Tasveer : Anshu Bhatia

Kahani Suhani : Selected Stories : Third Winner

il_340x270-550963462_9s5oतस्वीर
लेखिका : अंशु भाटिया 

चंदर फूलों का बेहद शौक़ीन था| सुबह घूमने के लिए उसने दरिया किनारे की बजाय अल्फ्रेड पार्क चुना था क्योंकि पानी की लहरों की बजाय उसे फूलों के बाग़ के रंग और सौरभ की लहरों से बेहद प्यार था| और उसे दूसरा शौक था कि फूलों के पौधों के पास से गुज़रते हुए हर फूल को समझने की कोशिश करना| अपनी नाज़ुक टहनियों पर हँसते मुस्कुराते हुए ये फूल जैसे अपने रंगों की बोली में आदमी से ज़िन्दगी का जाने कौन सा राज़ कहना चाहते हैं | और ऐसा लगता है कि जैसे हर फूल के पास अपना व्यक्तिगत सन्देश है जिसे वह अपने दिल की पंखुरियों में आहिस्ते से सहेज के रखे हुए है कि कोई सुनने वाला मिले और वह अपनी दास्ताँ कह जाए|

चंदर अपना कैमरा लेकर आगे बढ़ा और कई सारी तसवीरें उतार ली| उसे बहुत पसंद है अलग-अलग फूलों की तस्वीरें लेना….साथ तितलियाँ, चिड़ियाँ और भंवरें भी मिल जाए तो सोने पर सुहागा| उसके कमरे की दीवारें फूलों की तस्वीरों से अटी पड़ी थी| रंग-बिरंगे फूल….दिन के अलग-अलग समय पर कैमरा में कैद किये गए, एक अलग ही आभा बिखेरते थे| अगर तस्वीरों में से खुशबू और आवाजें आ सकती तो उसका कमरा किसी उपवन सा चहकता व महकता हुआ लगता| तसवीरें खींच कर चंदर ने कुछ ज़रूरी काम निपटाए और घर आ गया|

घर क्या था….छोटा सा एक कमरा और रसोई घर था| कमरे में घुसते ही एक जूते की अलमारी थी…बिलकुल छोटी सी…..जो की उसके कमरे के आकर के अनुरूप बिलकुल सही थी| कुछ जूते उसके भीतर थे और कुछ बाहर बेतरतीबी से बिखरे पड़े थे| पास ही एक छोटा सा सोफा-कम-बेड रखा था…. सामने की तरफ एक छोटी सी टेबल जिसपर कुछ किताबें और कुछ खाने-पीने का सामान बिखरा था| एक कोने में अधखुली अलमारी थी और दूसरे कोने में एक डस्टबिन रखा था….उसके चारों ओर भी वही जूतों की अलमारी वाला आलम था| थोडा कचरा अन्दर और थोडा बाहर बिखरा हुआ था| खूँटी पर उसकी जीन्स, टी-शर्ट और पतलूने टंगी हुई थी| बाहर खिड़की में कुछ कपडे सूख रहे थे| घर में एक अजीब सी गंध थी, जो शायद हर अकेले रहने वाले लड़के के कमरे में पायी जाती है!! बाकि घर की तरह रसोई घर भी अछूता न था….वहां पर भी कुछ सामान शेल्फ के अन्दर और कुछ बाहर स्टैंड पर ही बिखरा हुआ था| ये तो गनीमत है कि उसकी माँ पिछले हफ्ते उससे मिलने आयीं थीं और जाने से पहले सारा घर और रसोई घर साफ़ कर गयीं थीं|

वैसे तो अन्दर की बात है किसी से कहियेगा नहीं…जब उसकी माँ ने झाडू लगायी थी तो सोफा-कम-बेड के नीचे से कई महीनों की मेहनत से दबाया गया मलबा (चिप्स, बिस्किट्स, चॉकलेट इत्यादि के खाली पैकेट्स) निकला था| इस पर उसे जम कर डांट भी पड़ी थी| वो भी इंसान से कब चिकने घड़े में तब्दील हो गया था उसे भी खबर न थी| ऐसी छोटी-मोटी डांट-डपट से उसके कान पर जूँ तक न रेंगती थी| माँ को गए अभी एक ही हफ्ता तो हुआ था…अभी से सोफे के नीचे….फ्रिज के पीछे….कूड़ेदान के आसपास उसकी छोड़ी हुई निशानियाँ मिलने लगी थी| केवल छत से टंगा पंखा और ट्यूबलाइट ही उसकी हरकतों के दुष्परिणामों से बचे हुए थे| उसका परिवार अभी भी गाँव में रहता था| शहर में वो अकेला था और उसके साथ थी ये फुलवारी जिसे देख वो फूला न समाता था|

