Pratibimb : Anamika Purohit

on

कुछ काम की फ़िक्र, तो कुछ अपनी छवि की, या, यूँ कहें, कि इमेज की। दोनों का बोझ मयंक पर काफ़ी भारी था।

इसलिए यह सृजन की दुनिया में खोए हुए युवा नाटककार कभी-कभार मदिरा-पान कर लिया करते थे। इससे इनके लेखन में फुर्ती, और इनकी छवि में “एक्स फ़ैक्टर” आ जाता था। नहीं-नहीं, पियक्कड़ नहीं थे, बस थोड़े तरंगित-से थे।

कापल्पनिक दुनिया में भ्रमण करना मयंक का दूसरा शौक़ था। कीट्स और वर्ड्ज़्वर्थ की तरह इन्हें भी अपनी कल्पना-शक्ति में ज़िंदगी की बड़ी-से-बड़ी समस्या का समाधान नज़र आता था। और अपनी कल्पनाओं के ज़रिए मयंक उदयपुर की गलियों और सर्कल्ज़ से दुनिया के किसी भी कोने में पहुँच जाता था।

वैसे भी साज-सज्जा से रंगी ये उदयपुर की गलियाँ उसे अपने विशाल ख़यालातों के लिए ज़रा संकरी ही प्रतीत होतीं थीं। मयंक की भी उस शायर के समान यही कामना थी, कि किसी दिन वह अपने झोले समेत इस शहर की बोर दोपहरों से कहीं दूर निकल पड़े। इसी प्रयास में बम्बई की एक मशहूर प्रडक्शन कम्पनी के लिए एक नए टेलिविज़न ड्रामे का स्क्रीन्प्ले तैयार कर रहा था। पर बम्बई जाना, या नहीं जाना स्क्रीन्प्ले के क़बूल होने पर निर्भर करता था।

इसी मानसिक तनाव से ग्रस्त उस दिन मयंक ने ‘ड्रीम कैचर बार एंड कैफ़े’ का चक्कर लगाने की सोची। यहाँ मयंक अक्सर आया करता था- कभी कैफ़ीन की चाह में, तो कभी ऐल्कहाल की तलब में; और जैसे कि मैंने पहले बताया, कभी काम की फ़िक्र में, तो कभी इमेज के चलते। उस शहर में, वैसे भी, यह इकलौती ही मधुशाला थी जहाँ शहर के कई ख़याली और सवाली चले आते थे।

शाम के ७ बज रहे थे। मयंक ने बाईक पार्क की, और ड्रीम कैचर के अंदर क़दम रखे। बार में घुसते ही उस गौरांग सुदर्शन युवक ने चारों ओर दृष्टि दौड़ाई तो सारी मेजें भरी हुई थीं। मन में आया इस छोटे से शहर में इतने पीने वाले कहाँ से जुट गए। तभी काँच की खिड़की की समीप वाली मेज़ जिस पर दो व्यक्ति ही बैठ सकते थे एक कुर्सी खाली दिखाई दी। शिष्टता वश सामने बैठे चालीस पैंतालिस वर्ष के पुरुष से प्रश्न किया “”माफ़ कीजिए क्या मैं यहाँ बैठ सकता हूँ?””

“हाँ क्यों नहीं।”

स्वर गहरा और स्थिर था। कहने वाले ने उसकी ओर देखा भी नहीं। लगता है वह किसी और ही लोक में था।

मयंक के हृदय में एक अजीब सी जिज्ञासा जागृत हुई। उसने पुन: वार्तालाप आरंभ करने की कोशिश की।

“जनाब, एसा प्रतीत होता है कि मैं आप को जानता हूँ। कौन हैं आप?”

उस पुरुष ने बिना मयंक की ओर देखे, अपनी किताब में झाँकते हुए जवाब दिया, “हाँ, हो सकता है। पर मैं तुम्हें बहुत अच्छी तरह से जानता हूँ!”

 “जी?””  मयंक चौंका, “”कौन हैं आप?”

