Week 9 : Shades Of Love

feb 13 sketch

 

तुम्हारे साथ By Siddhant

@siddhant01

– अरे ! तुम फिर आ गईं….
– तुम उदास थे, कैसे ना आती ?
– तुम्हें अगर मेरे साथ ही रहना है, तो दूर ही क्यों जाती हो?
– लेकिन मैं तो हमेशा तुम्हारे साथ ही रहती हूँ ।
– मेरे साथ?
– मुझे पहचाना नहीं ?
– नहीं..
– मैं वही हूँ जिसे तुम कभी अपनी जिंदगी, कभी ख़ुशी, कभी ख्वाहिश तो कभी अपना इश्क़ कहते हो।
– हैं?
– और हाँ ! मैं वो भी हूँ जिसे तुमने इन १०१ शब्दों में समेटने की कोशिश की है…. मैं तुम्हारी मल्लिका ऐ ख्याल हूँ ।
– समझे! बुद्धू शायर .. अब समेट लो मुझे अपने कागज़ पर ..

{From Mithelesh Baria – This story does justice to the picture perfectly, very well written in “question and answer” format. I found this story very close to the picture, especially the fact that the girls pic was faded… this story portrays depicts that fact in the narration. The writer has good knowledge of Hindi words.}

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 नाम By Shishir Somwanshi

@Shishir_Som

14 फ़रवरी की शाम मुझे विगत कई वर्षों की भाँति पार्क में देवदार के पेड़ों की छाँव तले उसी लकड़ी की बेंच तक खींच लाई। एक दिन जिस स्थान पर मैं प्रेम निवेदन का साहस नहीं जुटा पाया था वहाँ एक महिला को बैठा देख निजता में अनधिकृत दखल का अनुभव हुआ। फिर भी धृष्टता से वहीँ बगल बैठ गया। सहसा अपना नाम सुन कर चौंक पड़ा।
“रुचिर”
एक साथ दो व्यक्तियों ने उत्तर दिया। दूसरा वह आकर्षक किशोर था जो हँस कर बोला।
“अरे आप भी रुचिर”।
“हाँ रुचिर बत्रा।”
नाम लेने वाली महिला एकटक मुझे देखती रही।जाते जाते इतना ही कह सकी।
“दीदी ने रखा था, बहुत प्यार था उन्हें बच्चों से और इस नाम से।”

{From Mithelesh Baria – Good story, a very different dimension to love. A very nice and interesting ending, but too heavy words used, could have been avoided.}

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ब्लूटूथ रिश्ते By Ajeetabh Chauhan ♠♣♥♦

@AjeetabhChauhan

“चाचा, शाम को बैंच पर जाकर तुम इस लड़के के लिए ही अखबार पढ़ते हो ना?”
“वो दीदी नहीं आती अब। जो इस लड़के के इंतज़ार में खरीदारी के बहाने से वक्त काटती थीं दुकान पर। कितना चिढ़ते थे आप।” सूरज ने मालिक से पूछा
मालिक अखलाक खामोशी से कबीर को देखता मुस्कुरा रहा था।
“छोटू, आज भी जनपथ के किताबों वाले खड़ूस अँकल हमारे लिए बैंच घेरे बैठे थे। वो भी मानते हैं कि तुम अब भी हो और मुझसे हमेशा जैसे मिलती हो यहाँ।”
मन में सोचते हुए बैंच पर अकेला कबीर खामोशी से शून्य को ताक मुस्कुरा रहा था।

{From Mithelesh Baria – TOP STORY OF THE WEEK. The writer has brought in two more characters and still keeps the story under the word limit, which is a very difficult thing to do, he take the story to a very different direction and suddenly does a sharp turn, and the picture is in front of u. Professional stuff I must say. The way he/she has started the story directly with a conversation is the cherry on the top. Super.}

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 अधुरा साथ By Somya Tripathi

