Bikharte Hue Rang : Shikha Saxena

Kahani Suhani : Selected Stories : First Winner

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बिखरते हुए रंग
लेखिका : शिखा सक्सेना 

“चंदर फूलों का बेहद शौकीन था । सुबह घूमने के लिए उसने दरिया किनारे के बजाय अल्फ्रेड पार्क चुना था क्योंकि पानी की लहरों के बजाय उसे फूलों के बाग के रंग और सौरभ की लहरों से बेहद प्यार था और उसे दूसरा शौक था कि फूलों के पौधों के पास से गुजरते हुए हर फूल को समझने की कोशिश करना । अपनी नाजुक टहनियों पर हँसते-मुस्कुराते ये फूल जैसे अपने रंगो की बोली में आदमी से ज़िंदगी का जाने कौन-सा राज कहना चाहते हैं और ऐसा लगता है कि जैसे हर फूल के पास अपना व्यक्तित्व संदेश है जिसे वह अपने दिल की पंखुड़ियों में आहिस्ते से सहेज कर रखे हुए है कि कोई सुनने वाला मिले और वह अपनी दास्ताँ कह जाए ।

और वैसे भी आज चंदर का जी भी कुछ उदास सा था..और आज उसे लग रहा था कि कोई उसकी भी दास्तान सुने चुपचाप से, बिना कुछ कहे और इन फूलों से अच्छा और कौन हो सकता था

शादी का सारा उत्साह खो सा गया, सारी भावनाएँ पलट गई हो जैसे गौरी के लिए ..अगर ये बात पहले ही पता चल जाती तो ये शादी तो वो कभी ना करता और अब उसे गुस्सा आ रहा था

कुछ अनुमान तो उसे पहले ही दिन हो गया था लेकिन उसने उसे मायके से बिछोह का दुख ही समझा और आज सुबह गौरी के उठते ही उसने उसे अपने पास खींच कर बैठाना चाहा तो गौरी के धक्का देने पर हतप्रभ रह गया और उससे भी ज्यादा उसकी बातों से कि वो ये शादी चाहती ही नही थी बल्कि उसकी पहली पसंद इंदर था ..इंदर उसका छोटा भाई ..तो ये बात गौरी ने पहले क्यों ना बताई ..सोचते-सोचते सर में दर्द हो गया उसके और सुबह की चाय पिये बिना ही सैर पर निकल आया पार्क में

तो ये वजह थी गौरी के बार-बार घर आने की और उसने ये आकर्षण अपने लिए समझ लिया ..और वो भी तो कितना पसंद करने लगा था उसे ,एक नदी की तरह चंचल गौरी ..जिसके साथ वो बहना चाहता था

घर जाने का मन ना होने के बावजूद भी जाना पड़ा ..माँ ने सर सहलाते हुए सुबह चाय पिए बिना जाने की वजह पूछी तो मन किया फफक कर उनकी गोदी में रोने का लेकिन बड़े होना आपको संवेदनाओं को छुपाना सीखा देता है

लेकिन अब क्या? ऐसे तो वो ज़िंदगी गुज़ार ही नही सकता ..गौरी से बात करनी ही होगी उसे

“तुम ये बात पहले भी बता सकती थी” .. चंदर का स्वर शांत और ठंडा सा था

“हमारे घर में बड़ों की राय के आगे कोई कुछ नही कह सकता..”

“तो फिर मुझसे ही क्यों कहा” ..कहना चाह कर भी चंदर कह ना पाया

लेकिन एक दीवार सी खींच ली उसने अपने और गौरी के दरम्यान

हाँलकि ये दीवार कभी-कभी गौरी ने तोड़ने की उत्सुकता भी दिखाई लेकिन चंदर तो जैसे बिल्कुल ही भावहीन हो गया हो,

जो चीज हमारे पास हो उसकी कद्र नही रहती लेकिन जब वही दूर जाती दिखती है तो सारी अच्छाई नज़र आने लगती है ..गौरी को भी इंदर की जो बातें आकर्षक लगती थी अब उबाऊ सी लगने लगी ..हर लड़की से हंस कर बात करना तो उसकी आदत में ही था ..मुँह से लगी सिगरेट के उड़ते छल्ले अब उसे उसके अंदाज नही बुरे लगते थे ..लापरवाही और घर  के प्रति उसकी गैरजिम्मेदारी उसे भाते ना थे इसके विपरीत उसे चंदर में ये सारी खूबियाँ नज़र आने लगी थी ..उसकी इच्छा का मान रखते हुए उसने गौरी से दूरी बना रखी थी और अब गौरी को अपनी पसंद पर अफसोस और पिता की पसंद पर गर्व हो रहा था

ऑफिस में प्रमोशन के साथ ट्रांसफर के ऑफर को जो चंदर सिर्फ घर ना छोड़ने की वजह से ठुकरा चुका था वही जब इसके लिए तैयार हो गया तो बाॅस को बड़ा आश्चर्य हुआ और व्यंग्य से मुस्कुराते हुए बोले “”तो चंदर जी शादी के बाद आप भी अकेले ही रहना चाहते है”” चंदर बस मुस्कुरा कर रह गया..घर में बात पता चलते ही गौरी को लगा कि कैसे रहेगी वो चंदर के साथ और माँ को बड़ा दुख हुआ

“बेटा मुझे कम से कम तुमसे ऐसी उम्मीद नही थी..”

