Srikand : Preet Kamal

सुबह से घर में हलचल है, नए बरतन निकाले जा रहे।हैं, घर को चकाचक चमकाया जा रहा है, रसोई में युद्ध-स्तर पर तैयारी अभी से शुरू है। आखिर कल मुझे देखने लड़की वाले जो आ रहे हैं, वो भी दीदी के ससुराल वालों की ओर से! कमी कैसे छोड़ी जा सकती है खातिरदारी में..!
लेकिन यह हलचल मुझे खुशी नहीं दे रही, ऐसे देखा जाए तो, उदास भी नहीं हूँ। मगर हर आवाज़ के साथ मेरे भीतर भी कोई आवाज़ उठती है, बेचैन करती है मुझे और मैं उस आवाज़ को अनसुना करने की हरसंभव कोशिश में जुट जाता हूँ। किसी तरह, शायद कशमकश के भँवर में से बाहर आ सकूँ।
मैं ‘स्रीकंद’ …. अलग सा नाम है ना? अब जो भी है, यही है…
तो मैं ‘स्रीकंद, २९ वर्षीय, विवाह-योग्य हूँ, अच्छा-खासा कमाने लगा हूँ तो अब माता-पिता शादी करवाने की ज़िम्मेदारी पूरी कर देना चाहते हैं।
आप सोच रहे होंगे, इतने सब के बाद मैं कशमकश और बेचैनी  क्यों अनुभव कर रहा हूँ। 
हां! कमाई अच्छी है, परन्तु कैसे है, यह शायद सभी को स्वीकृत न हो। पिताजी ने लड़की वालों को बताया है कि मैं स्व-नियोजित (सेल्फ-एम्पलोयड) हूँ, निजी परामर्श कार्य-प्रतिष्ठान चलाता हूँ। लड़की वाले भी भोले हैं, उनकी बहू का मायका है तो बिना जांच किए सब मान लिया। 
मेरी मायूसी, मेरी दुविधा…. धागे अभी भी उलझे हैं….
चलिए … थोड़ा पीछे से शुरू करते हैं।
कालेज के दिनों से, जहां मैं ‘Macho’ मर्द की श्रेणी में गिना जाता था…गौरांग, बलिष्ठ कद-काठी .. ‘हीरो’ बुलाते थे सभी मित्र-गण। पढ़ाई और खेल-कूद में भी अच्छा था। कुल मिलाकर एक बढ़िया ‘पैकेज’ था। 
अध्यापकों, दोस्तों के साथ-साथ माँ-पिता जी को भी भरोसा था कि ‘लायक’ बेटे को कालेज से निकलते ही हाथों-हाथ नौकरी मिल जाएगी। मैं, स्वयं भी इसी खुशफहमी का पूरा शिकार था।
लेकिन भाग्य का साथ न हो तो जनाब! …. कोई ‘पैकेज’ काम नहीं आता! यह सार्वभौमिक सत्य नौकरी की तलाश में २ वर्ष तक जूते-चप्पल घिसने के बाद मुझे भली-भांति समझ आ गया था।
सांख्यिकी में ऑनर्स उपाधि के बाद भी नौकरी और मैं एक-दूसरे से अनजान थे। आवेदन-पत्रों के साथ-साथ अस्वीकृति पत्रों की संख्या भी बढ़ रही थी। कहीं मैं आवश्यकता से अधिक योग्य था तो कहीं कम, कहीं पहले से ही ‘सेटिंग’ थी तो कहीं मेरी ‘माचो लुक’ आड़े आ जाती। घर वालों ने भी उम्मीद का दामन छोड़ दिया था। कदम अंदर रखते ही मायूस चेहरा देख माँ , चाय काफी कप उठाए, काम के बहाने रसोई का रुख कर लेती और पिताजी कुछ बुदबुदाते अखबार में डूब जाते। 
अक्सर आते जाते, माँ-पिता जी की कुछ ऐसी गुफ्तगू कानों में पड़ ही जाती..
“सक्सेना जी का बेटा, अर्जुन, .. देखा है न तुमने! नौकरी मिल गई है उसे। सक्सेना जी बता रहे थे , बड़ी अच्छी तनख्वाह है।  और एक हमारे साहबजादे हैं कि नौकरी से ३६ का आंकड़ा लिए घूमते हैं।”
“बस भी कीजिए, जवान लड़का है, सुन लेगा, बुरा लगेगा उसे… कर तो रहा है कोशिश बेचारा.. मिल जाएगी।” , माँ मेरी बेचारगी का रोना रोतीं।