@somyatripathi3

आज शाम वैसी ही है, पत्ते वैसे ही गिरे है  और  मैं भी सही समय पर आगया हूँ । अगर कुछ नही है  तो वो है तुम्हारा साथ । इसी जगह तुम घंटों मेरा इंतजार करती थी ।
राशी ने कभी मुझसे कुछ तो नही माँगा था। जो मैंने कहा सब माना उसने और मैं थोड़ा समय भी न दे सका । एक साल पहले की ही बात है आज के दिन के लिये उसने  बहुत कुछ किया और मैं समय पर ही न पहुंच सका । कुछ न बोली वो । मैं भी क्या करता उसके लिये ही तो कर रहा था पर एसा भी नही था की वो अपना दर्द भी न बताती । आज मुझे अकेला क्यों कर गई ।
सचिन ने आज अपने हमसफ़र को खो कर उसकी कीमत समझी ।

{From Mithelesh Baria – A good effort but too simple, this is just a plain and simple description of the picture , the story is missing.}

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आशियाना By Mohammad Rizwan

@rizwan1149

पहाड़ियों में फैली सब्ज़ फर्श नुमा घास, वहां बसी शांति और उस शांति को तोड़ती चहचहाते पक्षियों की आवाज़ें उसे बहुत कुछ याद दिल रही थीं।  
एक छोटी पथरीली चट्टान पर अकेला बैठा वह फौजी सोच रहा था की जब वह अपने पहले वैलेंटाइन डे पर मिले थे तो शहर के उस बगीचे के बीच ऐसी ही किसी ऊंची और शांत जगह की तलाश में थे जहाँ उन्हें कोई न देख पाता। और ऐसी ही किसी शांत जगह वो अपने सपनों का अशिआना भी तो बनाना चाहते थे।  
लेकिन आज वो अपने आशियाने में अकेला था। शादी के बाद फ़ौज की इस नौकरी ने उसको यह मौका भी तो नहीं दिया था की एक और वैलेंटाइन डे उसके साथ गुज़ार पाता।

{From Mithelesh Baria – Fauji ko daal kar ek alag soch di gayi hai is kahaani mein. Clear writing and the description of the scene is best among all stories.}

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 पार्क का बेंच By Varun Mehta

@funjabi_gabru

पार्क का बेंच, कभी एकांत मल्होत्रा के लिए दुनिया की सबसे खूबसूरत जगह थी
बंदिश .. कितना अलग सा ये नाम .. खुद भी तो अलग ही थी वोह..
बंदिश से पहली बार यही मिला था, और हाँ.. आखिरी बार भी ..
“नहीं, अब कुछ नहीं हो सकता” दोनों ने कोशिश करने से पहले ही शायद हार मान ली थी ..
काफी देर बैठे रहे, एक दूसरे की उंगलियो की तरह उलझी हुई अपनी तकदीरों को समझते हुए ..
फिर चल दिए अपनी अपनी राहों पर ..
एकांत आज भी यहाँ आता है, कुछ जवाब ढूंढने, शायद कोई हवा का झोंका बंदिश को वापिस ले आये

{From Mithelesh Baria – Very well written, but lacks meat. Last line “hawa ka jhonka” is sudden and abrupt input.}

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 युँ बिछडते है .. By Hetaxi Maheshwari

@hetaxi1999

– ये लिजिये टिफिन, चेक बना दिजिएगा मुन्नी की स्कूल फीस का .. आज चौदह तारीख है आज ?
– जी .. याद आ गया ?
– हम्म.. पंद्रह साल पहले .. ।
– आज शाम चलेंगे फिर .. वहीं .. कॉलेज की बेंच पर ?
– … बेंच पर …?
– हाँ .. आइसक्रीम खाओगी न ?
– जी पर जल्दी कर लेंगे.. मुन्नी का होमवर्क देखना है .. माँ की दवाई .. शाम का खाना ..
– कौन हो ? हो भी की नहीं ..
कुछ बिछडते हैं क्योंकि मिल नहीं पाते हैं .. और जो मिल जाते हैं .. वो युँ भी बिछड़ जाते है ..

