Baat Ek Raat Ki : Anshu Bhatia

चलती हुई ट्रेन की खिड़की से बाहर झांकना निलेश को हमेशा से बहुत पसंद था…आगे बढ़ने के साथ-साथ पीछे जाते हुए पेड़-पौधे देख उसका मन प्रफ्फुलित हो उठता| बाहर से आती हुई ठंडी हवा और कानों में गूंजता हुआ मधुर संगीत…अहा!! अपने ख्यालों में खोया हुआ निलेश एक अलग ही दुनिया की सैर कर रहा था| अचानक उसे अपने कंधे में झुरझुरी सी महसूस हुई| उसने पलटकर देखा तो टिकेट चेकर खड़ा था| उसने अपना टिकेट दिखाया मगर टी सी ने सवालिया निगाहों से उसे देखा और अपने दोनों हाथ हवा में झुला दिए….निलेश कुछ समझ पता इसके पहले टी सी ने कहा –

“का है न बाबू…ई टिकेट है मुज़फ्फ़रनगर तक के और तुम तनिक सहारनपुर तक पहुँच गए हो….तो अब जरा बाहेर आ जाओ फेर…..”

निलेश अचंभित रह गया| अपने ख्यालों में और फ़ोन में वो इतना ज़्यादा मग्न हो गया था कि उसे जाते हुए स्टेशन का भान ही न रहा| अब तो ज़ुर्माना भरने के अलावा और कोई चारा न था| अगले स्टेशन पर नीचे उतरकर उसने नाम देखने की कोशिश की….”सहारनपुर”, घडी में समय देखा…9.30 बज चुका था| इतनी रात गए कहाँ जाया जाए की उधेड़बुन में वो बाहर की ओर चल पड़ा|

निलेश के व्यक्तित्व में एक अलग सी कशिश थी| गोरा-चिट्टा रंग था, घुंघराले बाल, ऊंचा-लम्बा कद, उसके बायें गाल पर एक तिल था, ऐसे लगता था किसी ने बुरी नज़र से बचाने के लिए वहां काजल को पहरेदार बिठा रखा था| वो लम्बे डग भरते हुए बाहर निकला और सामने उसे एक रेस्टोरेंट कम बार का बोर्ड दिखाई पड़ा| उसने वहीँ जाना उचित समझा, सोचा कुछ खा-पी लेगा वरना यहाँ दूर-दूर तक कुछ और मिले न मिले| बार में घुसते ही उस गौरांग सुदर्शन युवक ने दृष्टि दौडाई तो सारी मेजें भरी हुई थीं| मन में आया इस छोटे से शहर में इतने पीने वाले कहाँ से जुट गए| तभी कांच की खिड़की के समीप वाली एक मेज़ जिसपर दो व्यक्ति ही बैठ सकते थे एक कुर्सी खाली दिखाई दी| शिष्टतावश सामने बैठे ४०-४५ वर्ष के पुरुष से प्रश्न किया-

“माफ़ कीजियेगा, क्या मैं यहाँ बैठ सकता हूँ”

“हाँ क्यों नहीं|”

स्वर गहरा और स्थिर था| कहने वाले ने उसकी ओर देखा भी नहीं| लगता है वह किसी और ही लोक में था| 

निलेश कुर्सी खींचकर बैठ गया और अपना आर्डर दे दिया| उसने औपचारिक बात करने का प्रयास किया मगर वो आदमी शायद बात करने के मूड में नहीं था| वो लगातार अपने फ़ोन पर ही व्यस्त था| निलेश ने उसे गौर से देखा| उम्र के अनुरूप उसका शरीर उसका साथ दे रहा था, हलकी सी तोंद बाहर निकली हुई थी और बालों के भीतर से गंजा सर भी झांक रहा था| पास में एक छोटी अटैची रखी हुई थी| टेबल पर फ़ोन के पास एक चाबी रखी थी, उस पर एक नंबर था, शायद ३३, और की-रिंग में किसी लॉज का नाम था| निलेश समझ गया कि ये भी उसी की तरह मुसाफ़िर है| इसके साथ-साथ रात कहाँ बितायी जाए प्रश्न भी हल हो गया| आश्वस्त हो वो भी अपने फ़ोन पर व्यस्त हो गया| अपना-अपना बिल चुकाकर सिगरेट फूंकते हुए दोनों बाहर निकले| उस आदमी ने ऑटो कर लिया| निलेश भी १०-१५ मिनट रुककर ऑटो लेकर उसी लॉज की ओर चल पड़ा| संयोंग से उसका कमरा नंबर ३२ था|

