Antarnaad : Anshu Bhatia

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खिड़की से आते हुए भीने-भीने हवा के झोंके बिनोद के चेहरे पर से उसके बालों को उड़ा रहे थे| वो हवा के मज़े कम ले रहा था, अपने नाखून ज़्यादा चबा रहा था| बस रुक गयी और बस-कंडक्टर ने उसे घूरा व नीचे उतरने का इशारा किया| उसके नाखून चबाने की गति लगभग दोगुनी हो गयी| कंडक्टर वहीँ से चिल्लाया कि रान्ग्पो आ गया है और उसे अब नीचे उतर जाना चाहिए| पास बैठे हुए सहयात्री ने उससे पूछा कि उसने कहाँ का टिकेट लिया है, उसने मुट्ठी खोलकर देखा और सहयात्री को धन्यवाद दे उठ खड़ा हुआ| नीचे उतरते हुए उसने देखा कि सभी यात्री उसकी ओर देखकर हंसने लगे थे और वापस उतनी ही शीघ्रता से अपने-अपने में मग्न भी हो गए थे|

वो नीचे उतरा तब तक बहुत सी गाड़िया जगह न मिल पाने की वजह से वहां इकठ्ठा हो चुकी थीं| ज़रा-ज़रा से अंतराल से बजते हुए हॉर्न की आवाजें सिम्फनी का सा प्रभाव देती थीं| उन सब से बचकर वो सड़क पार करने का प्रयत्न करने लगा| दुबला-पतला शरीर…आँखें बड़ी-बड़ी जैसे कुछ कहना चाहती हो, भरे-भरे गाल, तीखी सुडौल नाक, कमान जैसे आकार की भवें, कलमों ने काफी नीचे तक उतरकर उसके चेहरे का अच्छा-खासा हिस्सा अपने कब्ज़े में कर रखा था, बाल बिलकुल सीधे-सपाट| उसकी टाँगे उसके शरीर के मुक़ाबले ज़्यादा लम्बी थी, जिनसे लम्बे-लम्बे डग भरता हुआ वो सरपट सड़क के उस पार पहुँच गया था| वहां उसे एक छोटा सा बार दिखाई पड़ा, शोर-शराबे से बचने के लिए वो अन्दर घुस गया| बार में घुसते ही उस गौरांग सुदर्शन युवक ने दृष्टि दौडाई तो सारी मेजें भरी हुई थीं| मन में आया इस छोटे से शहर में इतने पीने वाले कहाँ से जुट गए| तभी कांच की खिड़की के समीप वाली एक मेज़ जिसपर दो व्यक्ति ही बैठ सकते थे एक कुर्सी खाली दिखाई दी| शिष्टतावश सामने बैठे ४०-४५ वर्ष के पुरुष से प्रश्न किया-

“माफ़ कीजियेगा, क्या मैं यहाँ बैठ सकता हूँ”

“हाँ क्यों नहीं|”

स्वर गहरा और स्थिर था| कहने वाले ने उसकी ओर देखा भी नहीं| लगता है वह किसी और ही लोक में था| 

वो सकुचाकर ख़ाली कुर्सी पर बैठ गया और अपना आर्डर दे दिया| खिड़की से बाहर देखते हुए उसे लगा शायद वो धीर-गंभीर पुरुष चुपके-चुपके उसकी ओर देख रहा था| बिनोद को अपनी ओर देखते हुए पाकर उसने अपनी निगाहें घुमा ली और फ़ोन पर बात करने लगा| बिनोद ने सुना कि वो किसीसे कह रहा था कि अभी वो रान्ग्पो में है और किसी बार में है, जो कोई भी दूसरी ओर था उसे वहां आमंत्रित भी कर दिया था उसने|

कुछ देर में बिनोद का आर्डर आ गया था| उसका खाना-पीना ख़त्म होने से पहले ही वो व्यक्ति वहां से चला गया था| उसके जाते ही उसने वातावरण में कुछ हल्कापन महसूस किया| मगर ये सुकून ज़्यादा देर ले लिए उसे नसीब न हो सका| अगले कुछ पलों में वहां पर एक सुंदरी बैठी थी| अब तो बिनोद का दिल और तेज़ी से धड़कता था| उसे खुद की ओर देखते हुए पाकर बिनोद पहले भी ज्यादा असहज हो उठा| वो मुस्कुराने लगी| उसे उस धीर-गंभीर पुरुष की याद आ गयी| बेहतर होता कि वो उठकर न जाता| न वो जाता, न ही ये आती| वो सर झुकाए अपना खाना खाता रहा|

अचानक उसे लगा कि उसकी बांह पर कोई कीड़ा काट गया| इसके बाद धीरे-धीरे वो अपने होश खोता रहा| वो सुंदरी एकटक उसकी ओर तकती थी| कीड़े के काटने का हल्का-हल्का दर्द उस सुंदरी की आँखों में भी दिखा| उसकी आँखें पूरी तरह से बंद हो चुकी थी, धीरे-धीरे आवाज़ें भी मद्धिम होने लगी और फिर एक चुप्पी….

