Kahaani : Seeta : Anshu Bhatia

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“बिटिया सोने से पहले फूल बिस्तर पर से नीचे गिरा देना, वर्ना तुम्हारे प्यार की पूरी कहानी सुबह चादर पर उकेरी नज़र आएगी!!”

दुल्हन को कमरे में भेजती हुई चाची बोली। सीता खंभे के पीछे खड़ी कनखियों से पुष्पा को मोहन के कमरे में जाते हुए देख रही थी। पुष्पा के चेहरे पर उभरती हुई शर्म की लाली जैसे सीता के तन मन में एक गहरा घाव किये जाती थी। गालों पर उभरती हुई वो लाली अपने साथ यादों का एक कारवां भी लेती आयी थी…..         

सोचो तो जैसे कल की ही बात लगती थी। चौपाल से गुज़रते हुए बड़ी-बूढ़ियों की टीका-टिप्पणियां सुनकर उसे अपने बच्ची से युवती में परिवर्तित होने का अहसास हुआ…..और इसे यक़ीन में बदला चलते-फिरते फब्तियाँ कसते हुए मनचलों ने।  कैसे पूरे गाँव में उसके रूप के चर्चे हुआ करते थे!! शाम को तो चौपाल से निकलना दूभर था उसका, सभी की नज़रें उसका रास्ता रोके खड़ी रहती थी। मगर उसकी नज़रें तो केवल चंदू का इंतज़ार किया करती थी। दोनों दूसरी कक्षा तक साथ पढ़े। फिर सीता का शिक्षा से नाता टूट गया पर चंदू से न टूटा। बचपन में चौक में साथ खेलना और बड़े होने पर सबकी नज़रें बचा कर तालाब पर मिलना…..सब कुछ बदल गया था सिवाय उसके और चंदू की मित्रता के। बीतते समय के साथ उनकी घनिष्ठता भी बढ़ती गयी। सीता तो न पढ़ सकी, किन्तु चंदू नौकरी की तलाश में शहर चला गया, इस आस में कि कुछ रुपया इकठ्ठा कर सीता से ब्याह कर लेगा| मगर इंसान का सोचा भी कहाँ हर बार सच हुआ है!! उन्हें अलग-अलग रास्तों पर धकेल उनका भाग्य किसी और मोड़ पर खड़ा उनकी प्रतीक्षा कर रहा था। ऐसा मोड़ जिसे ढूंढ पाना शायद सभी के लिए संभव नहीं…..खैर….

सीता अपने ख़यालों में खोयी हुई बाकि काम निपटाने में माँ का हाथ बंटाने चौके की ओर चल पड़ी। बाहर मोहन और उसके दोस्तों की हंसी ठिठोली चल रही थी। जाने क्यों उसके क़दम खुद ही वहीँ रुक गए! ये चुहलबाज़ी, ये मस्ती-मज़ाक, ये रीत-रिवाज़ कितने पीड़ादायक हो सकते हैं, ये सीता की आँखें बयान कर रही थी। 

“सुबह खेत पर आने कोई जल्दी नहीं है भाई, मैंने और किशन ने काम बाँट लिए हैं, तू आराम से आ…..”

“अरे हाँ, ये आराम रोज़ रोज़ नहीं मिलेगा। परसों आना है….काम पर……रोज के बखत….तो कल जरा सो भी जाना…..”

“हाहाहा…..काम से याद आया, जरा तकिये के नीचे भी देख लेना, काम शुरू करने से पहले…..”

“और हाँ, आज कुण्डी लगाना न भूलना…”

तभी वहां पर उसका बेटा आदित्य एक नया शगूफा ले हाज़िर हुआ,”मामा आज आपकी शादी हुई है, आज तो मैं आपके पास ही सोऊँगा…. और न मामी को वो कहानी भी सुनाऊंगा जो आपने पिछली बार मुझे सुनायी थी….”

“नहीं नहीं नहीं….आज तो कहानी मामा ही सुनाएगा…..”