“मैं एम.के. जोशी हूँ, मशहूर निर्देशक। तुम मुझे नहीं जानते। तुम किसी और ज़माने के हो।”

मयंक को लगा मानो वह किसी बेअक़्ल इंसान से बातें कर रहा हो। पर उसकी जिज्ञासा शांत न हुई।

“देखिए, मिस्टर जोशी, आप कोई भी निर्माता-निर्देशक हों, पर आपको कोई अधिकार नहीं की आप हमारे शहर या यहाँ के लोगों की सोच पर कोई कटाक्ष करें। उदयपुर छोटा शहर सही, पर अपने ज़माने से कहीं आगे है! आप हमें जानते ही कितना हैं?”

आख़िरकार, एम.के. जोशी ने मयंक की आँखों से आँखें मिलाईं। “मयंक, मैं भी उदयपुर का रहने वाला हूँ। इस शहर को नीचा दिखाने के बारे में तो मैं सोच भी नहीं सकता। सच कहूँ, तो मुझे तुमसे ख़ास लगाव है। कल तुम्हारा नुक्कड़-नाटक – बंतो की क़िस्मत – देखा। बहुत ख़ुशी हुई। अपने पुराने दिन याद आ गए, जब मैं भी नाटक लिखता था। तुम्हारी तरह की ही समाजवादी और नारीवादी सोच हुआ करती थी मेरी। हाय, वे भी क्या दिन थे!”” इतना कहते ही जोशी ने दोबारा अपना चेहरा अपनी किताब के पीछे छुपा लिया।

मयंक अचम्भित हो गया था – किम्कर्तव्यविमूढ सा। उसे जोशी से एक अद्भुत जुड़ाव महसूस हो रहा था। सोचा, कहीं कोई परिवार का सदस्य तो नहीं? छोटे शहरों की यह भी एक ख़ासियत होती है; प्रत्येक इंसान से कोई भूला-बिसरा रिश्ता निकल ही आता है। हिम्मत कर, मयंक ने फिर पहल की, “”जोशी जी, क्या हम एक ही परिवार के हैं? मैं भी जोशी ही हूँ। ग़लत मत समझिएगा, पर आपसे एक अलग-सा जुड़ाव महसूस हो रहा है। क्या आप अपने परिवार के बारे में कुछ बताएँगे?””

जोशी ने दोबारा उसकी आँखों में देखा। मयंक अत्यंत उद्वेलित हो गया। “उफ़्फ़, वही आँखें! बस अभी तक चश्मे नहीं लगे तुम्हें। नज़र साफ़ जो है!” यह कहते ही जोशी की आँखें नम पड़ गईं।

“कौन हैं आप? आख़िर बताते क्यों नहीं?” मयंक अब अपने आपे से बाहर हो चुका था।

जोशी ने इस बार मयंक की ओर नहीं देखा। “मयंक, पता है, मेरी और तुम्हारी सबसे बड़ी कमज़ोरी क्या है? बेसब्री। उदयपुर की इन्ही बोर गलियों से निकलना चाहते हो न? तो, लो, निकल गए! और इतने बड़े डिरेक्टर भी बन गए! पर क्या तुम ख़ुश हो? तृप्त हो? आज़ाद हो?”

“ये आप क्या बक रहें हैं? किससे बातें कर रहें हैं?”” मयंक उठ खड़ा हुआ; सोचा, शायद सचमुच किसी पागल से सामना हो गया है। इधर-उधर किसी बैरे को तलाशा, कि बिल मँगवा सके, मगर जाने क्यों उस बार में अचानक सन्नाटा छा गया था। न मैनेजर दिखता, न ही कोई बैरा। बार में बैठे ग्राहक भी मानो शराब के नशे में पूरी तरह लीन थे। थक के मयंक भी दोबारा वहीं बैठ गया। ताज्जुब से जोशी की ओर देखता रहा। जोशी पर वहाँ के वातावरण का अभी तक कोई असर नहीं पड़ा था। वह सचमुच किसी और  ही लोक में था।

मयंक की बेचैनी परख जोशी शरारतपूर्ण ढंग से मुस्कुराया।

“ग़ौर से देखो, मुझे, मयंक। मेरे हुलिए को नहीं, उसके भीतर के इंसान को।”

मयंक ने एक बार फिर जोशी को ध्यान से देखा। वही आँखें, वही झुक कर बैठने का अन्दाज़, और माथे पर उसके माथे की तरह कितनी ही भृकुटियाँ। पर यह कैसे हो सकता था?

