Suyodhan : Joy Banerjee

9


दिसम्बर का आखिरी हफ्ता शुरू हो चुका था। समय एक साल और बूढ़ा हो गया.. पर मौसम का मिज़ाज़ अबकी कुछ अलग ही था,कंफ्यूज सा, बिल्कुल मेरे जैसा। वरना शिमला में अब तक तो अच्छी खासी बर्फ पड़ चुकी होती है।
शिमला में मेरा पांचवा साल है। चार साल पहले एक टीचर बन के मैं बनारस से आया था। बस तभी से यहीं का होकर रह गया था। सब कुछ ठीक ठाक चल रहा था। पर पिछले साल से मेरे साथ शुरू हुए घटनाओ और दुर्घटनाओं के “चेन-रिएक्शन” ने सब बदल के रख दिया। मैं इन विंटर वेकेशन में खुद को समेटना चाहता था, जो पूरे घर में टुकड़ो में, हर कोने में बिखर पड़ा था।

मैं अपने को जोड़ने की कोशिश कर रहा था। अंजान था किसी भी दस्तक से-

तभी, मेरा  नोकिया 3310 बजा-

“हेलो”

“प्रोफेसर”

“हम्म” – शब्द गले में अटक गये।

“देखो, मैं चंडीगढ़ पहुँच चुकी हूँ। 4-5 घण्टों में शिमला आ जाउंगी। कहीं जाना मत” – आदेश था या निवेदन …पता नही।

“लेकिन, सुनो …”

टूँ… टूँ… लाइन डिसकनेक्ट हो चुकी थी।

“सैंडी”….”उफ़…फिर से,पर उसकी आवाज़ को क्या हुआ? इतनी सधी तो नही थी। उसकी आवाज़ ही तो पहचान थी उसकी उन्मुक्त, स्वछन्द सी फिर ये ठहराव कहाँ से आया?”

ना चाहते हुए भी, मैं फिर से छन्न से टुकड़ो में टूट कर बिखर चुका था पूरे कमरे में। सिगरेट सुलग चुकी थी, मेरी उँगलियों के बीच।

पिछले साल भी, इसी दिसम्बर, मेरा फ़ोन बजा था। 

अमेरिका से राय अंकल का फ़ोन था .. उनके बिज़नेस पार्टनर की बेटी शिमला आ रही थी … पढ़ने। ऊपर वाला कमरा उसको देना था।

राय अंकल, मेरे पिताजी के बचपन के दोस्त थे। अब अपने बेटों के साथ अमेरिका में शिफ्ट हो गए है, यहाँ के घर का जिम्मा मेरे हवाले कर के। अब आप जो भी समझिये – केयरटेकर या चौकीदार या किरायेदार- सब मैं ही था।

31 दिसम्बर की रात,  बर्फबारी हुई थी पर थोड़ी। ठण्ड बढ़ गयी थी। बाहर नये साल का शोर शुरू हो चुका था। मैं पूरे मूड में था रज़ाई तान के सोने की। पर रज़ाई गर्म ही नही हो रही थी। फिर, कब आँख लगी पता नहीं

सुबह ही सुबह डोर बेल से मेरी आँख खुली।

बेमने से उठा फिर ठिठुरता हुआ दरवाज़ा खोला। सोचा था जो भी होगा उसको सौ गालियाँ दूँगा, नये साल की गालियों से शुरुआत करूँगा। 

दरवाज़ा खुला-

“गुड मॉर्निंग एंड हैप्पी न्यू ईयर मिस्टर सुयोधन” 

मेरा मुँह खुला का खुला सा रह गया कुछ कन्फ्यूज़ सा, हैरान सा ठंडा पड़ता गया दरअसल मुझे आदत नही थी ऐसी किसी घटना की।

“सेम टू यू, आ….आप कौन?”

“वेल मैं सैंडी…आय मीन सैरन्ध्री। राय अंकल ने बताया होगा” उसने हाथ मिलाने को अपना हाथ बढ़ाया।

“ओह.. तो आप ही सैरन्ध्री जी है। हाँ हाँ चाचाजी का फ़ोन आया था..” अभी भी मेरी नज़र उसके चेहरे पर ही जमी थी, कम्बख्त हटी ही नही रही थीं।

“वेल! अंदर आने को नही कहेंगे?