“हाहाहा!!!” सभी दोस्त ठहाका लगाकर हंस पड़े और हवा में उठती हुई हंसी की वो लड़ियाँ सीता को बिखेरती हुई कहीं खो गयीं। अपनेआप को ज्यूँ-त्यों समेटते हुए वो बाहर आदित्य को लिवाने चल पड़ी।

“आजा मेरा राजा बेटा, चल ऊपर छत पर चलें। आज पता है मैंने क्या देखा खेत में काम करते हुए…..आजा आजा …. चल चल यहाँ तो सभी सुन लेंगे….” उसे अपनी ओर खींचते हुए वो उसके कान में कुछ फुसफुसाई और उसे ले जीने की ओर बढ़ गयी। हाथ के इशारे से उसने मोहन के दोस्तों को जाने को कहा। माँ से तो उसने आँखों आँखों में ही बात कर ली|

आदित्य को सुलाते-सुलाते वो ख़ुद कब नींद के आग़ोश में चली गयी उसे भी आभास न हुआ। रात के वक़्त बगल में मोहन के कमरे से आती हुई चूड़ियों की खनक से उसकी नींद टूटी। वो फिर से सो जाना चाहती थी, फिर से सपनों की दुनिया में , जो कि उसे इस दुनिया से कहीं ज़्यादा प्यारी थी, खो जाना चाहती थी। पर ये कहाँ उसके वश में था!! करवट बदल वो कुछ देर अपने बिस्तर पर पड़ी रही। चूड़ियों की खनक और पायल की छनक जैसे उसे चिढ़ा रहीं थीं। उसने उन आवाज़ों से दूर जाना चाहा। मगर वो आवाज़ें, वो आवाज़ें तो जैसे उसका ही पीछा कर रही थी। जितना वो उनसे दूर भागती थी, वो उतनी ही तीव्रता से उसका पीछा किये जाती थी। उसका रोम-रोम पसीने से भीग चुका था। साँसे…..साँसे तो इतनी तेजी से चल रही थी कि जैसे उसके तन-मन में उठते हुए ज्वार से घबरा कर उसे ही छोड़ भाग जाना चाहती थीं।  भाग तो ख़ुद सीता भी जाना चाहती थी, अपने आप से, अपनेआप में उठते हुए इच्छाओं के इस बवंडर से, बवंडर जिसे वो पिछले चार साल से ख़ुद में दबा कर बैठी थी , बवंडर जो आज उससे संभाले नहीं संभल रहा था, बवंडर जो जाने क्या चाहता था, बवंडर जिसमें सीता अपने आप को खोती चली जा रही थी…..

वो घबरा कर उठ बैठी। हड़बड़ाहट में उसने तौलिया उठाया और गुसलखाने की ओर चल पड़ी। तन पर पड़ता हुआ ठंडा पानी भी ये आग बुझाने में असमर्थ था। अनायास ही सीता के हाथ उसके तन के मोड़ों पर चल पड़े। उसने अपने भीगे बदन को सहलाया, देखा और सराहा। स्पर्श, नज़र और सराहना जिससे वो वंचित थी। एक स्पर्श……केवल एक स्पर्श का कितना महत्व होता है किसी के जीवन में ये शायद वही समझ सकता है जिसे किसी ने चार सालों से स्पर्श ही न किया हो। किसी के स्पर्श की इतनी तीव्र इच्छा, वो जैसे चाहती थी कि कोई बाज़ार में से गुज़रते हुए उससे टकराता हुआ गुज़रे। खेतों में झुक कर काम करते हुए वो किसी की नज़रों का पीछा चाहती थी। मगर नहीं, ये सब नसीब नहीं था उसे…..