“ठक-ठक….ठक-ठक”

दरवाजे पे हुई दस्तक से सवेरे उसकी नींद खुली| पूछने पर जवाब मिला कि पास के कमरे वाला यात्री मृत अवस्था में पाया गया है, इसी सिलसिले में सभी से पूछताछ हो रही है, उसे भी बाहर बुलाया जा रहा है| लॉज का मैनेजर बाहर खड़ा था, वो उसे पुलिस इंस्पेक्टर के पास ले गया| अनजाने ही उसके माथे पर पसीना छलक आया….इंस्पेक्टर ने उसे ऊपर से नीचे घूरा और पूछताछ शुरू कर दी| निलेश सभी सवालों के मुनासिब जवाब देकर वापस अपने कमरे की ओर बढ़ गया| फिर जाने क्या सोचकर उसने इंस्पेक्टर से अकेले में मिलने की गुज़ारिश की|

उसने इंस्पेक्टर को बताया कि रात को अचानक पास के कमरे से आ रही चिल्लाने की आवाज़ से उसकी नींद खुली| उसे लगा वो आदमी किसी से फ़ोन पर अपनी ज़मीं-जायदाद को लेकर बहस कर रहा था| आवाज धीरे-धीरे तेज़ होती गयी और फिर एकदम से किसीके धडाम से गिरने की आवाज़ आई| उसके दिल की धडकनें रुक सी गयी| इस उम्मीद में कि कोई हलचल होगी वो कुछ देर रुका रहा मगर कोई आहट न हुई| उसने हिम्मत करके दरवाज़ा खोला| आनन-फानन में वो पास के कमरे की ओर बढ़ा| कशमकश में उलझा हुआ वो सोचने लगा कि अब क्या किया जाये| उसने की-होल से कमरे के भीतर झाँकने की कोशिश की मगर उसे केवल बाथरूम का खुला हुआ दरवाज़ा, खाली पलंग और दूर तक फैला हुआ सन्नाटा दिखा| उसने घबराकर दरवाज़ा खटखटाया मगर ये क्या….दरवाज़ा तो पहले से ही खुला था!! अपनेआप ही सरकता गया…वो कमरे में घुसा…वो आदमी वहां ज़मीं पर ओंधा गिरा पड़ा था| वो पास गया और जैसे ही उसे पलटा उसने पाया कि उसकी सांसें थम चुकी थी| इसके पहले की वो कुछ समझ पाता कोई कमरे से निकलकर भागा!!

वो भी उसके पीछे भागा, मगर उसे पकड़ न सका| इतना वो समझ चुका था कि वो एक लड़की थी और बहुत फुर्तीली थी, पलक झपकते ही सीढियां उतरकर ओझल हो गयी| उसने ने कुछ सोच पुलिस को फ़ोन लगाया, मगर डर के मारे नंबर डायल करके काट दिया| अपने ईश्वर को याद करते हुए वो चुपचाप अपने कमरे में आकर लेट गया| मगर अब उसकी आँखों में नींद कहाँ थी? हर आहट पर उसे एक झटका सा लगता था| थोड़ी देर में बिस्तर पर कुछ दूरी पर सरकते हुए खटमल को देखते हुए उसकी पलकें बोझिल होने लगी….

सुबह दरवाजे की ठक-ठक से उसकी आँख खुली| वो दरवाज़ा खोलने बढ़ा ही था कि उसके पैरों से एक लिफाफा टकराया| उत्सुकतावश उसने उसे खोला तो देखकर हैरान रह गया कि उसमें उसकी तसवीरें थी, जब वो कमरा नंबर ३३ के बाहर खड़ा था…. दरवाज़ा बजा रहा था…. भीतर जाते हुए……उस आदमी के पास नीचे बैठे हुए….साथ ही साथ एक पर्ची भी थी, जिसपर लिखा था-

“ये तो केवल ट्रेलर है, अगर अपनी जान बचाना चाहते हो तो पुलिस को कुछ मत बताना, आगे क्या करना है आज रात को बताया जायेगा”

ये पढ़कर उसके हाथ-पैर फूल गए| जल्दबाज़ी में उसने वो लिफाफा बिस्तर के नीचे छिपाया और दरवाज़ा खोला|

