के ज़रिये फिर से दिल को वोह गहरा अहसास करवाया …

    1. aajsirhaane says:

      Thank you so much Hetaxi 🙂

    2. Nimit says:

      Thanks for the kind words

  2. Gayatri says:

    बहुत खूबसूरत और दिल को छू जाने वाली मार्मिक कहानियाँ। कोई दुःख के काली में डूबी हुई, कोई उम्मीद की एक किरण संवारती, कोई पुरानी तीस को उभारती , कोई आस्था और विश्वास का दामन थामे , बेहद खूबसूरत कहानियां।

    एक सिरहाने एक बेहतर प्रयास है अनु , बहुत शुभ कामनाएं.

  3. Sheetal says:

    रोंगटे खडे कर देने वाली भावनाएं। आभार और शुभकामनाएं।

    1. aajsirhaane says:

      Thank you for reading, Sheetal

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