Paarth : Ritu Dixit

“पार्थ, पार्थ, कहाँ हो तुम?” मेजर कृष्णा ने कड़कती हुई आवाज़ में घर में क़दम रखते ही पूछा तो पार्थ क्या, घर की सारी खिड़कियाँ-किवाड़ें काँप गयी एक बार तो।
सिर झुकाये एक हृष्ट-पुष्ट जवान २०-२२ साल का पार्थ जब कमरे में आया तो उसे देखकर मेजर साहब और ज़्यादा भड़क गए।
“ऐसे कैसे मार खा कर आ गए तुम? मेजर के बेटे हो या किसी और के?” (मेजर साहब को जानवरों के उपालंभ प्रयोग करने से ख़ासी चिढ़ थी, इसीलिए भगवान की दया से, उल्लू के पट्ठे, गधे, आदि नामों से बरखुरदार को नवाज़ा नहीं गया था, दूसरे क्यूँकि आर्मी में थे, तो मेजर साहब को तू-तड़ाक की भाषा से भी चिढ़ थी…बस एक सधे समय के अलावा) 
“जी, सर, वो…..”
“अरे, क्या वो वो लगा रखी है? बोलती क्यूँ बंद हो जाती है तुम्हारी, मर्द हो की नहीं, किसी की सुन कैसे लेते हो, लोगों की हिम्मत कैसे होती है तुमपर हाथ उठाने की? क्या रुक्मणी, क्या करूँ मैं तुम्हारे इस लड़के का? जब इसकी उम्र का था मैं, तो, पूरे गाँव क्या पूरे जिले में मेरा रौब था, कोई भी पहलवान अखाड़े में टिक नहीं सकता था मेरे सामने….” 
पार्थ को पता था, अभी यह कहानी १५ मिनट और चलेगी, इसीलिए चुपचाप सिर झुकाकर सुनता रहा। वैसे भी यह रोज़ का क़िस्सा था बेटा कहीं ना कहीं से पिट कर आता था और पिता जी उसे अपनी शौर्य-गाथा सुनाने लगते थे, उन्हें लगता था कि शायद यह सब सुनसुन कर ही पार्थ थोड़ा तो….। पर हालात और होनी हमेशा हमारी तो नहीं सुनते हैं। हैं ना? 
पार्थ जैसा था, इसमें उसका क्या दोष। वह हाथ नहीं उठा सकता था किसी पर, किसी ने ऊँची आवाज़ में बोलते हुए नहीं सुना था उसे। जब छोटा था तो घर घर ना होकर एक छोटा-मोटा रैन-बसेरा लगता था, कभी किसी बीमार और भूखे भिखारी को घर ले आया करता तो कभी किसी घायल चिड़िया को उठा लाता। घर वाले वैसे तो हमेशा उसका साथ देते थे पर साथ ही एक आशंका हमेशा घेरे रहती उनको की कहीं दूसरों का भला करते करते ख़ुद को चोट ना पहुँचा बैठे पार्थ। पर पार्थ तो जाने किस मिट्टी का बना था, बिलकुल नेकी कर दरिया में डाल वाली कहावत सटीक बैठती थी उस पर।
यह पार्थ ऐसा क्यूँ हुआ यह सिर्फ़ रुक्मणी जानती और समझती थी, उसकी माँ। हाँ, माँ को तो हर राज़ पता होता है ना, वैसे ही पार्थ का भी एक राज़ था। राज़ भी क्या था जनाब, पता तो सबको ही था, पर इस बात को समझना, स्वीकारना कोई नहीं चाहता था। इस राज़ को जानने से पहले आपको इसकी थोड़ी पृष्ठभूमि जाननी ज़रूरी है।
मेजर साहब, हाँ, अपने मेजर कृष्णा, पार्थ के पिताजी, यूँ तो बहुत ही भले आदमी माने जाते हैं, सबमें लोकप्रिय, सब ही चाहे फिर वोह उनके रिश्तेदार हों या ऑफ़िस के सहकर्मी, उनकी प्रशंसा करते नहीं थकते, की उनके जैसा भोला, समझदार व सुलझा इंसान दूसरा नहीं देखा कभी।
पर यह मेजर साहब, घर की चारदीवारी के पीछे दूसरे ही शख़्स होते। बात-बात पर भड़कना, तिल का ताड़ बनाना तो कोई उनसे सीखे। और उसी तिल के ताड़ में रुक्मणी पिस कर रह जाती। कम तो वह भी नहीं हैं, पर जब मेजर साहब का ३ पेग के बाद प्रवचन और तीखे प्रहार शुरू होते, तो कुछ घर की शांति के लिए, कुछ अपनी शांति के लिए बोलती उनकी भी बंद हो जाती। बात कभी जब बिगड़ जाती तो नौबत थप्पडबाज़ी तक आ जाती।
