कागज़ के टुकड़े By Shishir Somvanshi

A beautiful story about lost chances and indefinite waits.

Follow him on twitter  – @shishir_som. 



Shishir

परीक्षा के आख़िरी पर्चे के बाद वो सुरभि के साथ उसी केबल ब्रिज के ऊपर आ गया जहाँ से नीचे बहती पहाड़ी नदी को देखते देखते दोनों ने दो साल गुज़ार दिये थे। किसी ने किसी को कुछ कहा नहीं या यूँ कहें कहने की ज़रूरत नहीं समझी।शाम दस्तक देने लगी तो उसने कहा-“दिल्ली जा रहा हूँ कल। लौट कर तुमसे एक बात कहूँगा।”

“अभी कह के जाओ जो कहना चाहते हो, क्यूँ दो महीनों को रुकते हो।”

“बस दो महीनों की तो बात है।30 नवंबर को । मैं यहीं इसी जगह तुम्हारा इंतज़ार करूंगा ।”

“लंबा समय होता है।” इतना ही कह पायी थी सुरभि।

वापस लौट कर घर पहुँचकर रात भर यही सोचता रहा कैसे कहेगा।सौ बार मन ही मन दोहराने के बाद संतोष नहीं हुआ तब यह विचार आया, कागज़ के टुकड़े पर लिख डाले जिससे किसी उलझन में उसमे देख कर सब संभाल ले।अगले दिन घंटे भर पुल पर इंतज़ार के बाद दूर से कोई छाया उसकी ओर आती हुई दिखाई दी।

“आप जिसका इंतज़ार कर रहे हैं उसी ने मुझे भेजा है।”

“सुरभि ने भेजा? वो खुद क्यूँ नहीं आई?”

“कुछ रस्में निभानी होती हैं, सुरभि दी घर से बाहर नहीं निकल सकती अभी। निमंत्रण है आपके लिए ।”

उसने काँपते हाथों में नीले रंग का लिफ़ाफ़ा लिया जिस पर एक दिनाँक थी 30 नवंबर 1978 और सुरभि के साथ किसी और का नाम छपा हुआ था।

एक मूर्ति पूरा दिन वहीं बैठी नीचे नदी में बहते हुए पानी को एकटक देखते हुए जैसे कोई खोई चीज़ तलाश करता रही । शाम घिरने लगी और न जाने क्यों हवायेँ बहुत ज़ोर से चलने लगी। अचानक मूर्ति में हरकत हुई। कुछ पल बाद कागज़ के चंद टुकड़े उड़ते दिखे जो बहुत देर बाद तक हवा में तैरते रहे विद्रोही से, नीचे जाना ही नहीं चाहते थे नदी की धारा में।

हाँ अंतिम बात, उनका रंग नीला नहीं था।

8 Comments Add yours

  1. fictionhindi says:

    सुन्दर अभिव्यक्ति

  2. kiritnatural says:

    Nice.Liked it.

  3. javed says:

    Well told Shishir

  4. saurav says:

    अति सुन्दर लिखते रहें।
    स्वयं को अभिव्यक्त अच्छे से करते हैं।

    1. धन्यवाद सौरव जी।

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