“आइये ना प्लीज..” हड़बड़ा के मैंने अपनी गलती सुधारी।

“नाइस रूम, मेरा बेड कहाँ है प्रोफेसर?” अंदर आते ही धमाका किया। 

“जी मैं टीचर हूँ, प्रोफेसर नहीं। और आपका कमरा ऊपर है। ये मेरा कमरा है।” एक ही सांस में सारी बात उलट दी।

“टीचर हो या प्रोफेसर कोई फर्क नही पड़ता, दोनों ही पढाते है। क्यों है ना। मैं तुमको प्रोफेसर ही बुलाऊंगी।”

क्या कॉन्फिडेंस था। एक बिंदास हंसी गूँजी।

“जैसी आपकी मर्ज़ी। क्या लेंगी…चाय या कॉफ़ी?”

“कॉफ़ी विथ आउट मिल्क और देखो मुझसे इतनी फॉर्मेलिटी नही होती। मैं तुमको तुम ही बोलूंगी और तुम भी मुझे तुम ही बोलो। ये आप-आप आंटियों जैसा लगता है”

“ये लीजिये आपकी कॉफ़ी” मैंने कप बढ़ाया।

“क्या अभी अमेरिका से आ रही हो?”

“नही,नही मैं तो माँ के जाने के बाद ही इंडिया आ गयी थी,अगस्त में, तब से दादी के पास गुजरात में ही थी। फ़ॉर योर इनफार्मेशन मैं बता दूं कि मेरी माँ ब्रिटिश थीं और पापा गुजरात  इंडिया से है। पापा का डायमंड का बिज़नेस है यूरोप में और राय अंकल के बेटे की पार्टनर शिप है हमारे साथ। मैंने लास्ट ईयर लीडस् यूनिवर्सिटी में अंडर ग्रेजुएट प्रोग्राम में एडमिशन लिया था पर मेरा मन इंडिया आकर पढ़ने का हुआ तो पापा ने यहां भेज दिया”

“अच्छा बहुत अच्छा लगा आपके बारे मे जान के। वैसे मैं बनारस का हूँ,  तीन चार सालों से यहां हूँ। अब यहां से कहीं और जाने को मन ही नही करता” – मैंने भी छोटा सा परिचय दिया।

“सैरन्ध्री, बड़ा ही अच्छा और अलग सा नाम है। सैरन्ध्री यानी द्रौपदी” 

“थैंक्स, पर सुयोधन मतलब?”

“आपसे ही जुड़ा है, हा हा हा..। आप और मैं दोनों महाभारत काल से है। दरअसल, सुयोधन दुर्योधन ही है।

“फिर तो हम दोनों एक दूसरे के अपोजिट है।

वो कह कर मुस्कुरा दी और मैं अन्दर तक हिल गया.. इतनी खूबसूरत मुस्कान मैं शायद ही कभी देखी थी ..

कैसे महीना गुज़र गया उसको आये। इस बीच काफी कुछ जान सा गया था उसको। पर और भी जान ने की कोशिश कर रहा था। बड़ा रहस्य था इस पीढ़ी में, उसी को समझने की कोशिश में था। बमुश्किल आठ-दस सालों का ही तो अंतर था मेरी और उसकी पीढ़ी में। इन आठ दस सालों में ऐसा क्या बदल गया कि इस पीढ़ी का पूरा नज़रिया ही बदल गया। सुना था ये पीढ़ी रोमांच और रोमांस के लिये कुछ भी कर गुजरने के लिए तैयार रहती है। अब ये महसूस भी करना चाहता था।

सैरन्ध्री, पच्चीस छब्बीस साल की, एक आकर्षक लड़की, बिल्कुल उन्मुक्त, खुले विचारों की, बिंदास। कहीं भी, कुछ भी बोलने वाली। हिंदी में अभी भी अटकती सी। कभी कभी शब्द पकड़ाने पड़ते थे।

एक महीने में, अब तक हम “आप” से “तुम” होते हुए, “तू और तेरी” तक आ गए थे.. अब तक मेरी सोहबत में थोड़ी बहुत हिंदी भी सुधर गयी थी। मैं जितनी बार मैं सोचता मैं उसको जान चुका हूँ, वो हर बार मुझे गलत साबित कर देती। हर बार कोई नया धमाका और मेरी सोच तहस नहस।

एक शाम यूँ ही अचानक-

“प्रोफेसर चल आज बीयर- शीयर पीते है।”

“मैं नहीं पीता।”

“बड़ा आउट डेटेड है यार तू। चल ना पीते है। बस हल्का सा सुरूर होगा”- हाथ पकड़ के खींचा उसने।