मेजर साहब ने कभी रुक्मणी को, उसकी बातों को कोई महत्व नहीं दिया। पढ़ी-लिखी व नौकरीपेशा होने के बावजूद, रुक्मणी की हैसियत घर में कुछ नहीं थी। जब तक वह घर के कामों को सलीक़े से करती रहती, ठीक था, पर एक चूक होते ही मेजर साहब घर सिर पर उठा लेते थे। फिर शुरू होता था तानों का दौर, जो देर रात तक चलता रहता। इसी रोज़-रोज़ की चिकचिक के दौरान एक दिन नौ साल का पार्थ जब रोने लगा तो मेजर साहब तैश में आकर उसे उठाकर पटकने ही वाले थे तभी घर पर पार्थ के मामा ने पहुँच कर उसे अपने पिता से तो बचा लिया पर ख़ुद की हवस का शिकार होने से न बचा पाया। मामा-भतीजे का रिश्ता कलंकित तो हुआ ही, इस घटना ने ही पार्थ का स्वभाव बदल कर रख दिया था। एक हँसमुख बच्चा, जो हमेशा हँसता रहता था और दूसरों को हँसाता रहता था, कब एक संजीदा, गम्भीर और थोड़ा सा दब्बू नौजवान में तब्दील हो गया, किसी को पता ही नहीं चला।शुरू में तो उसने बहुत बग़ावत करी पर फिर जैसे हथियार डाल दिए।मामा की मनमर्ज़ी चलती रही, माँ जान कर भी अनजान बनी रही, पिता ने अपनी आँखें तो जैसे मूँद ही रखी थी। 
मेजर साहब का रोज़ रोज़ का पीना और फिर घर का माहौल ख़राब करना, यह बचपन से ही अखरता था पार्थ को, पर अपने स्वभाव के कारण वह कभी अपने मन की बात किसी से कह नहीं पाया। अब तो उसने अपना मन पढ़ाई और दूसरों की मदद करने में लगा दिया था। भगवान की दया ही कह लो, मामा लकवाग्रस्त हो बिस्तर पकड़ चुके थे, तो कम से कम एक जगह से चैन मिला पार्थ को।अब तो उसका मक़सद एक ऐन.जी.ओ खोलकर ग़रीब बच्चों की सहायता करना, उनको रोज़गार के अवसर प्रदान करना था। धीरे-धीरे इस बारे में उसने सारी जानकारी लेनी शुरू कर दी थी। और जल्दी ही उसका सपना पूरा भी हो सकता है, बस अगर मेजर साहब उसका साथ दे दें तो, पर पार्थ जानता था, यह बहुत ही टेढ़ी खीर है, ऐसा होना मुश्किल है, मेजर साहब के तो पार्थ को लेकर अलग ही सपने हैं, और उसका यह फ़ैसला तो वोह क़तई नहीं मानने वाले। पर पार्थ भी अपने सपने पर टिका रहना चाहता था। जाने कौनसी शक्ति उसे हार नहीं मानने की प्रेरणा दे रही थी। 
उस दिन पार्थ जब कॉलेज से वापस आ रहा था, तो बीच रास्ते में रुक्मणी का फ़ोन आ गया था। कुछ राशन का सामान लाने की हिदायत लेकर जैसे ही पार्थ ने गाड़ी मोहल्ले के किराना स्टोर की तरफ़ मोड़ी, बदहवास सी भागती हुई एक लड़की उसकी कार से टकरा गई। इससे पहले पार्थ कुछ समझ पाता, लड़की सड़क पर गिर पड़ी। 
‘अरे अरे, मैडम, थोड़ा संभाल कर, आई ऐम सो सॉरी! आपको चोट तो नहीं लगी?’
गाड़ी से निकलकर जैसे ही पार्थ उस लड़की को उठाने के लिए झुका, चित्रांगदा को देखकर हैरान रह गया। चित्रांगदा उसके क्लास में ही थी, पार्थ का पहला और आख़री प्यार…..पर जिससे बोलने की हिम्मत कभी ना हुई पार्थ की। और आज, बदहवास सी चित्रांगदा को देखकर पार्थ ख़ुद अपने होश खोने लगा। पर चित्रांगदा को तो जैसे होश ही नहीं था,  उसने जल्दी से अपना पर्स उठाया, और उठने लगी, पर शायद उसे पाँव में मोच आयी थी, वो उठ नहीं पायी। अब तो जैसे वो और ज़्यादा घबरा गई और मुड़मुड़ कर पीछे देखने लगी। 