{From Mithelesh Baria – Till 8th line story is perfect but the last two lines does not have any link to the story, middle class ki majbooriyaan dikhaane ka prayaas hai … “kaun ho , ho bhi nahin” is line ki zaroorat nahin thi.}

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 अजीब दास्ताँ है ये By Shikha Saxena ♠♣♥♦

@shikhasaxena191

– ओफ्फो पापा ..इस बार तो कुछ अलग करिए ..

– आपकी शादी की 25वीं सालगिरह है और वैलेंटाइन भी ..मनुहार था बेटे के शब्दों में..

– हाँ बेटा कुछ अलग करेंगे

मगर हमेशा की ही तरह वो दोनो 14 फरवरी को निकल गये.. दूर  पहाड़ियों में
और वहाँ जाकर जान बूझकर पीछे रह गई पत्नी ..
जानती थी कि उसी पहाड़ी पर ..उसी बेंच पर वो अकेले बैठना चाहेंगे ..
कुछ समय के लिए ..
याद करते हुए उसे.. जो उनका पहला प्यार था ..
जो इसी दिन यही मिला था और यही बिछुड़ा भी …

{From Mithelesh Baria – SECOND BEST STORY… good choice of words, and a very good ending. Starting the story with a conversation shows sign of maturity.}

{Note from Anuradha – AAJ SIRHAANE SABSE HAT KE STAMP. A wife’s subtle yet poignant sacrifice shows Shikha’s deep understanding of human relationships. A refreshingly different angle. Ek marmsparshi aur prernadayak kahaani.}

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प्लानिंग By Amit Rai

@4Amitji

परेश पटेल ने अपनी पुरानी और स्पेशल क्लासमेट से बरसो बाद होने वाली मुलाकात सिर्फ प्लान ही नहीं .. अनगिनत बार रिहरस भी कर ली थी …
कैसे बैठूंगा ? क्या पुछूंगा? कितना हसूंगा?
स्कूल के पीछे, वही बगीचा, वही बेंच .. आज कुछ कहना था उसे ..
पर जैसे ही जागृति आई, यूँ चिल्लाई : ” हाय ‘परी’, केम छे? आ जंगल मा केम?”
सारी पलानिंग, प्यार जैसे हवा हो गया …
मेरे मुंह से भी पुराने स्टाइल में निकल गया ” पागल, तेरी अकल अब भी नहीं ‘जागी’? स्कूल भूल गई?…
और बस दोस्तों…होना क्या था .. एक “वेल प्लांड डेट ” ,”कासुअल गैट टूगैदर ” बनके रह गई…

{From Mithelesh Baria – No justice done to the real content of picture, but lot of scope in writing… check for incorrect words and spellings.}

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 अनोखा मिलन By Fayaz Girach

@shayrana

अपने अख़बार के इंटरव्यू के लिए, कल्पना मशहूर लेखक वर्तमान दत्ता के घर पहुंची ..
नौकर ने गार्डन में बिठाया तो उसने देखा वर्तमान दत्ता एक पुरानी तस्वीर को साफ़ कर रहे थे ..
तस्वीर देख कल्पना आश्चर्य चकित हो गयी ..
– “ये तो माँ की तस्वीर है”
वर्त्तमान ने मुड़ के देखा .. अपनी पत्नी स्मृति की हु ब हु शक्ल वाली लड़की को देखकर वर्तमान के दिमाग में अतीत की रेल दौड़ जाती है।
बस दुर्घटना…. स्मृति की मृत्यु ….. लापता बच्ची…
– “गुडिया ?”
– “.. पापा .. “
कल्पना हक़ीक़त से और वर्त्तमान भूतकाल से मिल रहा था, स्मृति मुस्कुरा रही थी।

{From Mithelesh Baria – Very good story, but does not relate to the picture very well. But whatever is written is professionally, would have rated this story best if there was some connect with the pic. Language is awesome, characters are awesome.}