 उसने अपने लिए खाना बनाया और खाते हुए आज का इकठ्ठा हुआ खज़ाना…वही उसकी तस्वीरें, देखनें लगा| कुछ तस्वीरें उसने अपने फ़ोन में से हटा दीं| कुछ को उसने रख लिया| एक तस्वीर बड़ी अजीब सी नज़र आ रही थी, गुलाबी फूलों और हरी पत्तियों के बीच कुछ नीला सा दिखाई दे रहा था…घास तो हरी होती है!! ये क्या था फिर?? उसने थोडा ज़ूम कर के देखा, मगर ज़्यादा कुछ समझ न आया| अब तक उसका खाना भी ख़त्म होने के कगार पर था| उसने झटपट बर्तन धोकर टोकरी में रखे और फ़ोन को लैपटॉप से जोड़ दिया| तसवीरें लैपटॉप में डालते हुए उसे उस अजीब सी तस्वीर का ख़याल आया| उसे लगा कि फ़ोन में जो नज़र नहीं आया वो उसे लैपटॉप के स्क्रीन पर साफ़-साफ़ नज़र आ जाएगा|

तस्वीर बड़ी करते ही उसके होश उड़ गए| वो हवा के पंख लगाकर उसी पार्क की ओर भागा| रात के 9.30 बज चुके थे और पार्क बंद हो चुका था| असली समस्या तो अब आन खड़ी हुई थी| कैसे घुसा जाए पार्क में?? बाहर कितने सारे लोग सैर के लिए आये हुए थे| इतने सब लोगों के बीच अगर वो चारदीवारी फांदने की कोशिश करेगा तो सबकी नज़रों में आ जायेगा| वो भी हौले-हौले से वहां टहलने का नाटक करने लगा और सबकी नज़रें बचा कर एक बड़ी सी झाड़ी के पीछे छिप गया| थोड़ी देर बाद उसने झांककर देखा, भीड़ कम हो गयी थी, आसपास कोई न था| वो झट से दीवार पर चढ़ गया और सीधा अन्दर की ओर कूद गया| इस जद्दोजहद में उसकी कोहनी भी छिल गयी थी, वहां हल्का सा खून भी बहने लगा था| उसने जल्दबाज़ी में अपनी शर्ट पर से ही हाथ पोंछ लिया| अब इतने बड़े पार्क में वही ठिकाना कैसे ढूँढा जाए जहाँ की वो तस्वीर थी| उसने फिर से एक बार फ़ोन में झाँक कर देखा| 10.30 बज चुके थे| वो एक और घंटा देरी से यहाँ पहुंचा था| अब तक तो अर्थ का अनर्थ हो चुका होगा|

तेज़ी से चलती हुई अपनी ही साँसों की आवाज़ें उसके कानों में गूँज रही थी| उसने अपना रूमाल निकाला, अपनी कोहनी साफ़ की और अपने माथे पर छलका हुआ पसीना पोंछा| तस्वीर में उसने समझने की कोशिश कि वो जगह ठीक-ठीक किस तरफ होनी चाहिए| थोडा गौर करने पर उसे पाया की पीछे की तरफ एक दवाखाने का होअर्डिंग नज़र आ रहा था| उसने चारों ओर नज़रें दौडाई| ठीक सामने की ओर उसे वही होर्डिंग नज़र आया| वो उसकी ओर दौड़ पड़ा| पार्क मं  एक कृत्रिम झरना और छोटी से नदी बनाये गए थे| दिन  में तो उनकी आवाजें कोलाहल में दबी से रहती थी मगर रात के सन्नाटे में वो बहुत भयंकर सी प्रतीत होती थीं| उसी कृत्रिम नदी के ऊपर बने पुल पर भागता हुआ वो दूसरे किनारे पहुंचा और झाड़ियों के पीछे की ओर लपका| ये क्या??? उसके मुंह से चीख निकल गयी| उसका सारा जिस्म सुन्न हो गया और वो नीम बेहोशी की हालत में गिर पड़ा|

