Maithili : Ritu Dixit

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“क्या सोच कर रखा था, मम्मी-पापा ने यह नाम? कोई राजभोग तो मिला नहीं, न ही मैथिली जैसी लकी निकली की वनवास ही मिल जाए, कम से कम वहाँ तो चैन मिलेगा। जंगल में मंगल, वाह! अरे, पर मच्छर भी तो कितने होंगे वहाँ, यहाँ जैसे स्प्रे तो नहीं करा सकते हैं। ओह्हो, यह क्या ऊँट-पटाँग़ सोचे जा रही हूँ, रोटी सेको मैथिली जी जल्दी-जल्दी, वरना तुम्हारे भगवान राम की रूठते देर न लगेगी, यहाँ तो किसी धोबी की जर्रूरत भी नहीं!”
अपने आप से बड़बड़ाते हुए मैथिली जल्दी-जल्दी काम समेटने लगी।
जब राघव का रिश्ता उसके लिए आया था, तो सारा परिवार जैसे बावला सा हो गया था, राघव-मैथिली, यह जोड़ी तो जन्मों से बनी ही एक-दूजे के लिए है। कुंडली तो जैसे नाम से ही मिल गयी थी, समझ-बूझ तो सबकी वैसे ही ख़त्म थी। बंदा कैसा है, उसका स्वभाव, आदतें कैसी हैं, इनसे तो हमारी हिन्दुस्तानी शादियों का कोई सरोकार ही नही होता, बस एक अदद सरकारी नौकरी हो, तो सात ख़ून भी माफ़ हो जाते हैं। इसीलिए, जनाब आई.ए.एस राघव तो देखते ही देखते घर में सबकी आँखों के तारे बन गए। मैथिली के सारे गोल्ड मेडल उस आई.ए.एस पहचान के सामने फीके पड़ गए। 
आई.ए.एस होने के बावजूद राघव ज़मीन से जुड़ा हुआ इंसान था, किसी भी तरह के नौकर का घर में होना उसको गवारा नहीं था, इसीलिए मैथिली सारा दिन घर के काम में ही लगी रहती थी। कुछ महीने पहले, अपनी माताजी के बहुत ज़ोर देने पर आख़िर, झाड़ू-पोछा-बर्तन के लिए एक मेहरी रखने को तैयार हुए थे साहब। पर उसमें भी एक शर्त थी की उनको अपने सामने कभी मेहरी नहीं दिखनी चाहिए। अरे, मेहरी ही तो है, कोई मेनका थोड़ी ना है, जो तपस्या भंग कर देगी इन विश्वामित्र की। 
और यहाँ काम कर करके ख़ुद कोई मेहरी से कम लगने लगी है क्या मैथिली। पर फिर भी किचन की अलमारी के काँच पर अपने गालों पर झुक आयी बालों की एक लट को कानों के पीछे करते हुए आज भी उस खोयी हुई मैथिली की एक झलक तो आ ही जाती है। जब अपनी सेल्फ़ी फ़ेस्बुक पर पोस्ट करी थी तो कितने सारे कम्मेंट्स मिले थे, कितनी तारीफ़ों के पुल बांधे थे लोगों ने।बस तबसे ही चहक रही थी मैथिली। उसका आकर्षण आज भी कम नहीं हुआ है, यह फ़ीलिंग ही पूरे शरीर में रोमांच भर रही थी।
परसों ही सब्ज़ी ख़रीदते वक़्त नोट किया था उसने की एक शख़्स भी उसी समय सब्ज़ी ख़रीदने आता है और कनखियों से उसे देखता रहता है। अच्छा लगा था। 
फिर वही ऊँट-पटाँग़ बातें सोचने लगी तुम मैथिली। जब सीता मैया ही अग्नि-परीक्षा से नहीं बच पायी थी, तुम क्या सोचती हो, तुम बच जाओगी? याद है उसे, दूधवाले से उस दिन दरवाज़ा खोल कर दूध ले लिया था, इसी बात पर कितनी कलह हो गयी थी। अरे बाप रे, बाक़ी बातें तो सोचना भी गुनाह है। 
राघव का स्वभाव जान ने के बाद भी .. जाने क्यूँ फिर भी मैथिली राघव के दोस्त रघुवीर की आँखें अपने दिमाग़ से निकाल नहीं पाती है। ऐसा लगता है की वोह आँखें हर समय उसका पीछा करती रहती हैं। किसी बंधन में बँधा हुआ नहीं है रघुवीर। शादी उसने करी नहीं, ना कभी करने की इच्छा जतायी। बचपन का दोस्त है राघव का, हर सुख-दुःख में दोनों हमेशा साथ रहे हैं, इसीलिए घर पर भी बहुत आना-जाना होता है। पहले तो भाभी-भाभी किया करता था, पर पिछले कुछ महीनों से उसे सबसे छुप कर नाम से बुलाने लगा है, और उसकी वो आँखें, चंचल सी, हमेशा जैसे मैथिली के हृदय में झाँकने को बेताब रहती हैं। एक खिंचाव सा रघुवीर की ओर महसूस करने लगी है मैथिली भी। ऐसा लगता है उसे जैसे, रघुवीर को सब पता है उसके बारे में, उसे क्या पसंद है, क्या नापसंद है, जब शाम को साथ बैठते हैं कभी तो उसके पसंदीदा ग़ज़ल गायक का रिकॉर्ड लगा देता है। अभी थोड़े दिन पहले ही एक किताब जो मैथिली बहुत दिनो से ढूँढ रही थी, जाने कहाँ से ले आया था। मैथिली देखती ही रह गयी, अरे इसे कैसे पता चला। 
आजकल अपने आप को आइने में देखना फिर से अच्छा लगने लगा है उसको, सजना-सँवरना, भाने लगा है। कल जब तैयार हो रही थी, तो राघव को अपनी ओर अजीब नज़रों से देखते हुए एक बार तो सहम गई थी वो। कहीं उसकी चोरी पकड़ी तो नहीं गयी। पर जब राघव कुछ बोला नहीं तो साँस में साँस आयी उसकी। 
बेचैनी बढ़ने लगी है मैथिली की। अपने आप को संयमित क्यूँ नहीं कर पा रही है। राघव के साथ तो पहले भी असहज थी, अब तो और ज़्यादा होती जा रही है। फिर भी ऐसा क्यूँ लग रहा है की राघव अब बदलने लगा है, उससे बात करने लगा है, उसकी परवाह करने लगा है, छोटी छोटी बातों का ध्यान रखने लगा है। यह कैसा भँवर था, यह कैसी असमंजसता थी? क्यूँ नहीं समझ पा रही है वो? 