“पता नहीं .. कब वह दिन आएगा। लोग-बाग पूछते हैं, बेटा कमाने लगा होगा… शर्म से सर झुक जाता है मेरा।  किस मुंह से कहूँ कि निठल्ला घूमता है मेरा जवान बेटा, बुढ़ापे का सहारा बनेगा , अभी तो ख़ुद को पालने लायक भी नहीं बना!”
ऐसी बातें सुनकर, मैं और मेरी मायूसी ढीठ बन चप्पल घिसटते कमरे में चले जाते। अकेले यही मुसीबत होती तो भी गनीमत थी। मगर एक तरफ बाहर निकलने पंच पड़ोसी अपनी झूठी सहानुभूति और भांति-भांति की सलाहें लिए यहां-वहां मिल जाते, तो दूसरी तरफ कालेज के दोस्तों से मिलकर पुराने दिनों की यादें सतातीं । तारीफ सुन कर अच्छा तो लगता … परन्तु भीतर ही भीतर नाकामी का अहसास तोड़ भी देता।
रोज़ किसी की नौकरी की या फिर शादी की ख़बर और मिठाई, मेरे मुंह का स्वाद कसैला कर जाती । 
फिर भी, आत्म-अहंकार की संतुष्टि के लिए अधिक से अधिक समय मित्र-मंडली के साथ व्यतीत करने का प्रयास अच्छा और स्वयं को उपयोगी होने का छलावा देता।
‘Macho’ … घिन्न होने लगी थी इस शब्द से, किन्त यही मुक्ति-मार्ग भी लगता था। 
खैर, दोस्त लोग भी एक नाकारा, निकम्मे को कब तक झेलते। आखिर वो सब भी कन्नी काटने लगे। समय को धकेल ही रहा था कि एक दिन कालेज के समय का सहपाठी मिला, विराजस | पुराना पापी था, मेरे हालात समझ गया । बीयर बार में बैठे-बैठे अचानक उसने मेरे आगे प्रस्ताव रखा।
“स्री! शरीर से अच्छे खासे हो, मेरे लिए काम करोगे? समय कम और पैसा ढेर!”
“काम क्या है, विराजस?”
वह बिना  हिचकिचाए, मुझे एकटक देखते हुए बोला, ” एंटरटेनर बनना है… अमीर लड़कियाें, औरतों की पार्टी का एंटरटेनर .. समझ रहा है न ?”
बीयर का गिलास हाथ से छूटते-छूटते बचा। मैं तमतमा कर बोला था, “यू मीन .. जिगोलो… इट इज़ मेल प्रोस्टीट्यूशन! “मेरे साथ ये घटिया बातें मत कर… कट ले बस इधर से तू..” दो चार गालियाँ दे कर मैं बोला ..
विराजस का चेहरा स्थिर और भावहीन था। आराम से बीयर खत्म कर, बिल के पैसे मेज़ पर रख उठते हुए बोला, “दोस्त रहे हो, इसलिए अच्छी आफर दे रहा हूँ। मन बने तो फोन करना, वर्ना रोज़ के धक्के तो हैं ही । टेक केयर!”
वो चला गया । मैं , पूरी रात लड़ता रहा, शब्दों से, दीवारों से, स्वयं से। “नालायक.. नो वेकेंसी…माचो… जिगोलो, प्रोस्टीट्यूट” .. यही शब्द दिखते रहे, गूँजते रहे रात भर।
और अगली सुबह, मैं विराजस को फोन कर रहा था… ‘हाँ’ कहने के लिए….
पहली असाइनमेंट (यही नाम देता था वह काम को) भी जल्द ही आ गई। शहर के सबसे अमीर घराने की बेटी की शादी से पहले उसकी ‘बैचलर्स पार्टी’ … मैं तैयार होकर पहुँच तो गया, पर हाथ पैर काँप रहे थे। विराजस ने जो समझाया था, कुछ याद था, कुछ नहीं..
पता नहीं क्या होना था !!!
पार्टी में अंदर घुसा तो नज़ारा ही अलग था। लड़कियां ही लड़कियां,  सबकी नज़रें मुझ पर थीं, कोई सीमाएं नहीं थी उनके लिए, उन्हें बस जवान मर्द की किस्म का खिलौना चाहिए था खेलने को। स्वयं को समाप्त कर दिया मैंने, आंख, कान, ज़बान, दिमाग सब बंद कर दिया और खिलौना बन गया। एक रात की पार्टी के पूरे ३०००० मिले, महीने के वेतन जितने।  पैसों की छुअन ने सब परिभाषाएं सही कर दी थीं।