“नही माँ आप गलत समझ रही हो मैं अकेले ही जा रहा हूँ, गौरी यही रहेगी..”

“हैं!! तो क्या गौरी यहाँ अकेले रहेगी..”

“अकेली तो वहाँ पड़ जाएगी माँ, यहाँ तो आप सब हो अभी नई है ना..”

ओट में खड़ी गौरी को लगने लगा कि जैसे किसी भँवर में वो फँस चुकी है जिसका कोई किनारा नही है

“तुम चिंता मत करो मैं जाते ही तलाक के पेपर भिजवा दूँगा .. तुम पर कोई इल्ज़ाम नही आएगा..”

सुनकर दंग रह गई थी गौरी ..  चंदर अभी भी उसी की फिक्र कर रहा था

और आखिर चंदर पहुँच ही गया, अपनी नई जगह नया जीवन शुरू करने.. उस दिन सामान भी ना लगा पाया, शरीर से ज्यादा मन थका हुआ था ..क्या सोचा था और क्या हो गया, एक खालीपन सा जैसे आ गया हो जीवन में

फिर अगले दिन ऑफिस ..जो इतना बुरा भी नही था, लेकिन घर पहुंचकर बहुत अकेलापन लगा, पहली बार परिवार से अलग रहना .. बेमन से फिर सामान लगाना शुरू किया कि बैग में रखा एक गुलाबी पत्र मिला

चंदर,

कई बार हमें सतह के ऊपर की लहरें अच्छी लगती हैं पर बाद में पता चलता है कि समंदर की असली गहराई से उसका कोई संबंध नही ..मैं कितनी गलत हूँ इसका एहसास मुझे आपके जाने के ख्याल भर से हुआ .. मैं और क्या लिखूँ बस यही कि लहरों से हमें किनारे तो मिल जाते हैं लेकिन मैं समुंदर के दिल की गहराई में डूबना चाहती हूँ ।

पत्र पढ़ कर चंदर हल्का सा रुआंसा हो गया .. उसका मन हुआ की गौरी को डांटे कि ये सब क्या लगा रखा है .. लेकिन वो अन्दर से मुस्कराहट खुद से ज्यादा देर न छिपा सका ..और उसी समय अपने ऑफिस पत्र लिखने बैठ गया.. वापस उसी जगह भेजने के लिए .. फूलों के रंग उसकी ज़िंदगी में भी बिखरने लगे थे।


अप्रतिम मनोहारी कहानी है जिसकी प्रत्येक पंक्ति में उत्कृष्ट कथा लेखन के तत्व परिलक्षित होते हैं। न केवल कथानक उत्तम है वरन उसे श्रेष्ठ भाषा, संवादों एवं शैली के अद्भुत कौशल से प्रस्तुत किया गया है। शब्दों के अनावश्यक प्रयोग से परहेज करते हुए शांत संयत प्रवाह को स्थान दिया गया है तथापि इन्हें कथा की भूमिका, परिवेश एवं दृश्यों को और विस्तार प्रदान करना होगा। 

शिशिर सोमवंशी
मार्गदर्शक : कहानी सुहानी

6 Comments Add yours

  1. Kitni khoobsurat kahani! Ek clue, ek paragraph ke basis par itne sunder tareeke se vyakt karna aasan nhi hai! Saare bhavoṅ ko bahut acche se darshaya hai! Sadhuvad!

    1. बहुत-बहुत शुक्रिया 🙂

  2. बहुत खूबसूरत कहानी.. इतनी खूबसरती क्लू को कहानी में पिरोया गया है कि लगता ही नहीं ये किसी और कहानी का हिस्सा है.. शिखा जी आपका लेखन तो हमेशा से मन लुभाता आया है.. आपकी जितनी तारीफ की जाए कम है

    1. शुक्रिया सुप्रिया 🙂

  3. शुकिया #आजसिरहाने का..पहली बार इस मंच पर इतनी लंबी कहानी लिखी, ये एक आगे कदम बढ़ाने जैसा है.. और मुझे उम्मीद है कि आप सबके साथ ये सफर चलता रहेगा और नित नई मंज़िलें हासिल होगीं
    शिशिर जी आपका बहुत-बहुत धन्यवाद कहानी पसंद करने और आपकी बहुमूल्य टिप्पणियों के लिए ..जो हमेशा पथप्रदर्शन करती रहती हैं और उत्साह बढ़ाती रहती हैं ।

  4. शिखा जी एक बहुत बहुत बधाई। बहुत खूबसूरती से गढ़ा है आपने इस कहानी को चंदर और गौरी के संक्षिप्त संवाद किन्तु सागर से गहरे विचारों को मूर्त रूप देना किसी शिल्पकार से कम नहीं। पुनः बधाई!!

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