“नहीं । मैंने आज तक नहीं पी और आज बहुत सारा काम भी निपटाना है स्कूल का।” – मैंने बहाना बना के पीछा छुड़ाना चाहा।

“बिल्कुल लड़कियों जैसा बिहैव कर रहा है तू। चल मेरे रूम पे चल के पीते है और तू घबरा मत, नशे में तेरा रेप करके ऍम ऍम एस बनाने का मेरा कोई इरादा नही। चल आ जा।” एक बिंदास ठहाका।

“कुछ तो शरम करो, लड़की हो कम से कम….” मैंने किसी तरह से खुद को संभाला।

“लड़की होना कोई पाप है क्या? क्या सोच है!! तुम्हारे इंडिया में बातें भी जेंडेरली डिस्क्रिमिनटेड है। ये बात लड़कियों की, ये बातें लड़कों की। गर्ल्स हॉस्टल की दीवारें तो तुम लोगो का “आल टाइम फेवरिट प्लेस” है बाथरूम करने का। ये तुम लोगों का मेल शौविनिस्म है, और लड़कियों से उम्मीद करते हो कि वो अपनी आँखे बंद कर लें। रबिश”

उस दिन मैं निरुत्तर था।

**

पहाड़ों पर बारिश का कोई भरोसा नहीं। ना जाने कब शुरू हो जाए।

एक दिन अच्छी बारिश हुई। शाम तक मौसम खुल गया था।

हम दोनों की तरह कुछ कुछ ।

उसको आये तीन महीने हो चुके थे। शायद अब हम दोनों को एक दूसरे की “लत” लग चुकी थी। सुबह तो दोनों बिज़ी रहते पर शाम हर दिन साथ गुज़रती।

इतना समय गुज़ारने के बाद भी एक डर सा लगा रहता उसके टेम्परामेंट को लेकर। बड़ी अंप्रेडिक्टबिल सी थी वो।

एक शाम, स्कैनडल पॉइंट पे यूँ ही खड़े थे।शादियों का सीजन था। पूरे शिमला में नए जोड़े छाये थे। वो ध्यान से नए जोड़ो को देख रही थी। बीयर का कैन हाथ में अटका था। तभी, फिर से बम फूटा-

“प्रोफेसर, आर यू वर्जिन?”

चौकना लाज़मी था।

“हाँ भई, शादी नहीँ की तो कुँवारा ही तो हुआ।” बात पलटने की कोशिश की।

“मैंने बैचलर या कुँवारा नहीं पूंछा। मैंने पूछा आर यू वर्जिन?” – तल्ख़ी थी आवाज़ में

“क्या वाहियात बात कर रही हो” हड़बड़ा गया मैं।

“वाह मिस्टर, तुम लोग हम गर्ल्स को जिस चीज़ से जज करके “प्योर” होने का सर्टिफिकेट देते हो उसके बारे में लड़की बात भी ना करे। रियली सिक इंडियन माइंडसेट”

“सैंडी.. हमारा समाज अभी इतना नही खुला कि हम इन पर बात या बहस कर सकें” समझाने की कोशिश की।

“अच्छा प्रोफेसर, प्यार व्यार किया है कभी या वो भी समाज ने?” छेड़ा मुझे

“मुझे लड़कियों में कोई इंट्रेस्ट नही है।” आँख चुराई मैंने

“क्यों भला? लड़कियों में इंट्रेस्ट नही है !!! ओ यार, नॉर्मल तो है ना तू या “गे” है।” एक ठहाका

“ओ शट अप सैंडी । क्या फ़ालतू का मज़ाक है।”

“तो नॉर्मल है तो प्यार व्यार भी नहीं किया किसी से?” ज़ोर से बोली-

“किया था, दो बार…पर” अधूरी छोड़ दी मैंने बात

“हे वाओ !!! बड़ा खिलाड़ी है तू यार। बता ना अपनी अनयुज़ुअल सी लस्ट स्टोरी, आय मीन लव स्टोरी।”

“अनयुज़ुअल सा कुछ भी नही है इसमें। पहली वाली मुझसे छह साल बड़ी थी” सपाट सा उत्तर दिया।

“ओह हो!!! तो तुझे लड़कियां नही औरतें पसन्द है।” फिर छेड़ा

“नही मुझे मैच्योर लड़कियां पसन्द है” मैंने उसे ठीक किया।

“वही मतलब, यानि कि पका हुआ आम। बस धो कर मुँह लगा के चूस डालो, आखिरी बूँद तक, दाँत गड़ा के मज़े लो। यही ना” एक ठहाका।

“कितनी घटिया सोच है तुम्हारी।” दिमाग गर्म हो गया

“ओके ओके, सॉरी सॉरी…और दूसरी वाली?” 