अनजान जगह पर वो किसी तरह की मुसीबत में नहीं फंसना चाहता था, इसलिए अकेले में इंस्पेक्टर को उसने ट्रेन से लेकर लिफाफे तक की सारी दास्ताँ बयां कर दी| इंस्पेक्टर समझदार और धीरज वाला था| उसने उसकी स्थिति समझकर उसे उसी लॉज में दूसरे कमरे में शिफ्ट कर दिया और साथ ही एक हवालदार भी उसकी सुरक्षा के लिए छोड़ दिया| वो तसवीरें पुलिस ने अपने कब्ज़े में रख ली और इंस्पेक्टर ने उससे यह कहकर विदा ली कि बिन हवालदार के वो कहीं भी न जाए, आगे की तफ़्तीश के बाद उसे थाने तलब किया जायेगा| उसके चेहरे पर सुकून भरी एक मुस्कान खिंच गयी और वो भीतर चला गया|

तकरीबन आधे घंटे बाद, बाहर हवालदार बैठा ऊंघ रहा था कि अचानक निलेश भागता हुआ अपने कमरे से बाहर आया और चोट के निशान दिखाते हुए बोला-

“कोई पहले से ही उस रूम में था या फिर शायद बाथरूम से अन्दर आया…कोई तो था वहां पर….उसने मुझे मारने की कोशिश की….देखो….आपको कितनी आवाजें लगायी, मगर सब व्यर्थ!! अगर मुझे….मुझे कुछ हो जाता तो!!”

हवालदार ने तुरंत इंस्पेक्टर को फ़ोन लगाया और निर्देशानुसार उसे लेकर थाने की ओर चल पड़ा| निलेश के घबराने पर उसे यही समझाया गया कि वहां सबके होते उसे खतरा नहीं होगा|

वहां पहुँचते ही उसे एक और झटका लगा| इंस्पेक्टर ने उसे लॉक-अप में बंद करने का आदेश दिया| निलेश कुछ समझ पाता इसके पहले इंस्पेक्टर ने उसे कालर पकड़ कर अपनी ओर घसीटा और उसकी पीठ पर दो डंडे जमा दिए| दर्द के मारे उसके मुंह से चीख़ निकल गयी| इंस्पेक्टर ने उसे कहा-

“आख़िरी वार्निंग देता हूँ, शराफ़त से सच उगल दे वरना सच जानने के तो हमें बहुत से तरीके आते हैं!!”

ये वाक्य निलेश पर एक बहुत पड़े पत्थर की भांति गिर पड़ा, जिससे वो जान बचाकर भागना चाहता था मगर उसके बोझ तले उसने खुद को बुरी तरह दबा हुआ पाया|

उसने फटी-फटी आँखों से इंस्पेक्टर की ओर देखा| इंस्पेक्टर के एक हाथ में डंडा था और दूसरा हाथ टेबल पर टिका था| टेबल पर बहुत सा सामान बिखरा हुआ था, बहुत सारे पन्ने, फाइलों का ढेर….और…..मोबाइल…..दो मोबाइल….ये तो जाने-पहचाने थे…..एक तो निलेश को अपना सा ही लगा और दूसरा भी …..शायद ये उसने बार में देखा था, उस आदमी के हाथ में….. निलेश के चेहरे पे हवाइयां उड़ने लगी!! इंस्पेक्टर के चेहरे पर कुटिल मुस्कान थी| उसकी नज़रें सामने बेंच पर बैठी दो महिलाओं पर पड़ी| उसे लगा कि साक्षात् मौत ही वहां उसकी प्रतीक्षा कर रही है| इतने में ही उसके पेट में उसे तीव्र आघात महसूस हुआ, इस बार ये डंडे नहीं थे, इंस्पेक्टर ने इस बार अपने जूतों की नोक को आजमाया था|

निलेश को सच कहने के अलावा और कोई उपाय न सूझा| उसने इंस्पेक्टर से विनती की कि उसे भी अपना पक्ष रखने का मौका दिया जाए| उसे पूरा हक़ था कि वो इंस्पेक्टर को बताये कि वो मालती से तब से प्रेम करता है जब वो लोग कॉलेज में साथ-साथ पढ़ते थे| मगर घरवालों के दबाव के चलते उनका ब्याह न हो सका| मालती की शादी अपनी उम्र से काफ़ी बड़े आदमी से कर दी गयी, जो खुद किसी और से प्यार करता था मगर जातिवाद के चलते उसे भी अपना मन मरना पड़ा….और वही कमरा नंबर ३३ में था उस रात|