वो जो नीली शर्ट उसे तस्वीर में नज़र आई थी वो इस बच्चे की थी, जिसका जिस्म भी कई सारी जगह से जैसे उस शर्ट का रंग अपनाकर नीला सा नज़र आ रहा था| कहीं-कहीं उसपर चींटियाँ घूम रही थी, कहीं से चूहे भी कुतर गए थे| खून बहकर सूख भी चुका था| उसका जी घबराने लगा, उसने मुंह फेरा और कै कर दी| वो हैरत में पड़ गया| एक दिन में कितने हजारों लोग इस पार्क में आया-जाया करते हैं| वो कैसे पता लगाए की ये कौन था? और इतने सारे लोगों में से किसी का ध्यान भी नहीं गया कि यहाँ झाड़ियों के पीछे क्या हुआ, क्या पड़ा हुआ था!! उस बच्चे की लाश की ओर देखने की उसकी हिम्मत नहीं हुई| उसने उसके आस-पास गौर से देखने की कोशिश की, वहां उसे एक पहचान-पत्र पड़ा हुआ मिला, जो कि बच्चे की स्कूल का था| वो उठाकर उसने अपनी जेब में रख लिया| बच्चे का एक जूता कुछ दूर पर पड़ा था| दुर्भाग्यवश आज अमावस की रात थी, चांदनी का भी साथ नहीं मिल पा रहा था उसे| उसने अपने मोबाइल की फ़्लैश लाइट जलाई और आसपास देखने लगा| वहां उसे कुछ टूटे हुए बटन भी मिले, बिना सोचे समझे उसने वो भी अपनी जेब में ठूस लिए| अचानक से एक आवाज़ आई “ठक्क!!” ऐसा लगा कि वो किसी गहरी खायी में गिर रहा है, गिरता ही जा रहा है, बहुत गहरे, बहुत नीचे…… इसके बाद क्या हुआ ये चंदर को भी याद नहीं….

धीरे-धीरे उसने अपनी आँखें खोली, उसके माथे पर पसीना छलक आया था, ऐसा लगता था सैकड़ों चींटियाँ उसके चेहरे पर चल रहीं थीं, वो अपना रूमाल निकाल कर उसे पोंछना चाहता था, मगर उसके हाथों ने उसके मस्तिष्क का कहना मानने से मना कर दिया, उसने गौर से देखा….ये क्या वो एक कुर्सी से बंधा हुआ था!! सामने कुछ लोग पुलिस की वर्दी में थे और पार्क का चौकीदार भी खड़ा था| भयभीत हो उसने अपनी आँखें बंद कर लीं, मन ही मन ईश्वर को याद किया और मन्नत मांगी कि ये एक दुस्वप्न हो| दुबारा आँखें खोलने पर दृश्य बदला सा लगा| पुलिस वालों की संख्या इस बार पहले से दुगुनी हो गयी थी| चौकीदार के चेहरे से घृणा टपक रही थी| वो कुछ समझ पाता इसके पहले चारों ओर से उसपर सवाल दाग दिए गए|

“बता, क्या किया तूने इस बच्चे के साथ?”

“क्यों मारा बे इसको?”

“क्या चाहिए था तुझे?”

“इसको किधर से उठाया?”

“कैसे और कब मारा?”

वो घबराहट में हकलाने लगा, “ मैंने….मैं…..नहीं…..मैं नहीं जानता इसको…..मैं….मैं क्यों …..मैं क्यों मारूंगा इसको?……मुझे छोड़ दो……छोड़ दो….मैंने केवल फोटो खींचा था…..मैंने कुछ नहीं किया….मैं……”

इसके पहले की वो कुछ समझ पाता एक झन्नाटेदार थप्पड़ उसके गालों पर रसीद हो चुका था| उसे सारा कमरा घूमता हुआ सा प्रतीत हुआ| सवाल अभी तक उछाले जा रहे थे| उसने शांत होकर अपना दिमाग दौडाना शुरू किया| किसी बच्चे का खून किया जा चुका है और ये लोग सोच रहे की खूनी वो है| इस भारी मुसीबत से बचने का कोई उपाय तो सोचना ही पड़ेगा, वरना सारी ज़िन्दगी जेल में सड़ना पड़ेगा, वो भी बिना किसी कुसूर के|