“चौंको मत, मयंक। तुम सही सोच रहे हो। मैं तुम ही हूँ! एम.के. जोशी – मयंक कृषणदास जोशी। तुमसे बीस वर्ष आगे, पर तुम्हारा ही प्रतिबिम्ब हूँ। तुमसे मिलने की उम्मीद तो नहीं थी, पर मिलकर ख़ुशी हुई है! जानते हो क्यों? क्योंकि तुम्हें अब भी पूरा अधिकार है मुझे ख़त्म करने का। यह क़तई आवश्यक नहीं कि मेरा जन्म हो। पर तुम इस समय मेरा सृजन करना चाहते हो। तुम मैं बनना चाहते हो – बम्बई में स्थित, बड़ी फ़िल्मों के निर्देशक। और सच कहूँ, तो तुम मैं बन भी जाओगे, जिसका मुझे डर ही नहीं दुःख भी है। क्योंकि मैं तुम्हें खो चुका हूँ। जानते हो, फ़िल्मों में तुम्हारे समाजवाद की जगह न के बराबर है! वहाँ तो हर कहानी एक फ़ॉर्म्युला के ऊपर लिखी जाती है, जनाब! तुम भी सीख लोगे। पर यह सीख तुम्हें उस कल्पनात्मक संसार से दूर कर देगी, जिसमें तुम अभी बसते हो। ठहर जाओ! मत बढ़ो इतना आगे। इस शहर को तुम्हारी अधिक आवश्यकता है। तुम्हारे नुक्कड़-नाटकों की भी! तुम समझ रहे हो न! मेरा सृजन मत करना! तुम मयंक ही अच्छे हो, एम.के. जोशी नहीं! याद रखना!”

मयंक की आँखें भारी हो रही थी। शराब का असर था, शायद। उसने अपना सर मेज़ पे रखा और गहरी नींद सो गया। जब आँख खुली तो वह उस मेज़ पर अकेला बैठा था। लगा मानो किसी बुरे ख़्वाब से छुटकारा मिल गया। बैरे को आवाज़ दी, तो इस बार वह बक़ायदा उसकी मेज़ के पास आ खड़ा हुआ।

“क्या लेंगे, मयंक साहब?”

“बस बिल ले आओ, अब तो जाएँगे! आज के लिए बहुत पी चुके, दोस्त!”

बैरे ने हंस के जवाब दिया, “क्या, आप भी मज़ाक़ करते हैं! अभी तो आप ने कुछ मँगवाया ही नहीं! आए हुए क़रीब एक घंटा ही तो हुआ होगा आप को!”

मयंक का माथा ठनका! घड़ी देखी तो सचमुच साढ़े आँठ ही बजे थे। जब बैरे से अपने समक्ष बैठे आदमी के बारे में पूछा तो उसने अनभिज्ञ सा जवाब दिया, “पता नहीं, साहब। ज़रूर कोई बैठा होगा, क्योंकि मैं बार की दूसरी ओर था। इस तरफ़ तो अभी आया हूँ, आपकी आवाज़ सुनकर!”

मयंक की समझ में कुछ नहीं आ रहा था। आख़िरकार वह उठा और उसने घर की ओर प्रस्थान किया। घर लौटते वक़्त उसका मन बस एक ही बात दोहरा रहा था, “मेरा सृजन मत करना! तुम मयंक ही अच्छे हो, एम.के. जोशी नहीं! याद रखना!”