और आज, जब रघुवीर ने उसका किचन में आकर हाथ पकड़ा तो सकपका गई थी मैथिली। उस स्पर्श में एक अजीब सा रोमांच था, एक नयी-नवेली दुल्हन जैसी सिरहन थी। उस एक स्पर्श ने जैसे मन और तन की कितनी गहरी परतें खोल दीं। क्या यह सिर्फ़ एक जिस्मानी आकर्षण है या उससे ज़्यादा? 
राघव के अकस्मात् किचन में आ जाने से दोनों ही घबरा गए थे। हँसते हुए बोला भी राघव – ” कोई चोरी कर रहे थे क्या तुम दोनों? मैं सिर्फ़ सोडा लेने आया हूँ, यह भाभी-देवर के बीच मुझे नहीं पड़ना!” 
कितना विश्वास करता है वो हम दोनों पर, मुझसे भी ज़्यादा रघुवीर पर, एकदम अपने सगे भाई जैसा प्यार देता है। और मैं यह क्या करने चली हूँ? पर इस दिल का क्या करे? इसपर किसी का बस चला है कभी?
इसी उधेड़बुन में एक दिन हिम्मत करके मैथिली बाज़ार से सब्ज़ी लाते वक़्त रघुवीर के घर मुड़ ही गयी, सोचा उसको चौंका देगी, असल में तो रघुवीर को देखने की तड़प उसे बेचैन कर रही थी, २-३ दिनों से उसका घर आना जो नहीं हुआ था, राघव भी किसी टूर पर शहर से बाहर गया हुआ था। रघुवीर के घर का दरवाज़ा खुला हुआ था, चुपके से उसको ठेल कर अंदर दाख़िल हुई तो ड्रॉइंग रूम में कोई ना दिखा, पर अंदर वाले कमरे से कुछ आवाज़ें आ रही थी। जाने क्यूँ, मैथिली, जिसे कभी भी किसी की निजी ज़िंदगी में दख़लंदाज़ी पसंद नहीं थी, जिसकी वजह से वह किसी प्रकार के किटी पार्टी ग्रूप से भी कभी नहीं जुड़ पायी थी, आज बरबस ही अंदर की ओर खिंच पड़ी।
बेडरूम से दो आवाज़ों को सुन कर पहले तो ठिठक गई मैथिली, पर जब दोनों ही आवाज़ें जानी-पहचानी लगी, तो चेहरा फक्क पड़ गया उसका। धीरे से दरवाज़े की झिर्री से जो अंदर झाँका तो बुत बनकर वहीं खड़ी रह गई। 
बिस्तर पर पूर्ण नगनवस्था में राघव और रघुवीर एक-दूसरे को सहला रहे थे।
राघव – “बस, वीर, अब घुटन होती है मुझे वहाँ, मैं मैथिली को और सहन नहीं कर सकता।”
“पर राघव, तुम्हारे पास कोई दूसरा चारा भी तो नहीं है, अगर यह बात बाहर निकली तो? सरकारी नौकरी है हम दोनों की, बवाल मच जाएगा। आज भी समाज में हमारे रिश्ते को मान्यता नहीं मिलेगी।”
“फिर क्या करूँ मैं ?”
“मेरी मानो तो, अभी ऐसे ही चलने दो, टूर के बहाने हम दोनों एक दूसरे के साथ रह ही सकते हैं। रही बात मैथिली की, वह तो हम दोनों में उलझ कर रह ही गई है वैसे भी, मैं यह देख सकता हूँ।”
और सुना ना गया उससे, सफ़ेद फक्क हुए चेहरे को सम्भाले किसी तरह से लड़खड़ाती हुई वहाँ से निकल गयी मैथिली। यह क्या हो रहा है, क्यूँ हो रहा है, कुछ समझ नहीं आ रहा था उसे। काफ़ी देर यूँही सड़क पर भटकते हुए जब घर पहुँची, तो देखा राघव उसका इंतज़ार कर रहा था।
“कहाँ थी तुम? कितनी देर लगा दी। मैं तो घबरा गया था, सोच रहा था दो हवलदार भेजूँ तुम्हें ढूँढने के लिए।” आज इतना क्यूँ बोल रहे हैं राघव, सोचते हुए मैथिली ने जवाब दिया, “सब्ज़ी लेने गयी थी।”
“सब्ज़ी? पर कहाँ है सब्ज़ी? ख़ैर छोड़ो, आते समय ताज़ी सब्ज़ी दिखी, तो मैं लेते हुए आया हूँ। आज तुम्हारे हाथ के गोभी के पराँठे खिला दो।” 
चौंक कर मैथिली ने टेबल पर देखा, तो उसका सब्ज़ी का थैला जो हड़बड़ाहट में वह रघुवीर के घर ही छोड़ आयी थी, वहाँ रखा था। राघव उसको अजीब नज़रों से घूर रहा था। कुछ बिना बोले, मैथिली ने थैला उठाया और किचन की तरफ़ चल दी। 
अगले दिन, जब राघव ऑफ़िस के लिए तैयार होकर निकला, तो जाने क्या सोच कर, मैथिली भी उसके पीछे हो ली। जिसका शक था उसे, वही हुआ, राघव सीधे रघुवीर के ही घर गया। 
आज भी मैथिली की क़िस्मत से दरवाज़ा खुला रह गया था, हिम्मत करके मैथिली सीधे अंदर चली गयी। 
बेडरूम में, राघव रघुवीर से बोल रहा था, “मुझे लगता है, मैथिली को हम पर शक हो गया है, कहीं वो कुछ उलटा-सीधा ना कर बैठे?”
“चिंता मत करो, रघु, कुछ नहीं करेगी मैथिली! मैंने कल भी तुम्हें कहा था, हम दोनों के बीच ऐसी उलझी हुई है वह, की उसके लिए कुछ सोचना भी मुश्किल होगा।”
“वाह! सही कह रहे हैं,” ताली बजाते हुए, बेडरूम में दाख़िल होते हुए मैथिली बोली, “मैं तो सही में आप-दोनों के बीच उलझ कर रह गयी , पर बस अब यह भी सुन लीजिए, यह मैथिली और अग्नि-परीक्षा भी नहीं देगी! आपको शर्म नहीं आई की अपनी  आज़ादी के लिए आप दोनों मुझे कैदी रखते रहे .. मुझे भी चाहिए .. आज़ादी मुझे भी चाहिए .. ” 
इतना बोल कर, जितनी फुर्ती से मैथिली अंदर आयी थी, उतनी ही फुर्ती से बाहर भी चली गयी। । राघव और रघुवीर, अपनी चादर सम्भालते, अपने जिस्म को ढाँकने की कोशिश ही करते रह गए। 
लेखिका : ऋतु दीक्षित 
संकलन : अग्नि परीक्षा

