Dhoop Ka Tukda : Shikha Saxena

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SHIKHA SAXENA 

धूप का टुकड़ा 

जब छाने लगते हैं 
निराशा के बादल …
और होने लगती हैं
बेमौसम अनचाही बारिशें …
तभी आ जाता है 
उड़ता हुआ …
पता नही 
कहाँ से
एक धूप का टुकड़ा …
उम्मीद से भरा हुआ …
और जागने लगती हैं
फिर से ..
जीने की ख्वाहिशें ..
 

लिखते तो बचपन में थे 

अब तो सिर्फ पन्ने भरते हैं ..
लिखते तो बचपन में थे

आड़ी-तिरछी रेखाएँ ..

उल्टे-सीधे शब्द  ..
हर गोल चीज सूरज बन जाती थी …

पहाड़ों से नदी बह जाती थी ..
मंज़िल तक पहुँचना तब कितना था आसान

हर टेढ़े-मेढ़े रास्ते पार हो जाते थे
लिखने की कोई वजह ही नही थी

लिखना खुद में एक वजह था
रंगीन दुनिया थी..

हर रंग की अपनी कहानी थी
फैले रहते थे बेतरतीबी से पूरे पन्ने पर

पंक्तियों में सजना शायद पसंद ही नही था ….
उस बिखराव में कितनी खूबसूरती थी …

भटक गयी है जो आज कहीं ..

Shikha Saxena @shikhasaxena191

Segment Coordinator : Ritu Dixit

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2 Comments Add yours

  1. बिलकुल सही कहा है अपने 🤗🤗🤗🙏

  2. बहुत खूब.. लिखते तो बचपन में थे 😊👍

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