Week 4: Kaagaz

 

 

कागज़ का रिश्ता By Ajay Purohit  @Ajaythetwit

“माँ, नाव कहाँ चली जाती है”

“बिट्टो रानी, कागज़ की है, डूब जाती होगी”

“रानी साहिबा, कोई पगला है, कई सालों से इन कागज़ी नावों को पकड़, जमा करता था । कहता था, बिटिया की हैं । बेचारे की बेटी बाढ़ में बह गयी थी”

“पिछले महीने की ५ से, बस यहीं बैठा रहता था । न खाने की सुध, ना जीने की, मानो पथरा सा गया हो । आज सवेरे ही…..”

“अब बिट्टो रानी को नये घर जाने में सिर्फ़ ४ दिन और हैं, आज एक तारीख़ जो है…”

सुनयना अपनी आँखों की अविरल धार को रोक नहीं पा रही थी ।

“माँ, नाव कहाँ चली जाती है….”

 

किरदार और लेखक By Kumar Gaurav @kglunatic

आदत थी उसकी – कागज़ पर कहानी शुरू करना, खूबसूरत मोड़ देना और कलम तोड़ देना ।

मैंने पूछा, “अधूरी क्यों छोड़ देते हो, अंत तक क्यों नहीं ले जाते ?”

वो बोला – “अधूरी कहानी में कसक है, आने वाले कल का इंतज़ार है”

“और किरदारों का क्या?”

“किरदार बने रहते हैं – कभी यादों में, कभी अगली कहानी में, कोई आगे निकल जाता है और कोई ठहरा रहता है कहानी के अपनी मंज़िल तक पहुँचने के लिए ।”

वो बोल कर चला गया…. मैं कहानी के ख़त्म होने के इंतज़ार में रहा ।

कागज़ मेरा, किरदार मैं और लिखने वाला – समय ।

 

खामोश कागज़ By Harleen Vij @VeiledDesires_

दिसम्बर की रात थी .. वो बिस्तर में करवटें ले रही थी .. सर्दी का सन्नाटा कुछ कह रहा था उलटती पलटती  वो उस पुकार को अनसुना करने की कोशिश करती रही .. लेकिन फिर अचानक एक चीख सुनाई दी ..  सहमी सी वो उठकर बैठ गयी .. मेज़ पे पड़ा कागज़ सिसक रहा था .. एक सदी से उसने कागज़ से कोई बात नहीं की थी .. उसकी हर नज़्म में एक ही नाम था जिसे वोह भूलना चाहती थी .. वो उठी और धीरे से जा कर कुर्सी पे बैठ गयी .. कागज़ मुस्कुराया .. उसने कलम उठायी और एक नाम लिखा .. साड़ी रात फ़िर वोह कागज़ खामोश रहा और वो .. कुर्सी पे बैठी रोती रही ..

 

आस By  Ruchi Rana @rushuvi

Aaj Sirhaane Signature Stamp for stunning imagery ..

हफ़्तों बाद कोहरे की  चादर उठी, धूप में चैत का रोगन है .जमुना  के किनारे , शिवालय की  मुहानी पर  पीपल की  शाखें धूप – जल से ठिठोल कर रहीं थीं. अपराजिता ने अपने आँचल में बंधे कागज़ पर चंद हसरतों को ख़त लिखे . मंदिर की  सीढ़ियों पर बैठी , बहते पानी पर पतों के निशाँ ढूंढती रही . फिर उसने ख्वाहिशों के कागज़ की कश्ती बनायीं, बहता पानी ले जाएगा किनारे पर कहीं.

मंदिर के घंटे से उसकी चेतना टूटी , देखा कश्ती दूर जा चुकी थी. ख्वाहिशें सिमटी बैठी थी ,कागज़ ने संभाला था दामन पर.. मौजों पे सवार बह चलीं ,कागज़ की ख्वाहिशें ..

 

1971 की जंग By Fayaz Girach @shayrana ♠♣

Dr. Tahir Zaidi – 1971 की जंग को दूसरा इनाम मिलना चाहिए .. कहानी मर्मस्पर्शी है और देशभक्ति तथा माँ के प्यार के रंग भी बखूबी पिरोये गए हैं साथ ही साथ कन्या बचाओ का
सन्देश भी दे रही है  ..