“भाग गई। शादी के एक दिन पहले।” छोटा सा जवाब दिया।

वो चौकी

“हाऊ इंट्रेस्टिंग!! लव थी या अरेन्ज?”

“अरेंज्ड थी”

“तो इसमें लव कहाँ था?” जोश से पूछा

“था ना लव, मेरी तरफ से। उसकी तरफ से कोम्प्रोमाईज़”

“पर वो भागी क्यों?”- कंफ्यूज हो गयी वो

” शायद उसको मेरा टीचिंग प्रोफेशन पसन्द नही आया होगा।

“नहीं ऐसा नहीं है कुछ। अपनी भी बताओ कुछ?”  मैंने कुरेदने की कोशिश की

“देखो प्रोफेसर, एक बड़ा सा घूँट लिया, यू इंडियंस आर वैरी सेंटी यार। ये प्यार व्यार कुछ नही होता। बी प्रैक्टिकल, कम ऑन इंजॉय योर लाइफ। फ़ॉर मी, लव इस ओनली रिफाइंड नेम ऑफ़ लस्ट।  लव इज़ ओनली लस्ट नथिंग एल्स। लव इस सिम्पली, टू द फूल्स, फ़ॉर द फूल्स एंड बाई द फूल्स।” बिंदास बोली

“लस्ट??? क्या कहूँ अब? ये तुम्हारी समझ से परे है ..तुम नही समझोगी। जिस दिन होगा तब समझोगी” 

“हेलो प्रोफेसर, लव और मैं !! बुलशिट। मेरे लिए ये सिर्फ एक दूसरे से चिपकने का एक बहाना है।”

बातें करते करते कब घर आ गया, मालूम ही नही चला।

“चलो देखेंगे। पर क्या विज़न है तुम्हारा !! बड़ी साइको सेक्सुअल सोच है, बिल्कुल फ्रायड की तरह, जिसे बच्चे के अंगूठा चूसने में भी सेक्स दिखाई देता है। मतलब हर रिश्ता सिर्फ सेक्स से शुरू और सेक्स पे खत्म। क्यों यही ना” मैं भी अब बोलने लगा।

“बिल्कुल देख लेना। और इस थ्योरी में गलत क्या है? यही सच हैं पर हम इस सच्चाई को मानते ही नहीं, एक रिश्ते का मुखौटा लगा के उसे झुठलाते फिरते है। सच बोलूं तो लव स्टार्टस बिटवीन द लेग्स, एंड इट एंड्स बिटवीन द लेग्स। ईट्स जस्ट रिडिक्यूल्स। जो करना है करो ना। ये प्यार व्यार का नाटक क्यों?” 

“इंसानी समाज, उसके कायदे कानून भी कुछ मायने रखते है। सब कुछ यूँ ही नही होता जैसा तुम बता रही हो।

“कम ऑन यार!! अब इसमें तुम्हारा  सो कॉल्ड, सोसाइटी, समाज, नियम कानून कहाँ से आ गए? मुझे तुम्हारा जिस्म चाहिये, तुम्हे मेरा। तुमने दिया मैंने लिया। सिम्पली गिव एंड टेक रिलेशनशिप। उसके बाद तुम अपने रास्ते मैं अपने रास्ते। जस्ट म्यूच्यूअल कोऑपरेशन।” एक सांस काफी थी।

“देखो सैंडी, ये इंडिया है।  कभी किसी एक का होकर देखना , कितनी शांति मिलती है।

यहां तुम्हारा वाला प्यार नही चलता। प्यार सिर्फ म्यूच्यूअल कोऑपरेशन नहीं है, ना ही गिव एंड टेक रिलेशनशिप। एक समर्पण है, त्याग है।

“सच्चाई !!! गहराई !! माय फुट, ऑल आर हिप्पोक्रेट्स। मेरे हेड प्रोफेसर को देखा है। उस बुड्ढे की बेटी मेरे साथ ही पढ़ती है। पर मुझे देख कर आँखों से लार टपकती है जैसे लड़की नही देखी कभी। चपरासी से लेकर हेड तक सब की आखों में कपड़ों के पीछे का जिस्म तैरता रहता है। नाम कितना भी अच्छा दे दो त्याग, समर्पण बट ऑल आर रासकल्स।