पिछले कुछ सालों के दृश्य जैसे सिमट कर उसकी आँखों के आगे तैरने लगे….उसके पति केशव का नौकरी की तलाश में शहर जाना और वहां दूसरी शादी कर लेना, बनिए का उसपर बुरी नज़र डालना और असफल होने पर पूरे गाँव में झूठी बदनामी करवा देना….औरतें भी छींटाकशी से बाज़ न आती….हर हाल में वो दृढ बनी रही| परन्तु आज तो उसकी दृढ़ता भी टूटती नज़र आती थी….ऐसे में भला कौन उसका हमदर्द बन सकता था? अनजाने, अनचाहे ही उसका मन उसे चंदू के ख्यालों में ले गया| दोनों आपस में शादी न कर सके मगर एक-दूसरे के साथ बिताए क्षण आज भी दोनों की स्मृतियों में जीवित थे। 

वो गुसलखाने की दीवार पर सर टिका कर रोती रही, कई क्षण ऐसे ही गुज़र गए। उसके आँसू सूख गए मगर कामनाएं उनका क्या?? वो तो पिछले चार साल में एक दानव का रूप धारण कर चुकी थी। सीता ने अपने गीले बदन को बिना पोंछे जैसे-तैसे साड़ी लपेटी और बाहर आ छत की मुंडेर पर बैठ गयी। नीचे साइकिल पर बैठ चंदू खेतों में जा रहा था। सीता भी उसी दिशा में जाना चाहती थी। उसके मन-मस्तिष्क ने उससे कुछ कहना चाहा, मगर वो आवाज़ उसके तन से निकलती हुई आह के आगे फीकी थी। वो जानती थी उसके भीतर के उबाल को चंदू की गर्म साँसे ही ठंडा कर सकती हैं| एक वो ही था जो इतने वर्षों में भी न बदला| सीता उतावली हो उठी उसके साथ कुछ क्षण फिर से जी लेने को….

अन्दर जाकर उसने आईने में ख़ुद को निहारा| उम्र के साथ-साथ चेहरे पर आई परिक्वता से उसकी सुन्दरता और निखर गयी थी| उसने अपने प्रिय लाल रंग की साड़ी में खुद को लपेटा, माथे पर बिंदी लगाईं और आँखों में काजल| बड़े अरसे बाद उसके चेहरे पर इक मुस्कान खिंची चली आई| ये सच था कि वो एक बेटी, बहन और माँ थी। मगर यह भी सच था कि वो एक शरीर भी थी। एक ऐसा सच जिससे कोई दूर नहीं भाग सकता, न ही जिसे कोई झुठला सकता था। सिर्फ़ और सिर्फ़ यही सच कुछ क्षणों के लिए उसका वजूद था। वो अग्निपरीक्षा में इतनी जली थी कि सोने से कुंदन हो चली थी।

सीता सभी तानों, उलाहनों और सामाजिक बंधनों को पीछे छोड़ चल पड़ी, अपने मन या यों कहें अपने तन की दिखाई राह|

लेखिका : अंशु भाटिया
संकलन : अग्नि परीक्षा


फुट नोट :

इस रोचक “अग्निपरीक्षा” संकलन की भाँति ही हम अन्य ऐसे कई संकलनों पर कार्यरत हैं । यह एक ऐसा अनोखा प्रयास है जिसमें संघ समीक्षा एवं टिप्पणियों के फलस्वरूप हम कहानियों को अंतिम रूप देकर आपके समक्ष प्रस्तुत करते हैं ।
यदि आप भी इस ‘विशेष’ कहानी लेखन कार्य मे भाग लेना चाहते हैं तो हम से ईमेल के द्वारा संपर्क करें ।

-धन्यवाद
आजसिरहाने
aajsirhaane@gmail.com

 

 

 

 

4 Comments Add yours

  1. mohdkausen says:

    बहुत ही अद्भुत और शानदार खासकर कहानी कहने की कला। बहुत कुछ सीखने को मिला। दिल से है इतने साहसिक तरीके से नारी की भाव् नाओ की बात करने के लिए।

    1. Shukriya Kausen bhai!!
      Aap jaise manje hue lekhak se tareef sun kar mann prasann ho gaya!!

  2. बेहद खूबसूरत वर्णन नारी ह्रदय में उपजने वाले भावों का.. कुछ सवाल जो हमेशा मुह खोले खड़े रहते हैं और इन सबसे परे जीवन

    बहुत बहुत बधाई आपको 👏👏👏

    1. Bahut shukriya pakiza!!
      Aapko achchi lagi kahani mera lekhan safal hua :))

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