“……आते ही माँ के आँखों का ऑपरेशन करवाना हैं, मेरे ख़त नहीं पढ़ सकती ना….
और शांति से कहना बेटी है तो क्या हुआ हम एबॉर्शन नहीं करवाएंगे, मुझे अपनी परी चाहिए ”

“जल्दबाज़ी में लिखा होगा ” शांति ने रोते हुए सासु माँ से कहा ।

चार महीने बाद सिफॅ ये कागज़ मिला, जिसने सारे घर को आंसुओ की बाढ़ में बहा दिया ।

सरकारी कागज़ों से माँ की आँखे और खुबसुरत परी तो आ गई….. लेकिन माँ….कभी कागज़ पढ़ नहीं पाएगी ।

शायद बेटे ने रौशनी और एक ज़िन्दगी कागज़ में भेज दी थी ।

और देश की आग ने एक और कागज़ जला दिया ।

 

कागज़ का परचा By Aditya Patel @ityaadii

डाकिये ने अमेरिका का स्टाम्प देखकर कहा – “लो आखिर आ ही गयी बेटे की चिट्ठी”. ये डाकिये से अच्छा और कौन जाने की मोबाइल के इस दौर में चिट्ठियां अभी भी ज़िंदा हैं.

माँ ने खत को टटोला, सूंघा और बरामदे में ही झूले पर पढ़ने बैठ गयी. दस-बीस दफे पढ़ने के बाद खत को मंदिर में कान्हा की पालकी के नीचे रख… फिर घंटों रोयी. बरसों से पाली उम्मीद की लौ बुझने को ही थी कि इस कागज़ के पर्चे ने सांस दे दी –

“माँ, मैं इंडिया वापिस आ रहा हूँ… (ख़राब हैंडराइटिंग के लिए माफ़ी)”

कभी-कभी एक कागज़ का परचा महज़ एक कागज़ का परचा नहीं होता.

 

तीन कागजों में By Maheshwari @hetaxi1999 ♠♣♥♦

Dr. Tahir Zaidi - इस बार की सर्वश्रेष्ठ कहानी है तीन कागजों में .. इसमें एक 
बेटी के अरमान एक बाप के आंसू और एक दुखद घटनाक्रम का समावेश बहुत 
सहजता से किया गया है .. 

बडे संदूक में से बेटी की शादी का कार्ड निकाला … कार्ड पर लिखा था … “ची. माही(एमबीबीएस)”… इतना फक्र था उसे कि … डीग्री पर से आंखें हटा नहीं पाया … उतने में कॉपी का एक कागज उडते हुए मुँह पर आ लिपटा … आधे-अधूरे अक्षरों में लिखा था … “एमडी बनकर दिखाउंगी” सपना भी आधा-अधूरा … पूरा करना चाहता था … पर कैसे .. “दी..दीदी.. का.. ड..डेथ सर्टिफिकेट आ गया ..!! बेटे की आवाज़ से सोच की दुनिया तोड वह बहार आया और … तीन कागज़ों में वक्त को समेट के संदूक में रख दिया … ज़िंदगी समा गई थी किसी की … तीन कागज़ों में ..!!

 

काग़ज़ के टुकड़े By Manali Balsara @ManaliB0103

आज सुबह अख़बार पढ़ते पढ़ते फिर वही पुराने दिन याद आगये! वक़्त बदला, दौर बदला, मेरे बालो की स्याही सफेद हो गयी और अख़बार की ख़बरे खून के लाल रंग से! कब से सोच रहा हूँ अब अख़बार डालना बंद कर दू, पर ये बढती महंगाई .. पेंशन से तो गुज़ारा होता नहीं और न बेटे के पास मेरे लिए समय है ..

काग़ज़ के कितने टुकड़े जीने की एक ज़रूरत बन गये है. अजीब है ये दुनिया, जो काग़ज़ एक दिन मेरी मृत्यु का प्रमाणपत्र बनेगा उसी के पीछे भागते हुए मेरी सारी ज़िंदगी गुज़र रही है!

 

खाना खाया तुमने? By Ashish Mishra @justalovelythou

४० साल के बाद भी पहला सवाल वही था – खाना खाया तुमने?