‘चित्रांगदा, देखो, मैं हूँ, पार्थ, हम दोनों एक ही क्लास में हैं, पहचाना नहीं तुमने, चलो आओ, मैं तुमको इधर साइड में बैठाता हूँ, दो मिनट बैठो, फिर मैं तुम्हें छोड़ दूँगा या ऑटो करवा दूँगा, जैसा तुमको सही लगे’ एक ही साँस में सब कुछ कह गया पार्थ।
‘जी, म्म्म…मैं, वो…..’ हकलाते हुए चित्रांगदा तो बस वहाँ से भागना चाहती थी, जैसे, जैसे कोई छड़ी घुमाये और वो ग़ायब हो जाए। उसकी नज़रें अभी भी परेशान हो किसी से छिपना चाहती थी। और जाने क्यूँ पार्थ उसके बिना बोले यह सब समझ रहा था।
 तभी कुछ लड़के दूर से उसे इस तरफ़ आते हुए दिखायी दिया, जैसे किसी को खोज रहे हों। हिरणी की तरह भय से चित्रांगदा की आँखें फैल गई और वह पार्थ के पीछे छुपने की कोशिश करने लगी। पलक झपकते ही जैसे पार्थ को सब समझ आ गया, और बिना एक पल की देरी किए, उसने चित्रांगदा को कार की डिक्की में छिपा दिया। और ख़ुद कार को जैसे स्टार्ट करने की कोशिश करने लगा। 
‘ए, तूने यहाँ किसी लड़की को भागते हुए देखा क्या?’ 
‘मैंने? नहीं तो भाई साहब, मेरी तो कार अभी अभी यहाँ आकर रुक गयी, बस उसे ही देख रहा था’ बोलते बोलते पार्थ ने कार स्टार्ट कर दी, ‘अरे वाह। भला हो तेरा धन्नो!’ बोलते ही वह तीर की तरह वहाँ से निकल गया। 
काफ़ी दूर जाने के बाद साइड में कार खड़ी कर पार्थ ने डिक्की खोली, और चित्रांगदा को बाहर निकाला। वह अभी भी डर से काँप रही थी। उसे पानी पिलाकर पार्थ ने जब चित्रांगदा को उसके घर छोड़ा, तो उसकी व पूरे परिवार की आँखों में कृतज्ञता देखकर ख़ुद उसकी आँखें नम हो आयीं। वहीं उसे पता चला की चित्रांगदा पार्ट टाइम एक स्पेशल बच्चों के स्कूल में पढ़ाती है। स्कूल के लिए डोनेशन अभियान के दौरान ही वो गुंडे उसके पीछे पड़ गए थे। एक जैसे विचार और मक़सद होने के कारण दोनों में जल्दी ही बातों की झड़ी सी लग गयी। दोनों ही अपने-अपने सपने एक दूसरे को बताने लगे। पार्थ से बात करके चित्रांगदा को भी पहली बार लगने लगा कि कोई उसे भी समझता है, उसके सपनों को भी अब एक आकार मिल सकेगा। और मन-ही-मन अपने आप को कोस भी रही थी की आज से पहले उसने पार्थ से बात क्यूँ नहीं करी। पसंद तो वह भी करती थी पार्थ को, पर अपनी सहेलियों से उसके दब्बूपन के क़िस्से सुनने के बाद, उसने कभी कोशिश ही नहीं करी पार्थ से बात करने की। और आज, आज पार्थ उन सब क़िस्सों से कहीं ऊपर उठ गया, जिस तरह सूझ-भूझ दिखाते हुए उसने चित्रांगदा को बचाया था, वह उसकी क़ायल हो गयी थी। 