जब उसकी आँख खुली तो उसने अपनेआप को एक झोपड़े में पाया| पास ही वो सुंदरी बैठी थी| पीछे से एक अधेड़ उम्र के व्यक्ति ने प्रवेश किया| उसने उस सुंदरी को रोमा कहकर संबोधित किया| पहली बार में ये नाम उसे बहुत पसंद आया| उसे लगा कल शायद ज़्यादा पीने की वजह से वो अपने आपे से बाहर हो गया था, ऐसे में ये लड़की उसे अपने घर पर ले आई होगी| उसने उठने की कोशिश की| सामने दीवार पर नज़र पड़ते ही वो दंग रह गया| वहां उसे अपनी और रोमा की एक तस्वीर नज़र आई| वो कुछ कह पाता इतने में एक बुज़ुर्ग महिला ने कमरे में प्रवेश किया| वो उसे बिनोद कहकर पुकार रही थीं और उस अधेड़ पुरुष को बिजय| बिनोद…ये नाम कुछ जाना-पहचाना लग रहा था| अच्छा!! ये उसका नाम था!! उसे अपने नाम से भी प्यार हो गया| मगर वो एक चिंता में डूब गया| ये बुढिया उसका नाम कैसे जानती थी??

उन सबको देखकर उसे लगा कि किसीने उसे जाल में फांस लिया है| वो बचकर वहां से भागने का प्रयास करने लगा| दीवार पकड़कर उठने की कोशिश में प्लास्टर उखडकर उसके हाथों में आ गया| वो फिर से बिस्तर पर गिर पड़ा| उसके गिरने की आवाज़ से एक बुज़ुर्ग पुरुष और एक अधेड़ उम्र की महिला भी भीतर आये| सभी आपस में कुछ कहते हुए उसकी ओर बढ़े| वो घबराहट में फिर नाखून चबाने लगा| फिर से उसे अपनी बांह पर किसी कीड़े के काटने का अहसाह हुआ, उसने मुड़कर देखा| एक अजीब से बेहोशी उसपर छाने लगी| उसे पकड़कर बिस्तर पर लिटा दिया गया| उसके कानों में कुछ बोल गूंजने लगे…अजनबी बोल…अजनबी आवाज़ें….

“भला हो दुर्गा-प्रसाद का जिसने आज इसे देख लिया!!”

“आज तो हद्द ही हो गयी, ये नामची से निकल कर रान्ग्पो तक पहुँच गया था!!”

कुछ सिसकियाँ….शायद वो सुंदरी…क्या नाम था उसका….उम्म्म रोमा….शायद ये रोमा की सिसकियाँ थी| सभी उसे समझाने लगे कि वो अकेली नहीं है, डरा न करें…हमेशा कोई न कोई होता तो है बिनोद के पास….आज ज़रा ध्यान चूका था तो ये नज़रें बचाकर निकल पड़ा|

धीरे-धीरे आँखों के आगे अँधेरा और बढ़ने लगा| कानों में पड़ने वाले बोल भी अब बहुत दूर से आते हुए लग रहे थे| वो गहरी नींद में सो गया| मगर उसके सो जाने से सबकी बातें कहाँ बंद होती थी|

बूढी औरत रोमा को दिलासा दे रही थी| बिजय उस बूढ़े आदमी पर चिल्ला रहा था| उसके मुताबिक बिनोद से शादी करके रोमा का जीवन बर्बाद हो गया था| यही तथ्य वो उस बूढ़े को, जो कि उनका पिता था, समझा रहा था| ये बात कहते ही सारे घर ने उसपर बरसना शुरू कर दिया….उसके बूढ़े माता-पिता, उसकी बीवी…कोई इस बात से सहमत नहीं थे| सभी अभी तक इसी ज़िदपर अड़े थे कि शादी के बाद सब ठीक हो जाता है| साल भर रुक जाने से बिनोद की सेहत भी अच्छी हो जाएगी| बिजय को समझ नहीं आता था कि वो इन लोगों को कैसे समझाए कि जब डॉक्टर ने हाथ खड़े का दिए हैं, न उनकी आर्थिक स्थिति ऐसी है कि और कहीं जाकर कोई महंगा इलाज करवा पाएं, तो शादी कैसे इसे ठीक कर पायेगी|

