Week 6 : बड़ा दिन, छोटा सांता

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A Still By Vivek Arya

A Special Message From Gayatri, Our Guest Editor of the Week (@gayatriim)

विवेक की संजीता तस्वीर खुद में एक कहानी कहती है – एक रेल का डब्बा या यूं कहिए भारतीय समाज के मध्यवर्गीय नागरिकों की लाइफलाईन स्लीपर क्लास का डब्बा और लोहे की सलाखों वाली खिड़की से बाहर झांकती नन्हे सांता की मासूम आंखें, कुछ उम्मीद लिये, सतरंगी सपने सजाये।

और फिर इस तस्वीर पर लिखी कहानियाँ पढी- कहानियाँ ख्वाबों की, नई उम्मीदों की, सच्चाईयों की, रुस्वाइयों की, यादों की, अंधकार मिटाती कहानियाँ, खुद से मिलाती कहानियाँ । हैरान हूँ कि १०१ शब्दों में कैसे भाव का सैलाब उमड़ आता है।

जैसे कहानी “जो मैं संता होता” उम्मीद की कहानी है, एक खुश और संप्पन समाज देखने का सपना।

“यात्रा” बरसों बाद घर वापिस जाती, बचपन की यादें जीती सलोनी की कहानी है।

“मेरी क्रिसमस” कहानी है एक मजबूर पिता की जो अपने नन्हे बेटे का एक शौक तो पूरा कर पाया पर पैसे के अभाव के रहते उसकी ज़रूरतें न पूरी कर सका।

“इंतज़ार” दिल को छूती कहानी है उस बचपन की जो लालच की सूली चढ गया।

“नन्ही सेंटाक्लाज़” कहानी है उस माँ की जिसकी सूनी गोद क्रिसमस के दिन भर गयी।

सच्चा मित्र वही है जो दोस्ती का मर्म जान ले, दोस्त का दर्द समझे , ” दोस्ती ऐसे ही प्यारे रिश्ते की कहानी है।

अंतहीन आशा और प्रतीक्षा की कहानी है “बड़े दिन की सहर” ।

“नन्हा सांता ” झलक देती है इंसान के असहनशील स्वभाव की और कैसे मासूम शरारतें एक कडवे सच को उजागर करती हैं।

” ज़िन्दगी -टू डी ” समाज के दो वर्गों के दो अलग पहलुओं की कहानी है।

हर कहानी सामाजिक अनुभूति से परिपूर्ण है इसलिये आज ” बडे़ दिन ” हम हर एक कहानी को विजेता घोषित करते हैं ।


 

जो मैं संता होता  By Anshu Kumar @anshu9843 ♠♣♥♦

जो मैं संता होता, तो किसी को रोने न देता। हर किसी को हंसी के तोहफे भर-भर के देता। गम तुम्हारा सारा अपनी झोली में भरी ख़ुशी से बदल देता। रात को जब थक के मेरी माँ सोयी होती, मैं उसके सिरहाने अपनी शैतानियों का टोकरा रख चुपके से सो जाता। सुबह उठके वो गुस्सा तो होती, पर अन्दर से वो सबसे खुश होती। मेरा वो दोस्त जो खेल नहीं पाता, कभी दौड़ नहीं पाता, उसे खेलने-कूदने की सारी सौगात दे देता। जो मैं संता होता, तो सबको सब कुछ दे देता।

 

यात्रा By Ajay Purohit @Ajaythetwit ♠♣♥♦

आज वही सफ़र, वही ट्रेन, वही सलोनी… बस समय ने ४० वर्ष की उड़ान भर ली थी।

मानो कल ही की बात हो। ख़्वाबों को पिरोये, नन्हीं सलोनी, हाथों पर मेहंदी लगाये, सान्ता के भेष में, खिड़की से बाहर टकटकी लगाकर – कभी स्टेशन तो कभी चलती रेल से बाहर के मनोहारी दृश्यों  को निहारती। दीन दुनिया से बेख़बर। बस ननिहाल पहुँचने का इंतज़ार।

ट्रेन सुजानपुर पहुँची तो मोबाईल की रिंग ने सलोनी का ध्यान भंग किया।

“सलोनी, बिट्टू आएगा लेने। जल्दी पहुँचो, तुम्हारे बग़ैर कुछ नहीं होगा।”

चंद्रेश मामा थे। उनके पोत्र यानी सलोनी के भतीजे का विवाह था।

 

मेरी क्रिसमस By Shishir Somwanshi @Shishir_Som ♠♣♥♦

 

Aaj Sirhaane Signature Stamp for fine writing.