उसने बहुत धीरज और दृढ़ता से कहा, “आप चाहें तो मेरी तलाशी ले लें, मेरे घर की तलाशी ले लें, मेरा कोई लेना-देना नहीं है इस बच्चे से, सिवाय इसके की कल शाम मैंने पार्क में कुछ तस्वीरें ली थी, उनमें से एक में मुझे ये बच्चा नज़र आया, रात हो चुकी थी, मैं पार्क की ओर लपका, अगर मैं चौकीदार से कहता तो वो मुझे हरगिज़ अन्दर नहीं जाने देता, इसलिए मैं दीवार फांद कर अन्दर गया| आप चाहें तो मैं सही-सही वो जगह भी दिखा सकता हूँ, मेरी कोहनी पर चोट भी लगी थी इसी प्रयास में……झाड़ियों के पीछे मैंने इस बच्चे को मृत अवस्था में पाया….और फिर….मुझे कुछ याद नहीं…..”

सभी अभी तक उसे घूर रहे थे, वो एक बार फिर सफाई देते हुए बोला, “आप चाहें तो मेरे फ़ोन और लैपटॉप में समय का मिलान भी कर सकते हैं!! मैं झूठ नहीं बोल रहा….मेरा पता लिख लीजिये और अपनी ओर से पूरी तफ़्तीश कर लीजिये….मैं यहाँ तब तक रहूँगा जब तक आप चाहें…..”

पुलिस वाले एक-दूसरे की ओर देख रहे थे| ये देख कर वो एक हद तक आश्वस्त हो गया| पुलिस ने उसकी तरफ एक पहचान-पत्र और कुछ बटन बढ़ाते हुए पूछा, “ये कहाँ से मिले? क्या है ये?” उसने उन्हें बताया कि उसे वहीँ आसपास ये सब पड़ा हुआ मिला था और साथ ही साथ उसने अपने घर का पता बताया| उसकी रस्सी ढीली कर दी गयी और किसी मेहरबान ने पीने को पानी भी दिया|

6-7 घंटों बाद उसे ये कहकर छोड़ दिया गया कि वो बेक़सूर है| इतनी बड़ी मुसीबत से वो इतनी जल्दी छूट जाएगा उसे यकीन न था| जाते-जाते उसने एक हवालदार से पूछा कि असल में क्या हुआ था? उसका जवाब सुन अपना सा मुंह लेकर शून्य में ताकता हुआ वो अपने घर की ओर चल पड़ा…..

थोड़े से पैसों के लिए एक बच्चे को अगवा करके उसके घर से कोसों दूर लाया गया और चीख-पुकार से पकडे जाने के डर से उसे मार दिया गया!! अच्छा हुआ कि वो पहचान-पत्र और छीना-झपटी में टूटे बटन उसने अपनी जेब में रख लिए थे…..जिससे उसके स्कूल और बस कंडक्टर का पता लगाना आसान हो गया था…बस कंडक्टर!! कहता था मारना नहीं चाहता था ,सिर्फ मुंह बंद किया था, ज़्यादा देर हो गयी तो शायद उसका दम घुट गया था…हुह…कैसे लोग अपनी आत्मा की भी हत्या कर देते हैं??….

अपना फ़ोन, अपना लैपटॉप, अपना घर सब कुछ उसे पहले से बहुत भले लगने लगे थे…. अपनी कोहनी पर लगी चोट भी और वो रुमाल भी जो उसकी जेब से दीवार फांदने के बाद वहां गिर पड़ा था| मगर इस दुनिया की नयी तस्वीर उतनी भली न लगी उसे..


मुझे इस कथा की नवीनता एवं कहने में प्रवाह विशेष प्रभावित करता है। कथाकार भूमिका बनाता है, पात्र को और उसके परिवेश को प्रयत्न से स्थापित करता है तत्पश्चात घटनाओं के बदलते क्रम से बांधे रखता है। भाषा अच्छी है और संवाद उपयुक्त हैं। लिखते रहें।

शिशिर सोमवंशी
मार्गदर्शक : कहानी सुहानी 

 

2 Comments Add yours

  1. उफ़.. इतना सस्पेंस.. मैं तो डर गयी थी बीच मैं.. बहुत अच्छा लिखा हनी.. आपकी कहानियों में एक अलग प्रकार का खिंचाव होता है

  2. Bahut shukriya pakiza, aap bahut tareef karti hain jo ki mujhe bahut achchhi bhi lagti hain. 💐💐

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