पिछले साल अचानक बिनोद घर से गायब हो गया| बहुत ढूँढने पर वो टेमी टी गार्डन्स में कहीं बैठा हुआ मिला| उसने अपने परिवार को पहचानने से इंकार कर दिया| बड़ी मुश्किल से वो उसे पकड़कर डॉक्टर के पास ले गए| नामची के डॉक्टर ने उसे तुरंत गंगटोक के किसी हॉस्पिटल में रेफेर कर दिया| इस छोटे से परिवार के लिए उसे इतने बड़े अस्पताल में बहुत दिन तक रखना संभव न था| वो थोड़ी देर पहले हुई घटनाएं भी भूलने लगा था| किसी को पहचानना भी बंद कर दिया था| वैसे भी डॉक्टर ने कहा था अम्नेसिया नामक बीमारी में मरीज़ के खानपान का बहुत ध्यान रखना पड़ता है| थोड़ी वर्जिश और थोडा योग-ध्यान इत्यादि| एक दवाई भी बता दी थी, यदि बिनोद कभी बेकाबू हो उठे तो उसे उसके शरीर में इंजेक्ट कर देना था, इससे वो कुछ समय के लिए बेहोश हो जायेगा| इससे ज्यादा न वहां के डॉक्टर्स जानते थे न ही बिनोद के घरवाले जानना चाहते थे|

बिजय ने तो स्वीकार कर लिया था कि उसने सदा-सदा के लिए अपना छोटा भाई खो दिया है| मगर उसके घरवालों ने एक अप्रत्याशित क़दम उठाया| उन्होंने बिनोद की शादी करवा दी!! जानते-बूझते हुए!! इस रिश्ते से बिजय हमेशा से नाखुश था| ऐसा नहीं कि वो अपने भाई से प्यार नहीं करता था, मगर उसके प्यार में वो इतना अँधा नहीं हुआ था कि एक लड़की का जीवन अपने सामने बर्बाद होते हुए देख ले| बार-बार मना करने से माता-पिता उससे नाराज़ हो गए| चाहे जो भी हो रोमा की तकलीफ उससे नहीं देखी जाती थी| इतनी छोटी सी उम्र में शादी और पति की बीमारी ने….बिचारी को अन्दर तक झकझोर कर रख दिया था…. 

बिनोद तो जबरन थोपी हुई नींद में था, बाकि घरवाले भी थककर सो गये थे| बिजय की आँखों में नींद का नाम न था| उसे रह-रह कर रोमा का मासूम चेहरा अपनी आँखों के आगे घूमता नज़र आता था….उसकी आँखों की चंचलता कहीं खो गयी थी, अब वहां केवल उदासी और डर ने घर कर लिया था| वो घर से बाहर टहलने लगा….उसे कुछ समझ नहीं आ रहा था कि कैसे इससे उबरा जाए? इक तरफ उसका भाई था, उसका छोटा भाई….बचपन की सारी स्मृतियाँ कुछ पलों के लिए जीवंत हो उठी….अपने भाई की ऐसी हालत देखकर वो जीते जी मर गया था| मगर जानते-बूझते हुए रोमा को अँधे कुएं में धकेलना भी उसे समझ न आया| लाख चाहकर भी वो ये बात हज़म न कर पाया कि न वो बिनोद का इलाज करा सकते हैं और न ही रोमा से उसकी शादी तोड़ सकते हैं….करे तो क्या करे….आये दिन वो घर से गायब हो जाता है…काम-काज छोड़कर सब घर पर तो नहीं बैठ सकते, थोड़े बहुत पैसे जो मिलते थे वो भी बंद हो जाएँ तो घर कैसे चलेगा….

अचानक उसे नाखून चबाते हुए इक साया घर से बाहर निकलते हुए दिखा| वो उसके पीछे हो लिया| वो साया बेसुध आगे चले जा रहा था, जैसे किसी भारी मुसीबत से बचकर निकला हो| बिजय भी छुपकर उसके पीछे चलता रहा| दोनों भाई कुछ देर तक उस सड़क पर एक-दूसरे के पीछे चलते रहे| कुछ देर बाद बिनोद चाय के बागानों में घुस गया और नीचे उतरने लगा| बिजय भी उसके पीछे-पीछे चल पड़ा| नीचे उतर के वो फिर से सड़क पर पहुँच गए थे| सड़क के दूसरी तरफ से तीस्ता की कल-कल सुनाई दे रही थी| चलते-चलते वो तीस्ता तक पहुँच गए थे!! अचानक से बिजय एक पत्थर से टकराकर नीचे गिर पड़ा| उसे अपने पीछे आते देख बिनोद घबरा गया| उसने फिर से नाखून चबाने शुरू कर दिए…घबराहट के मारे वो और तेज़ी से भागने लगा| भागते-भागते उसे दिशा का भी कोई भान न रहा और वो सड़क के किनारे से फिसलते हुए तीस्ता में गिर पड़ा| उसे मुंह से चीख निकली!!

