Best Of Swalekh : April 28

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स्वलेख : April 28, 2017
मार्गदर्शक : कोशिश ग़ज़ल
विषय : आसमान

चयनित रचनाएं


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यूँ तो जो भी आया
लिख के गया
हर रिश्ते ने भी
अपनी मनमर्ज़ी से ही भरा…
फिर भी,
ख़ाली सी है ज़िन्दगी
और कोरे से दिन..
ख़ुद भरूँ अपने से,
कभी सोचा नही..
उम्मीदें थी उड़ने को बेताब,
पर आसमाँ मिला नही..
मेरी डोर ने हमेशा हाथ,
किसी और का ही पाया।


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बचपन में आसमान को ख़ूब तका मैंने…
सूरज को गाड़ी की पिछली सीट पर बिठा..
न जाने कितने ही सफ़र किए…
अष्टमी, करवा-चौथ और शायद हर व्रत पर ही…
माँ के साथ…
कभी चाँद…कभी सितारों को पूजा मैंने…
आसमान की उम्र बढ़ी तो कुछ अपने ही,
सितारें बन उसे और मुबारक करने चलें गए…
फिर हर रात ही आसमान से मुलाक़ातें हुई मेरी..
सितारों ने मेरे लिए कानों पर दूरबीन भी लगा ली..
ढंगी बेढंगी..फिर उनसे सारी ही बातें हुई..
फिर..
फिर.. तुम मिल गए मुझे…
और मैंने आसमान को देखना छोड़ दिया…
कार की सीट पर बिठा, तुम्हारे साथ कई सफ़र किए..
तुम्हारी चाँद-सितारा आँखों की इबादत की…
तुमने ग़ौर किया कभी तो ढंगी-बेढंगी सारी ही बातें कर डाली तुमसे..
तुम्हारे मन के आसमान से कुछ बूंदे दिल की ज़मीन पर गिरी…
और फिर..
फिर तुम चले गए..
अच्छा ही किया वैसे…
वो आसमान ज़मीन पर उतर जाता तो मैला हो जाता..!
ज़मीन भी कहाँ ही संभाल पाती आसमान को…
आसमान…आसमान ही रहे…
मैं बस तकता रहूँ..
बच्चा..ही रहूँ..
तो अच्छा है..!

images (2)@rawatwrites
आसमान को निहारो
और निहारते रहो
जैसे अपनी प्रेमिका को निहारते हो घंटो भर तुम
आसमान को आलिंगन भी कर सकते हो
बस ये ज़मीन पर रेंगना भूल जाओ
अगर आसमान बड़ा है
किसी समन्दर के जितना
तो ख़ुद की पीठ पर उगे तिल जितना छोटा भी है
जो अभी तक बचा हुआ है नजरों से
इसका एक छोर जीवन है
और दूसरा छोर मृत्यु है
बीच में व्याप्त है असीमित मौन
ये मौन किसी कवि की कविता से नहीं टूटने वाला
इसके लिए कवि को ख़ुद बिखरना होगा
छोटे छोटे शब्दों में
ठीक जैसे तारे बिखरे पड़े है
हर एक शब्द ऊर्जा से पूर्ण है
जो जला सकता है
किसी ग़रीब के घर का चूल्हा
आसमान को बाँधकर रखो ख़ुद से
और ज़मीन को पैरों से 

One Comment Add yours

  1. archanaaggarwal4 says:

    खूबसूरत आसमान 🙂

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