गाज़ियाबाद से निलेश निकला तो मालती के घर जाने को था, किन्तु मालती ने उसे फ़ोन पर बताया कि उसका पति सहारनपुर गया है, किसी ज़रूरी काम से तो वो वहीँ हो लिया और संयोगवश बार में उसके पास बैठने का मौका मिला| मगर वहां सबके बैठे वो ज़्यादा कुछ न बोल सका|

उसके लॉज में रुके होने की बात उसने मालती को तुरंत ही sms करके बता दी थी और उसे वहां बुला लिया था| वो अपने घर से निकल पड़ी, एक आख़िरी कोशिश के लिए….. निलेश और मालती दोनों मिलकर उसे समझाना चाहते थे कि वो उसे तलाक दे दे, वो न जाने किस ज़िद पर अड़ा था कि किसी तौर न राज़ी होता| मालती केवल एक घर ही तो चाहती थी उससे, जायदाद की तो वैसे भी कमी न थी उसको, लालच जाने क्यों कम न होता था|

मगर मालती के वहां पहुँचने से पहले ही वो हो चुका था जिसकी किसी ने कल्पना भी न की थी| जब निलेश उससे बात करने पहुंचा तो उसने पाया कि वहां पहले से ही एक और लड़की मौजूद थी, जो कि उसकी प्रेमिका होने का दावा करती थी!! उस महिला ने मालती को कोसना शुरू कर दिया| बकौल उसके मालती एक छोटी-मोटी चुड़ैल से कम न थी| उसी की वजह से उन दोनों को छुप-छुप मिलना पड़ता था|

तलाक की बात सुनकर वो आदमी गुस्से से लाल-पीला हो उठा और उसने निलेश पर हाथ भी उठाया| एक भारी-भरकम हाथ पड़ते ही निलेश की आँखों के आगे अँधेरा छा गया| उसने खुद को बचाने के लिए उसीकी अटैची लेकर उसके सर पर दे मारी….मगर ये किसने सोचा था कि उसके साथ ही वो हमेशा के लिए अपनी आँखें मूँद लेगा| निलेश उस महिला से कुछ कहता इसके पहले वो वहां से भाग निकली| और सामने से उसे आती दिखी मालती….उसे देखते ही कुछ क्षण को वो सब कुछ भूल गया…उसे लगा जब मालती आ ही गयी है तो सब कुछ ठीक हो जायेगा….दोनों ने मिलकर एक कहानी गढ़ी, तसवीरें खिंची और आगे तो हम सब जानते ही हैं|

मगर वो दोनों कोई शातिर अपराधी न थे, cctv फुटेज में सब साफ़ नज़र आ रहा था| बाकि का भांडा दोनों फ़ोन्स ने फोड़ दिया था| निलेश के बदन की चोटें भी ज़ाहिर कर रही थीं कि उन्हें जबरन जन्म दिया गया था कहानी को एक मोड़ देने के लिए| मालती के पति की प्रेमिका को भी गिरफ्तार कर लिया गया था|

किस्मत के मारे तीनों मासूम अपराधियों को जेल ले जाया जा रहा था| समाज अपनेआप में व्यस्त था…हमेशा की तरह..

बात इक रात की
लेखिका : अंशु भाटिया


इस कहानी की सबसे अच्छी विशेषता यह है कि पाठक की उत्सुकता को प्रतिपल बनाए रखा गया है। यह
शैली मंझे हुए कहानीकार की है।घटनाक्रम निश्चित रूप से नाटकीय एवं परिवर्तनशील है जिसे थोड़ा
यथार्थपरक रखा जा सकता था। कहीं कहीं अपराध कर्म की रिपोर्ट सी प्रतीत होती है।

शिशिर सोमवंशी
मार्गदर्शक : कहानी सुहानी

5 Comments Add yours

  1. Shukriya shishir sir
    Noted all the points
    Will be careful next time
    🙏🙏

  2. Is kahani se to mujhe ‘Savdhan India’ yaad aa gaya! Bahut khoob Anshu, suspense thriller mein nobody can beat you..!!

  3. ajaypurohit says:

    Racy thriller 😄😄 but well written ! It did spoil the mood of original para written by Shishirsom but that’s how stories are woven.

  4. Ji sir, Thanx for your encouraging words, I am glad you liked it.

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