कुछ ही दिनों बाद, दूसरी असाइनमेंट भी आ गई। इस बार एक अमीर, शादीशुदा महिला की पार्टी, उसका पति दुबई में था, पैसा भेज रहा था और बीवी ने अपनी ज़रूरतों का सामान ढूँढ लिया था।  मैं वहाँ भी खिलौना ही बना , मगर खेलने के तरीके ने आत्मा के चीथड़े कर दिए।  जिस्मों का खेल जब वहशियाना होता है तो हारने वाले के मानसिक अस्तित्व का विनाश निश्चित है।
इज़्ज़त का बचा-खुचा भ्रम भी उस दिन चकनाचूर हो गया जब विराजस ने मुझे एक ऐसी पार्टी में भेजा, जहाँ केवल लड़के थे। बताया भी नहीं पहले कि मैं मना न कर दूँ। वहाँ पहुँच कर मैंने उसे फोन किया तो उसका जवाब ने मुझे निरूत्तर कर दिया । 
‘खिलौने को क्या फर्क पड़ता है, कोई मर्द उससे खेल रहा है या औरत। पेमैंट से मतलब रखो, बाकी सारी आवाज़ों को खामोश कर दो।’
और सच में मैंने वही किया। रूपयों के पर्दे में सब ढक दिया। अब कोई हिचकिचाहट बाकी न रही थी। मैंने पीछे मुड़ कर नहीं देखा उस रात के बाद। घर वालों के आगे कन्सलटेनसी फर्म का झूठ काम कर गया था। पैसा आने लगा, मां-बाप भी खुश थे, दोस्त और उनकी महफिलें भी लौट आईं। ऊपर से सब ठीक-ठाक था, बस मेरी नींद को डरावने सपनों ने खा लिया था,  आत्म-सम्मान को खिलौना बनाने वाली रातों ने और सच्चाई को मर्दानगी के झूठे तमगे ने।
माँ अपनी सहेलियों और पिता जी अपने दोस्तों के सामने सर उठा कर चलने लायक हो गए थे। परन्तु जब भी मेरी तारीफ की झड़ी लगाई जाती, मैं ज़मीन में और गहरा धँस जाता। महसूस होता जैसे किसी ने यहाँ भी भरी महफिल मेरे कपड़े उतार दिए थे और मैं स्वयं को ढकने के लिए कहीं छुप जाना चाहता था।  कुछ बाकी था , मेरे भीतर… जिसे मैं मार कर भी मार नहीं पाया था, जिसे रूपयों की दीवार में चुनवा नहीं पाया था, जिसके कपड़े अभी भी उसके शरीर से चिपके थे।
आज जब पूरा घर मेरी शादी की बातें और तैयारी को लेकर उत्साहित था, मेरे अंदर का सच्चा इन्सान, सच्चा स्रीकंद, एक मासूम ज़िंदगी के साथ होने वाले अन्याय के विरुद्ध खड़ा होने को कुलबुला रहा था। 
मेरा ‘जिगोलो’ होना,..  यह मेरा ऐसा सच था जिसे बिना जाने एक जिंदगी को मेरे साथ बांध दिया जाने वाला था। एक ऐसा सच जिसे मैंने अपनी सहमति से बनाया, अपनाया। मैं, खुद जो एक बेज़ुबान खिलौने का जीवन जी रहा हूँ, किसी मासूम की जिंदगी के साथ कैसे खेल सकता हूँ। इतना बेगैरत नहीं हूँ अभी । मेरे भीतर का सच्चा इन्सान यह अन्याय नहीं होने देगा। 
बहुत सोचा, और यही समझ में आया कि सत्य को स्वीकार कर लेना .. इन्सानियत की ओर पहला कदम है और एक नए, सच्चे जीवन की ओर भी। 
इसलिए सब कुछ सच-सच लिख कर एक पत्र मां-पिताजी के नाम , उनके कमरे की मेज़ पर छोड़ आया हूँ, परिणाम और भविष्य की परवाह किए बिना। अब जो भी फैसला वे मेरे लिए लेंगे,  उसे इन्सान की तरह स्वीकार करने के लिए तैयार हूँ मैं!!!
समाप्त

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One Comment Add yours

  1. mohdkausen says:

    behtreen kahani snwaad umda hai bhadhai preet

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