घर पहुँचा तो स्मरण हुआ कि ड्रामा की स्क्रिप्ट का आख़िरी दिवस अगला दिन ही था। उसे तो अब भी उसपर बहुत काम करना था। ख़ैर, किसी तरह से रात भर जाग, स्क्रिप्ट समाप्त की और ई-मेल कर दी। जवाब की उसे कोई उम्मीद तो नहीं थी, पर फिर भी उसने लगातार तीन दिन इंतज़ार किया। तीसरी रात, जब प्रडक्शन कम्पनी का फ़ोन आया तो उसकी ख़ुशी का ठिकाना न था! स्क्रिप्ट क़बूल ही नहीं हुई, पर उसे निर्देशन का भी मौक़ा दे दिया गया। सम्पादन के पश्चात आख़िरी ड्राफ़्ट उसे भेजा गया उसकी सहमति के लिए।

पहला पन्ना देख कर उसके होश उड़ गए। ड्रामे का शीर्षक “सुहानी का सफ़र” से बदल कर “सुहाना सफ़र और ये मौसम हसीन” कर दिया था। नीचे उसका नाम लिखा था – द्वारा: एम.के. जोशी। आगे पढ़ने की हिम्मत ही नहीं बनी।

प्रडक्शन कम्पनी का अंतिम ऑफ़र अस्वीकार कर उसने अपनी इस भविष्य की प्रतिबिम्बि को हमेशा के लिए ख़त्म कर दिया। मयंक की कल्पना शक्ति ने सचमुच उसे एक ऐसे भविष्य से बचा लिया था, जिसमें उसकी इस कल्पनात्मकता की कोई जगह ही नहीं थी।

नुक्कड़-नाटक की दुनिया में मयंक ने एक नई स्फूर्ति के साथ दोबारा क़दम रखे, और दुनिया ने भी कभी किसी महान निर्देशक, एम.के. जोशी, का नाम नहीं सुना।

प्रतिबिम्ब
लेखिका : अनामिका पुरोहित


अपनी विशिष्ट मनोवैज्ञानिक शैली में लिखी गयी अद्भुत कहानी है। पाठक के हृदय में जिज्ञासा सतत रूप से
जागी रहती है कि दोनों पात्रों में परस्पर क्या संबंध निकाल कर आयेगा। यही एक कुशल कथाकार का गुण
है। अंत नवीनतापूर्ण और संदेशपरक किया गया है।

शिशिर सोमवंशी
मार्गदर्शक : कहानी सुहानी 

8 Comments Add yours

  1. Nitin says:

    उम्दा कथानक मन की कश्मकश के दौर में भविष्य के आईने में आपने ही प्रतिबिंब से सामना हो जाने को बहुत अनूठे ढंग से आपने पेश किया है। आपकी लेखनी बहुत सक्षम और कल्पनाशील है ।

    1. Anamika Purohit says:

      बहुत धन्यवाद, आपका! आपने विषय को बहुत उत्कृष्टता से समझा है। मुझे ख़ुशी हुई कि आपको मेरा लेखन पसंद आया। 🙏🏼

  2. Wah! बहुत ही ग़ज़ब कल्पनाशीलता का परिचय दिया है आपने….बेहद ख़ूबसूरत कहानी बन पड़ी है। बहुत ही सफ़ाई से अंतर्द्वंद को उभारा गया है कहानी में। साधुवाद।

    1. Anamika Purohit says:

      आपके सकारात्मक विचारों के लिए बहुत धन्यवाद! 🙏🏼

  3. ajaypurohit says:

    जैसा कि शिशिर जी ने लिखा, यह कहानी पाठक को बाँधे रखती है । अत्यंत रोचक व सुंदर लेखन । कहानी के अंत तक पहुँचते हुए मुझे लगा कि शायद दोनों पात्र ही आत्माएँ हैं किंतु बधाई देना चाहूँगा अनामिका को कहानी को एक अप्रत्याशित अंत देने के लिये ।

    1. Anamika Purohit says:

      शुक्रिया! जान कर ख़ुशी हुई कि आपको कहानी मनोरंजक लगी। प्लॉट पर नए सुझाव के लिए विशेष धन्यवाद! 🙏🏼

  4. आपकी कहानी बहुत अच्छी लगी कल्पनाशीलता का बहुत उम्दा इस्तेमाल किया है आपने।

    1. Anamika Purohit says:

      बहुत धन्यवाद! मुझे ख़ुशी है कि आपने मेरी कहानी को पढ़ा एवं पसंद किया।

Leave a Reply

Fill in your details below or click an icon to log in:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out /  Change )

Google photo

You are commenting using your Google account. Log Out /  Change )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out /  Change )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out /  Change )

Connecting to %s