“अपनी अपनी सोच है सैंडी। तुम्हारे वाले प्यार, जो जिस्म पे शुरू होकर जिस्म पे खत्म होता है, पे मुझे इत्तेफाक नही। ठीक उसी तरह मेरा वाला प्यार, जो जिस्मानी रिश्तों के आगे शुरू होता है, उस पर तुमको विश्वास नही है। शायद हमारे परिवार के आदर्शों, संस्कारों और माहौल का असर है जिसमे हम बड़े होते है।

मैंने गौर किया रात काफी हो चुकी थी। कल स्कूल भी जाना था। इस विषय पर और डिस्कशन नही करना चाह रहा था। सो, मैंने खुद को समेटा 

“अच्छा रात काफी हो गयी है चलता हूँ। पूरा डिस्कशन फिर कभी। गुड नाईट”

“तुम सारे मर्द एक जैसे होते हो। कभी भी कोई काम पूरा नही करते। चाहे डिस्कशन हो या सेक्स, अपना काम हुआ, ज़िप चढ़ाई, चाहे पैंट की हो या होठों की और, निकल लिए।”

मैं सिर्फ खिसिया के, मुस्कुरा भर सका।

उस रात, शिमला के हिसाब से गरमी कुछ ज़्यादा थी। गरमी बाहर थी कि मेरे अंदर पता नही चल पा रहा था। करवटों से सफेद चादर पर सिलवटें बढ़ती जा रहीं थीं। आँखें बंद थीं और दिमाग पर सैंडी का कब्ज़ा था। फिर…

मेरा बिस्तर छोटा होता गया, अचानक से गरमी और बढ़ गयी। जिस्म से कपड़े अलग हो चुके थे। होंठ, हाथ और जिस्म में कशमकश जारी थी। सारे अंग अपना कर्म करने को आतुर थे, पर मन विद्रोह कर रहा था। संस्कार अपनी मर्यादा लांघने को तैयार नहीं था। जिस्म अपना धर्म निभा रहा था, और मन अपना। द्वंद चरम पे था। जायज़ और नाजायज़ में कशमकश जारी थी। कभी तन की भूख हावी तो कभी मन की उलाहना। है ईश्वर! शक्ति दे गलत को गलत कहने की। आँखें अभी भी बंद थीं। शायद किसी सपने की तलाश में। द्वंद..विचारो का उठा पटक, पसीने से तर- बतर जिस्म की सौंधी खुशबु दिमाग में बैठती जा रही थी। बस तन का अनचाहा समपर्ण…

“नहीं… हटो.. ये ठीक नही है। सैंडी ..अपने कमरे में जाओ और प्लीज़ अब कभी मत आना मेरे सामने। मैं नज़रें नहीं मिला पाऊंगा अब तुमसे। तुम जाओ यहां से ” आँसू ढलक गए थे।

सैंडी कब गयी और कब मैं ज़मीन पे सो गया, मालूम नहीं।

सुबह,आँख खुली….

कई बार पोंछा। हाथ से, कपड़े से पर बाथरूम का शीशा पता नहीं क्यों, चेहरा धुंधला दिखा रहा था।

कई बार रगड़ रगड़ के नहाया, जैसे चादर में जमी धूल मेरे शरीर से आ चिपकी हो और जितना रगड़ो, उतना ही घुसती जाती थी रोम रोम में।

मेरे और सैंडी में प्यार तो था नहीं फिर ये क्या था? क्या बिना प्यार के समर्पण? ये कौन सा वाला प्यार है? मेरा वाला तो कतई नहीं तो शायद सैंडी वाला तो क्या वो सही थी? “म्यूच्यूअल कोऑपरेशन”, “गिव एंड टेक” क्या यही है? पर उसने माँगा, उसने लिया। मैंने तो नहीं दिया ना मैंने उससे माँगा। पर साथ तो मैंने भी दिया था बराबर। ये प्यार था या लस्ट। शावर के पानी के साथ मैं भी बह रहा था नाली से।

मैं तैयार हो कर निकल चुका था, चंडीगढ़। अपने दोस्त से पास, जहाँ अकेले में उत्तर ढूंढ सकूँ अपने प्रश्नों का। पर सैंडी एक धुंध की तरह जम सी गयी थी दिमाग़ की सतह पर। जिस्म उसकी खुशबू से लबरेज़ था। अब रोम में जमी धूल धीरे धीरे सतह पर आने लगी थी। शायद एक बार फिर से चादर पे बिछना चाहती थी। फिर से मेरे भीतर समाने के लिये।

मेरी समझ में आने लगा था-लव इज़ नथिंग, ओनली रिफाइंड नेम ऑफ़ लस्ट। सैंडी शायद ठीक थी। अब तक मैं जान चुका था कि मैंने क्या खोया और मुझे क्या मिला? अब मुझे एक बार फिर सैंडी की ज़रूरत महसूस हो रही थी। पर किसलिये?प्यार के लिये? शायद नही, तो फिर!!!