क्यों, कहाँ, कैसे तुम छोड़ गयी, बिना बताये और आज इतने सालों के बाद, फिर से…. अशेष पूरा भरा बैठा था | उसके सामने एक ६२ साल की बूढी अपने सर में चांदी लपेटे बड़े प्यार से मुस्कुरा रही थी | बिलकुल ४० साल पहले जैसी, लेकिन अब झुर्रियों के साथ |

पंखे की हवा में टेबल पर रक्खी उसकी भरी हुई डायरी के पन्ने उड़ने लगे, उस दिन पहली बार उसने देखा उस भरी हुई डायरी का आखिरी कागज़ अब भी कोरा था |

 

कोरे खत By Ankita Chauhan @_ankitachauhan  

Aaj Sirhaane Signature Stamp for best writing..

दशक बीत चले थे.. शीरोमां रूमानी लम्हों से कागजी लहज़ों तक का सफर तय कर चुकी थीं…बालों पर चांदी…चेहरे पर अनुभवों की आड़ी-तीरछी लकीरें…और संजीदगी ओढे, आज एक जीवन मृत्युशय्या पर लेटा था। मुंह में गंगाजल डाला जा चुका था..लेकिन शीरोमा के हाथों में लिपटे वो खत हटाने की हिम्मत किसी की नहीं थी।

“पता नहीं…क्या पढ़्ती थी इन कोरे कागज़ों में”

“शादी के बाद…शीरोमा की बेटी भेजा करती थी..”

“कोरे खत?”

“पता नहीं कौन से देश में ब्याह दी थी बेटी…जब भी खत आता..कागज़ भीगा होता..लिखा हुआ सब मिट चुका होता..शीरोमा उसी में घंटों नज़रें गढ़ाए..ना जाने क्या ढूंढा करती थीं…”

 

 खज़ाना  By Shikha Saxena @shikhasaxena191

Aaj Sirhaane Signature Stamp for a story that motivates..

“देखो वो संदूक है ना…उसमे तुम्हारे पिता ख़ज़ाना छोड़ गए हैं, कभी परेशानी नही होगी”

परेशानी आई मगर माँ के चेहरे पर कभी शिकन नही आई .. कई बार लगा भी शायद आज नहीं तो कल संदूक खुल ही जाएगा ..
लेकिन वो कल कभी नही आया.. समय ने भी तो साथ दिया.. स्कूल, कॉलेज

पिछले साल माँ भी चली गयी.. हमारे हिस्से संदूक दे गयीं .. इस का क्या करना है ..
उत्सुकता से खोलने पर पिता का चित्र और काग़ज़ का टुकड़ा मिला ..
जिसमें लिखा था ..” सब ठीक हो जाएगा ”

 

आदत By Siddhant @Siddhant01

Late entry. Not part of the selection process.

अरे! ये तुम क्या कर रहे हो? कागज के टुकड़े क्यों बीन रहे हो?

अलमारी साफ कर रहा था तो कुछ कागज मिले, जो अब काम के नहीं| उन्हें फाड़ रहा था, तो कुछ टुकड़े बिखर गए|

तो क्या हुआ? रहने दो, काम वाली बाई उठाकर फेंक देगी|

हाँ! वो तो है… लेकिन मैं इन्हें उठाकर फेंक दूँगा तो मुझे अच्छा लगेगा|

अच्छा! क्या बदल जाएगा, ऐसा करने से?

यूँ तो कुछ ना बदलेगा मेरे उठाने से, लेकिन एक आदत जरूर बदल जाएगी|

 

4 Comments Add yours

  1. ajaypurohit says:

    सभी रचनाओं में कहीं ना कहीं एक मधुर रिश्ते की झलक है जो ह्रदय को छू जाती है ।

    शिखा सक्सेना की कहानी मुझे बेहद पसंद आई ।

  2. Fayaz Girach says:

    I am grateful to SKB For Making Me Write.
    &
    Dr Tahir Zaidi For Liking My Story.
    This Appreciation Gives Me A Push To Write More.
    Last But Not The Least
    To My Almighty Allah Who Gave Efficiency In My Ink.
    Congrats To All Other Talented Writers Becoz They Are My Teachers.
    -Fayaz Girach @shayrana

    1. aajsirhaane says:

      Thank you Fayaz.. 🙂 YOUR participation is the key to Aaj Sirhaane’s platform.

  3. Jyoti says:

    @Fayaz girach..such a lovely way of expressing yr thought. U r truly gifted..

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