 

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 मरीचिका By Ajay Purohit

@Ajaythetwit

 “आप किस से बात कर रहे हैं” सुधा ने बैंच पर बैठे युवक से पूछा । वो झेंपा व दौड़ कर पार्क से बाहर चला गया। 
 सुधा की जिज्ञासा और बढ़ गई उसे जानने की । 
 “ये है मेरी कहानी…! वृंदा अक्सर मुझे यहीं मिला करती है” शैल ने सुधा को अपनी व्यथा सुनाई । 
 वृंदा जो २ वर्ष पूर्व कार दुर्घटना का शिकार हो चुकी थी, शैल के साथ रेज़िडेंसी कॉलेज में पढ़ती थी । 
 आज रेज़िडेंसी कॉलेज के एन्युअल डे पर सुधा ने जिज्ञासावश ऑफ़िस में तलब किया तो ज्ञात हुआ कि शैल व वृंदा २ वर्ष पूर्व कार दुर्घटना में चल बसे थे । 

{Note from Anuradha – Late Entry. Not part of the guest editor’s selection process. Holy. I was spooked. I like how Ajay keeps the story simple, but add elements of surprise in the end. A ideal short story format.}

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 बौड़म By Ajay Purohit

@Ajaythetwit

 ये हैं कालीचरण बिजनौरी उर्फ़ ‘बौड़म’ ! 
 क्षमा कीजिये, सहपाठी इन्हें इसी नाम से संबोधित करते हैं । अक्सर बैंच पर अकेले मिलते हैं, मनन करते हुए । 
 घबराइये मत,दिमाग़ी हालत बेमिसाल है । बेहतरीन छात्रों में हैं पर नीरस इतने, कि ना पूछें । 
 “बौड़म, किताबों से कर लेइयो इश्क़” 
“नहीं-२, ये शालू को पटाएँगे….हाहाहाहा” 
 शालू कॉलेज की पॉप्युलर छात्रा हैं । 
 कल तो किसी ने मज़ाक़ की हद कर दी, ये चित्र बना कर । 
 ‘बौड़म व लैला’ 
 “क्यों बौड़म जी, चलें बैंच पर, इस चित्र को जीवंत करने” शालू ने काली से हँसते हुए कहा । 
 अब ना पूछें कि ये कैसे हुआ । 

{Note from Anuradha – Late Entry. Not part of the guest editor’s selection process. Superb narration. This is class. Story is simple but the narrative makes it an interesting read.}

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5 Comments Add yours

  1. Mili Duggal says:

    Dude! What wonderful stories. I spent my Sunday morning sitting at the kitchen table and reading all these stories. My congratulations to Aaj Sirhane and all the writers, and to the guest editor. Well done folks!

  2. kush052 says:

    बेहतरीन कहानियाँ, अजिताभ जी और शिखा जी को बधाई, सिद्धान्त भाई, रिजवान भाई और अजय जी की कहानियाँ भी प्रभावी लगी ||
    मिथिलेश सर, आपके नोट्स writer और reader दोनों को लेखन की बारीकियाँ समजने में मदद करेंगे, शुक्रिया 🙂
    Thank You team “Aaj Sirhaane” 🙂

  3. Wow superb stories. Hats off to all the writers and cheers to aaj sirhane.

  4. Ajeetabh says:

    Bahut bahut shukriya Mithlesh Ji tareef aur hausla afzai ke liye 🙂

    Aapse tareef milna bahut badi baat hai mere liye. Shukriya 🙂

  5. Shikha saxena says:

    खूबसूरत कहानियों के लिए बधाई आप सबको और बहुत-बहुत शुक्रिया आज सिरहाने का हम हमको प्रोत्साहित करने के लिए और इस मंच के लिए ..
    शुक्रिया मिथिलेश जी का भी …बहुत कुछ सीखा है मैंने उनसे और मिजाज़ जी का भी कि उनके स्केच ने इतनी खूबसूरत कहानियों को उभारा

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