हफ्ता भर लगा जिस्म की भाषा और मांग समझने में।

वापस आया। कमरे के स्टडी टेबल पर ऊपर वाले कमरे की चाबी रखी थी। एक गुलाबी कागज़ के ऊपर। मैंने उसके तह खोले आहिस्ता से, जैसे उस रात उसके कपड़े खोले होंगे, ठीक वैसे…बिना आवाज़ किये। नज़र हर्फ़ों पर कुछ यूँ गिर रही थी जैसे उसका जिस्म हो।

“डियर प्रोफेसर-

मुझे मालूम है तुम खुद को गिल्टी समझ रहे हो इसीलिए कहीं दूर जा छिपे हो। दरअसल, प्रोफेसर तुम खुद से और सच्चाई से भाग रहे हो। तुम्हारी इसमें कोई गलती नहीं मैं ही चुपके से तुम्हारे बिस्तर में आ घुसी थी। तुम्हे समझाने “लव इज़ ओनली लस्ट”।  

 “सैरन्ध्री”

*************************************

पिछला साल आँखों के सामने से कल की तरह गुज़र गया। सिगरेट सुलग सुलग के ना जाने कब की राख बन चुकी थी। पर उँगलियों के बीच, तपिश बाक़ी थी। और धुंए ने मुझे घेर रखा था।

गेट की चरमराहट से, झुरझुरी के साथ मैं वापस लौटा-

वो भी वापस आ गयी थी। इससे पहले वो डोर बेल बजाये, मैं दरवाज़ा खोल चुका था। एक ख़ामोशी पसरी थी हमारे बीच, भीतर भी, बाहर भी। बुत बने थे दोनों, समझ नही आ रहा था हाथ मिलाऊँ, गले लगाऊं या फिर कस के लिपट जाऊं। शायद वो भी इसी कश्मकश में थी। 

आखिर में, मैं हटा दरवाज़े से-  रास्ता दिया अंदर आने का। वो निःशब्द अंदर आके बैठ गयी। कमरा शायद वैसा ही था जैसा वो छोड़ के गयी थी। काफी देर तक उसकी आँखें कुछ टटोलती रहीं। शायद अपनी खुश्बू पहचान रही हो ।

“ तुम सही थे .. मैं गलत थी सुयोधन .. उस दिन को मैं अभी तक भूल नहीं पायी हूँ .. और लगता मुझे तुम्हारा वाला प्यार ही सूट करेगा .. गिव मी अनाथेर चांस, प्रोफेसर .. “

मैंने पहली बार सैरन्ध्री कि आखों में नमी देखी थी .. मैं उसकी तरफ देखता देखता कब उसी का हो गया ये मुझे खुद नहीं पता ..

 

समाप्त
लेखक : जॉय बनर्जी 

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4 Comments Add yours

  1. कहानी सशक्त है इसमें कोई शक नहीं गति भी है पकड़ भी किन्तु कहानी की मुख्य भूमिका में ‘सैंडी’ ही है जो सुयोधन को एक सूत्रधार से आगे नहीं बढ्ने देती है।

  2. mohdkausen says:

    प्यार की अलग परिभाषा गढ़ती एक शानदार कहानी। इंसानी हवस को प्यार के पर्दे से बाहर लाकर जॉय ने आज का सुयोधन रचा है। कहानी के संवाद और उनको कहने की कला कमाल की है।
    १-“इंसानी समाज, उसके कायदे कानून भी कुछ मायने रखते है।👍
    १- ये प्यार था या लस्ट। शावर के पानी के साथ मैं भी बह रहा था नाली से।👍

  3. Joy babu aapke samvaad chahe sandy ke ho ya suyodhan ke, bahut umdaa likhe gaye hain!!

  4. kush052 says:

    डायलॉग से प्रभावित हुआ, शब्दों का बख़ूबी उपयोग जो कहानी को खास बनाता है, बधाई हो 🙂

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