रात भर धुंध में रेंगती रेलगाड़ी में 25 दिसंबर की सुबह जब बर्थ से नीचे उतरा तो मैंने उस बच्चे को सांता क्लाज़ की वेशभूषा में  खिड़की से बाहर देखते हुए पाया। मुस्कुरा कर कहा अच्छी ड्रेस है, सांता। जवाब शर्मिंदा से पिता ने दिया- “क्या अच्छा क्या बुरा, इसका पूरा जाड़ा ही सांता क्लाज़ बन के बीतेगा। एक यही गर्म कपडा दिला पाया हूँ इस मंहगाई में।“

मेरा स्टेशन आ गया। हड़बड़ी में अपना सामान संभालता ट्रेन से उतरकर चार कदम ही चला था – “अंकल-अंकल” पुकारता वही बच्चा खिड़की से हाथ में मेरा पर्स लहराते दिखा। स्टेशन से बाहर निकलते हुए मेरे मुंह से बरबस निकल पड़ा- मेरी क्रिसमस।

 

इंतज़ार By Rahul Tomar @rahulshabd ♠♣♥♦

Aaj Sirhaane Signature Stamp for importance on the narrative.

कल ही की तो बात लगती है जब सैंटा के कपड़े पहने, अपने पापा के इंतजार में ट्रेन के डिब्बे की छोटी सी खिड़की से नन्हे-नन्हे हाथ निकाले मैं खड़ा था। उनकी छाती से चिपकने को बेक़रार आसपास बैठे सारे बच्चों और उनके खिलौनों से बेख़बर आंखें फक़त खिड़की पर जम गयीं थीं। अचानक ट्रेन चल दी, पापा नही आये, आया तो बस वो आदमी जो एक थैला दे कर मुझे मेरे पापा के पास से ले आया था।

“उठ रवि सिग्नल रैड होने वाला है। क्या सैंटा की फोटू देखता रहता है ..  हैं? काम पे ध्यान दे। चल कटोरा सम्भाल अपना।“

 

नन्ही सेंटाक्लाज़ By Shikha @shikhasaxena 191 ♠♣♥♦

शायद ही कोई जगह बची हो, जहाँ मीरा ने प्रार्थना नहीं की – लेकिन आँगन सूना ही रहा।

24 दिसंबर की रात सबके घर खुशियों का पैग़ाम लेकर आई थी लेकिन उनका घर हमेशा की तरह सन्नाटे में डूबा रहा।

“काश, कोई सेंटाक्लाज़ हमारे घर भी खुशियाँ दे जाता!”

अचानक बाहर शोर सुनकर सब दौड़े। कूड़े के पास कोई कंबल में लिपटा बच्चा छोड़ गया था। हजार तरह की बातों के बीच मीरा ने कुछ निश्चय के साथ उसे उठा सीने से लगा लिया।

“लेकिन… ये तो लड़की है!”

नही ये नन्ही सेंटाक्लाज़ है जो मेरे घर खुशियाँ लेकर आई है।

 

दोस्त By Siddhant @Siddhant01 ♠♣♥♦

Aaj Sirhaane Signature Stamp for distinct storyline. Simple, yet out of the box thinking.

“सिद्धु, कितनी बार पूछा – बताओ भी, तुम्हारा स्वेटर कहां गया? कल ही तो निकाला था।“

“मम्मा! मैं… मैं वो रघु को दे आया।“

“कौन रघु? और क्यूँ दे आए?”