बिजय जानता था कि बिनोद को तैरना नहीं आता| उसे लगा ये अच्छा मौका है, ईश्वर ने रोमा के दूसरे जीवन के लिए द्वार खोल दिए हैं| ऐसे अजनबी जीवन से बिनोद को भी मुक्ति मिल जाएगी| वो घर की ओर पलट गया| नहीं…मगर उसके क़दम उसका साथ न देते थे| जो कुछ हुआ उसमे बिनोद की क्या ग़लती, ये तो उनके माता-पिता थे जो नासमझी पर तुले थे| बिनोद को मरते हुए छोड़ने से रोमा तो बंधन से मुक्त हो जाएगी मगर क्या वो मरते दम तक इस बोझ से उबार पायेगा?? नहीं….वो मुड़ा और तीस्ता में छलांग लगायी|

पानी में अपने भाई को थामे हुए बिजय को अलौकिक अहसाह हुआ| उसे लगा किसी अनदेखी शक्ति ने आज उससे ये पाप करने से बचा लिया| वो बिनोद को खींचकर पानी से बाहर ले आया और लिटा दिया| सड़क किनारे लेटे हुए बिनोद आँखों से उसे अनेकों धन्यवाद् दे रहा था| बिजय उसे गले लगाये रोता रहा…..खुद से तो युद्ध में जीत गया था वो…अब घर जाकर किसी तरह अपने बूढ़े माता-पिता को भी समझाना होगा….और वो कर दिखायेगा….ज़रूर कर दिखायेगा…

अंतर्नाद
लेखिका : अंशु भाटिया 


उत्कृष्ट कथानक, अति उपयुक्त संवाद और पात्रों का चरित्र चित्रण इस कथा को विशिष्ट बनाता है। सबसे
प्रभावित करने वाली बात कहानी के परिवेश की संस्थापना है जिसमें लगता है हम उन स्थानों और दृश्यों
को अपनी आँखों से देख रहे हैं। साधुवाद।

शिशिर सोमवंशी
मार्गदर्शक : कहानी सुहानी 

9 Comments Add yours

  1. Nitin says:

    अंशुजी आपकी कलम सच में सच में कमाल चल रही है कहानी का सटीक शीर्षक और कथावस्तु व प्रवाह बेहतरीन है । आपकी कलम शब्द् बंधन से मुक्त होते ही मुखर हो उठी है डिटेलिंग भी जबर्दस्त है । आपकी आखिरी तीनों रचनाओं ने निश्चय ही आपका लेखन पसंद करने वालो में काफी वृद्धि की होगी जिनमे से मैं भी एक हूँ। लिखते रहिये शुक्रिया।

    1. Bahut dhanywad Nitish, koshish jaari rahegi ki aage bhi likhti rahooN 🍫🍫💐💐

  2. mohdkausen says:

    बहुत ही उम्दा अंशु बेहद सजीव चित्रण तुम सच मे कलम की जादूगर हो।

    1. Kausen aap khud hi kitna achchha likhte hain, aapse bhi bahut kuchh seekha hai, dher sara dhanyawad aapka 🙏🙏

  3. Sabse pehle main aaj sirhane ka dhanywad dena chahti hoon, anu mam ka vishvas hi hai jo mujhse kahaniyan likhva leta hai. 💐💐🙏🙏

    Shishir sir main aapko bata nahi sakti ki aapke shabd kitne mayne rakhte hain aur kitna hausala badhate hain. 💐💐🙏🙏

    Aap dono ki main sada abhari rahungi

  4. Anshu!!! क्या ग़ज़ब लिखती हो….तुम्हारी imagination को लाखों सलाम! शब्द ही नहीं बचे हैं मेरे पास कुछ कहने की लिए भी….अद्भुत!!

    1. बहुत सारा धन्यवाद ऋतु 🙏🙏
      कोशिश रहेगी कि आगे भी ऐसी कहानियां लिख पाऊँ

  5. ajaypurohit says:

    Fast paced & well written !

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