फुट नोट :

इस रोचक “अग्नि परीक्षा” संकलन की भाँति ही हम अन्य ऐसे कई संकलनों पर कार्यरत हैं । यह एक ऐसा अनोखा प्रयास है जिसमें संघ समीक्षा एवं टिप्पणियों के फलस्वरूप हम कहानियों को अंतिम रूप देकर आपके समक्ष प्रस्तुत करते हैं । यदि आप भी इस ‘विशेष’ कहानी लेखन कार्य मे भाग लेना चाहते हैं तो हम से ईमेल के द्वारा संपर्क करें ।

-धन्यवाद
आजसिरहाने
aajsirhaane@gmail.com

9 Comments Add yours

  1. Hamesha kahani mein twist padhe hain aaj pehli baar twists mein kahani padhi, gajjab!!! Ritu kamal kar diya!! 👍👍

    1. Thankuu so much….all because of AS, thoda bahut likhna aa gaya!!

  2. mohdkausen says:

    समाज को आईना दिखती बेहद ही संवेदनशील विषय पर लिखी गई कहानी। लेखिका के साहस को कोटि कोटि नमन

    1. Bahut shukriya Kausen!! Dil se aabhar!

  3. आपकी शैली और कहानी का अंत दोनों हि लाज़वाब हैं। अगर इस कहानी को आगे और लिखा जाए तो बात ही बन जाए । प्लीज एक बार कोशिश करियेगा। इतने से मन नहीं भरा मेरा

    1. बहुत सारा आभार, सुप्रिया! कोशिश करूँगी…इतना प्रोत्साहन देते हो आप सभी।

  4. Feroz says:

    BAHUT UMMDA

    1. बहुत शुक्रिया 🙂

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