“सॉरी! मम्मा… वो मेरा अच्छा दोस्त है मम्मा… और जब वो फटा हुआ स्वेटर पहनकर स्कूल आता है तो सब उसे चिढ़ाते हैं, जो मुझे अच्छा नहीं लगता।

और वैसे भी दादू ही कहते है ना – जो अच्छे बच्चे होते हैं सन्ता उनके घर क्रिसमस की रात को गिफ्ट देकर आता है।

वो बहुत अच्छा है मम्मा तो कल रात मैं उसे अपना स्वेटर दे आया।“

 

बड़े दिन की सहर By Ruchi Rana @rushuvi ♠♣♥♦

‘सर्द रातों के दिये यूँ  जलतें हैं , स्याह अँधेरे में एक ठिठुरती लौ’

अमृता ने जागते रात बिताई। सुबह उठते ही वो नहर की तरफ़ चली। यहीं से वो रेल गुज़रती थी। अमृता कैसे मान ले कि सीमा पे उसको शहादत मिली जबकि उसने इस ट्रेन से आने का वादा किया था। अंतहीन आशा और प्रतीक्षा,  कब तक मुट्ठी बांधेगा मन अपने आकाश के टुकड़े के लिए।

ट्रेन रुकी, खिड़की पे ये बच्चा, आँखों में आशा के तारे। उसकी संताक्लौस पोशाक ने रूठी उम्मीद को नवजीवन दिया। जब तक सांस है, तब तक आस है – क्रिसमस का मौसम यह कह गया।

 

नन्हा संता By Ankita @_ANKITACHAUHAN ♠♣♥♦

“बड़ा ही बदतमीज़ बच्चा है” मैंने मन ही मन सोचते हुए, अपनी शॉल पर बिखरी पानी की बूँदे झाड़ी। कब से उसकी ऊलजुलूल हरकतों को सह रही थी। ये बच्चा है कि शैतानियों का पुलिंदा? पता नहीं कैसे माँ-बाप ऐसे खतरनाक हथियारों को साथ लेकर घूमते हैं। इन पॉकेट-बॉम्ब के टिकट आधे नहीं, दुगने लगने चाहिए।

अपना स्टेशन आने पर जैसे ही लगेज़ निकालने के लिए झुकी, हाथ किसी रॉडनुमा चीज़ से टकरा गया। ये उसी शैतान संता-क्लॉज़ के पैर थे। आँखों में ना जाने क्या चुभ-सा गया। एक नम लम्हे ने जैसे सब कुछ बदल दिया। वो नन्हा-सा संता जैसे मेरे हर गुज़रते लम्हें को सज़ीव कर गया था!

 

जीवन २-D By Fayaz Girach @shayrana  ♠♣♥♦

अधख़ुली खिड़की से वो बच्चा ‘पूरी’ दुनिया देख रहा था। ट्रेन चल पड़ी, जीवन का सफ़र शुरू हुआ।

“वहाँ लोग लकड़ियों के ढेर पर किसको जला रहे हैं ?”

बच्चा सोच रहा था, तभी

‘जिंगल बेल, जिंगल बेल’ रिंगटोन बजी,

“….और हाँ, दो क्रिसमस-ट्री दरवाज़े पर लगा देना, केक मत भूलना, गुड़िया को पसंद है”

पापा कॉल-वार्तालाप समाप्त करते हुए बोले।

दूर कुटिया में भूखे-नंगे बच्चों को, ब्रेड बाँटकर खाते देखकर, मोबाइल के वॉल-पेपेर पर ईशु क्रिस्ट मुस्कुरा रहे थे।

बचपन में ही इस बच्चे ने जीवन का फ़लसफ़ा सीख़ लिया और देखा भी । हैप्पी क्रिसमस ।

 

 

5 Comments Add yours

  1. सभी कहानियाँ बेहतरीन तरीके से लिखी गयीं हैं…जहाँ भावनाओं में लिपटे शब्द पाठकों को अपनी भी एक कहानी लिखने पर मजबूर करेंगे .. बेहद खूबसूरत मंच के लिए आज सिरहाने को धन्यवाद!

    गायत्री जी को दिल से शुक्रिया.. आपने… कच्चे लेखन को अपना समय व शब्द दिए !

    special thanks for adding that one line.. thank you)

    keep shining !

    1. aajsirhaane says:

      how sweet Ankita .. Thank you ..

  2. shikha saxena says:

    सभी कहानियाँ दिल को छू लेने वाली .. और शुक्रिया गायत्री जी का कि उन्होंने इस दिन को सबका एक खास दिन बना दिया और विवेक का भी जिनकी इस तस्वीर ने इतनी खूबसूरत कहानियों को जन्म दिया 🙂
    और बधाई सिद्धांत, राहुल और शिशिर को और सबको खूबसूरत कहानियों के लिए

  3. Feroz Khan says:

    sabhi lekhkon ko mera abhaar , sabhi rachnaye behtareen hain

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