चित्रांगदा के घर से निकालने के बाद पार्थ भी अपने आप को कुछ बदला सा महसूस कर रहा था, जैसे एकदम से ही उसका खोया हुआ स्वाभिमान वापस आ गया हो। आज भले ही उसने कुछ ख़ास नहीं किया था, पर एक लड़की को बचाया था, स्तिथी का सामना करते हुए, होशियारी दिखाई थी, डर कर भागा नहीं था। सिर्फ़ हाथ उठाना ही तो पुरुष होने की निशानी नहीं है ना। आज उसे अपने होने पर, अपने अस्तित्व पर वाक़ई गर्व होने लगा था। और चित्रांगदा, हम दोनों के ख़्याल और ख़्वाब कितने मिलते-जुलते हैं….आज तो पार्थ कुछ अलग ही दुनिया में था।
 अपने आप को कार के बैक मिरर में देखा, तो पार्थ ने जाना की वह मुस्कुरा रहा था… अपने बालों में हाथ फेरते हुए थोड़ा सा शर्मा सा गया….चित्रांगदा की आँखों में ख़ुद के लिए विश्वास और इज़्ज़त देखकर पार्थ को बहुत अच्छा लगा था….उसका मन हुआ चित्रांगदा को अभी कॉल करके पूछे कॉफ़ी पर चलने के लिए लेकिन फिर कुछ सोच कर रुक गया। 
ऐसे नहीं, कल आराम से बात करेगा….अब तो बहुत बातें करनी हैं…..
अपने घर पहुँचा ही था, की उसे याद आया की माँ ने उससे कुछ समान मँगवाया था। दरवाज़े से वापस जाने के लिए जैसे ही मुड़ा, घर के अंदर से गिलास गिरने की आवाज़ आई और साथ ही ज़ोर से चटाक की। 
दौड़कर अंदर पहुँचा पार्थ तो देखता है, मेजर साहब का गिलास नीचे गिरा हुआ चकनाचूर हो चुका है और माँ टूटे हुए काँच को समेटती जा रही है साथ ही अपने आँसू पोंछती जा रही है। 
‘मेरी ज़िंदगी हराम कर दी है इस दो कौड़ी की औरत ने, साली जबसे मेरी ज़िंदगी में आयी है, तबसे चैन ही ख़त्म हो गया है मेरा, मरती क्यूँ नहीं है तू….’
मेजर साहब रुक्मणी को कंधे से पकड़कर एक और चाँटा रसीदने ही वाले थे, की पार्थ ने बीच में आकर उनका हाथ पकड़ लिया, 
‘बस, बहुत हो गया, सर। अब और नहीं। आज के बाद आप माँ पर न हाथ उठाएँगे न ही उन्हें कुछ जली-कटी सुनाएँगे, बीवी हैं वो आपकी, और अगर अब आपने उन्हें वह दर्जा और इज़्ज़त नहीं दी, तो अभी इसी वक़्त मैं और माँ यहाँ से जा रहे हैं! आप यह न सोचिएगा की हम कहाँ जाएँगे और क्या खाएँगे, इस लायक तो मैं हो ही चुका हूँ, की माँ को रख सकूँ, और माँ, वह तो वैसे भी कभी आपपर निर्भर नहीं थी, सिर्फ़ मेरी वजह से आपकी सुनती आयी हैं। पर, बस, अब और नहीं।’ 
पार्थ की ग़ुस्से में लाल आँखों में दृढ़ निश्चय देख, मेजर साहब सकपका गए, उनका हाथ स्वतः ही नीचे हो गया। वह समझ गए की आज उनका नक़ली पौरुष हार गया है। 
और उधर अपने नए पाए स्वाभिमान के साथ पार्थ अपने आने वाले कल के सपने बुनने लगा। वह सपने जिसमें अब किसी और के सपने भी शामिल हो चुके थे। 
समाप्त

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2 Comments Add yours

  1. Ritu bahut sundar kahani gadhi hai!! Applause!!

    Upalambh aur dhanno ki wajah se kahani mein halkapan lane ka prayas bhi bahut achchha raha.

    Sadhi hui kahani aur ant tak pakad banaye rakhne wali!!

    Parents ko kitni zaroorat hai apne bachcho ke mitr ban kar rahne ki aur unhe samajhne ki…. Kai anarth hone se bach sakte hain….

    Sadhuwaad aur dher sari badhai!!

  2. mohdkausen says:

    ritu bahut sunder kahani likhi hai. nice

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