Suryakant Tripathi .. An essay by Inder Pal Singh


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श्री सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’ का नाम, नवीन हिन्दी साहित्या के सर्वाधिक महत्वपूर्ण नामों में से एक है। निराला जी का जन्म 21 फरवरी 1896 को बंगाल प्रांत के मिदनापुर ज़िले में हुआ था। उनकी शिक्षा का माध्यम बांग्ला होने पर भी, अपनी बुद्धिमत्ता और स्वतंत्र अध्ययन कौशल के बल पर उन्‍होने पुर्व युवावस्था में ही बांग्ला, संस्कृत, अँग्रेज़ी और हिन्दी में समान निपुणता प्राप्त कर ली।
 
निराला जी ने जयशंकर प्रसाद, सुमित्रानंदन पंत और महादेवी वर्मा के साथ छायावाद के सःस्तंभ की भूमिका का निर्वहन करते हुए छायावादी लेखन शैली का मार्ग प्रशस्त किया। उनकी प्रसिद्ध रचना, ‘अनामिका’ और ‘परिमल’ का छायावाद के उत्तम एवं मूल उदाहरण के रूप में स्मरण किया जाता है।
 
उनकी कृतियों को उनके जीवन पर्यंत, कभी कोई विशेष मान्यता अथवा ख्याति प्राप्त नहीं हुई। उनकी लेखन शैली का स्वछ्न्द और नवीन परिवेश अपने आप में किसी साहित्यिक क्रांति के समरूप था। जिसके परिणाम स्वरूप उस समय के प्रकाशक उनकी रचनाओं को स्वीकार नहीं कर पाते थे। सामाजिक शोषण को उनकी रचनाएँ प्रतिवाद के स्वर प्रदान करती थीं। उन्होंने कहानियाँ उपन्यास और निबंध भी लिखे हैं किन्तु उनकी ख्याति विशेषरूप से उनकी कविताओं के कारण ही है।
 
निराला जी की लेखनी में वेदों, राष्ट्रवाद, आध्यात्म, प्रकृति प्रेम और प्रगतिशील मानवतावादी सिद्धांतों के सृजन और संगम की सुंदर झलक देखने को मिलती है।
 
साहित्य, धर्म, पुराण से ले कर समकालीन सामाजिक एवं राजनीतिक प्रश्न उनके विशेष विषय सूत्रों में से थे।  उन्होने हिन्दी साहित्या में पद्य रहित और छंद मुक्त काव्या को आरंभ किया।  उनकी कविताओं का छंद रहित किंतु भाव रस प्रमुख होना.. पद्य रहित किंतु सौंदर्या एवं प्राकृतिक प्रेम से परिपूर्ण होना.. उनकी अग्रणी छायवादी शैली का हस्ताक्षर है। अपनी इन्हीं बहुमुखी और अनूठी प्रतिभाओं के कारण उन्हें ‘निराला’ उपनाम मिला. उनकी कविता, ‘सरोज स्मृति’ अपनी पुत्री के प्रति उनकी भावनाओं और संवेदनाओं को दर्शाती उनकी सर्वोत्तम रचनाओं में से एक है।
 
निराला जी का देहांत 15 अक्टूबर 1961 को अलाहाबाद में हुआ। ‘निराला’ अपना जन्म-दिवस वसंत पंचमी को ही मानते थे। निराला जी स्वामी रामकृष्ण परमहंस, स्वामी विवेकानंद और गुरुदेव रबीन्द्रनाथ टैगोर को अपना प्रेरणा स्त्रोत मानते थे। हिन्दी साहित्या में आज विभिन्न प्रकार के वैचारिक और रचनात्मक खंड होते हुए भी निराला जी निर्विवादित रूप से सर्वमान्य और सर्व सम्मानित हैं।
 
निराला जी के जीवन से जुड़ा एक प्रेरक प्रसंग का उल्लेख करना चाहूँगा:
 

प्रधानमंत्री नेहरू अपनी चीन यात्रा से लौटने के पश्चात अपने गृहनगर, अलाहाबाद में एक रैली को संबोधित कर रहे थे जो निराला जी का भी निवास स्थान था. कविवर अग्रिम पंक्ति में अपनी देह पर तेल मल कर अर्ध वस्त्रों में बैठे थे. पहलवानी के प्रति उन में लगन और उत्साह था. वो

 सीधे अखाड़े से आए थे. व्यायाम के उपरांत चमकता हुआ शरीर, उस पर सफेद बाल और सफेद दाढ़ी में वो सबसे अलग प्रतीत हो रहे थे. पंडित नेहरू ने अपने एक-दो प्रशंसकों से माला ग्रहण की और अपना भाषण आरंभ करने से पहले बोले, “मैं चीन से आया हूँ. वहाँ मैने एक कहानी सुनी

 जिसमें एक राजा के दो बेटे थे. एक बुद्धिमान और दूसरा मूर्ख. जब दोनो बड़े हुए तो राजा ने मूर्ख बालक से कहा की तुम राज्य संभालोगे क्योंकि तुम सिर्फ़ राजा बन ने योग्य हो. किंतु मेरे बुद्धिमान बेटे का जन्म इस से कहीं बड़े कार्यों के लिए हुआ है इसलिए ये कवि बनेगा.” अपने इन्हीं शब्दों के साथ उन्होने पुष्प मालाओं को अपने गले से निकाल कर आदरस्वरूप निराला जी के चरणों की दिशा में उछाल दिया.


जहाँ “अनामिका” काव्या संग्रह का “आवेदन” नामक गीत, सकारात्मकता और आशावाद की छवि प्रस्तुत करता है, वहीं दूसरी ओर उनकी कविता “भिक्षुक” सामाज में विद्यमान दारिद्र्‌य और विषाद को दर्शाती है। दोनो ही निम्न रचनाओं में निराला जी की उत्कृष्ट छायवादी शैली की झलक मिलती है:

~ आवेदन ~

फिर सवाँर सितार लो!

बाँध कर फिर ठाट, अपने

अंक पर झंकार दो!

 

शब्द के कलि-कल खुलें,

गति-पवन-भर काँप थर-थर

मीड़-भ्रमरावलि ढुलें,

गीत-परिमल बहे निर्मल,

फिर बहार बहार हो!

 

स्वप्न ज्यों सज जाय

यह तरी, यह सरित, यह तट,

यह गगन, समुदाय।

कमल-वलयित-सरल-दृग-जल

हार का उपहार हो!

 
 

~ भिक्षुक ~

 

वह आता–

दो टूक कलेजे के करता पछताता

पथ पर आता।

 

पेट पीठ दोनों मिलकर हैं एक,

चल रहा लकुटिया टेक,

मुट्ठी भर दाने को– भूख मिटाने को

मुँह फटी पुरानी झोली का फैलाता–

दो टूक कलेजे के करता पछताता पथ पर आता।

 

साथ दो बच्चे भी हैं सदा हाथ फैलाये,

बायें से वे मलते हुए पेट को चलते,

और दाहिना दया दृष्टि-पाने की ओर बढ़ाये।

भूख से सूख ओठ जब जाते

दाता-भाग्य विधाता से क्या पाते?–

घूँट आँसुओं के पीकर रह जाते।

चाट रहे जूठी पत्तल वे सभी सड़क पर खड़े हुए,

और झपट लेने को उनसे कुत्ते भी हैं अड़े हुए!

संदर्भग्रंथ स्रोत:

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