Rannchhod : Anshu Bhatia

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आसपास से आती हुई आवाज़ें रणछोड़  के कानों में पड़ रहीं थीं| चेहरे पर पड़ती हुई तेज़ धूप से उसकी आँख खुली| कुछ औरतों ने उसे घेर रखा था| उसके आँखें खोलते ही सभी चार क़दम पीछे हो लीं| उसने चारों ओर नज़रें दौड़ा कर देखा….ये पेड़…ये नदी….ये लोग….सब कुछ उसे अजनबी सा लगा| कुछ दूरी पर एक कुआं था और वहाँ पानी लेने वाली औरतों का तांता लगा था और सभी खुसर-पुसर करती हुई वहां मंडराती रहीं|

रणछोड़ की आँखों में अभी तक नींद की खुमारी थी, लेकिन वो आँखें मलता हुआ उठ ने कि कोशिश करने लगा..

“ये लो साहब”

एक मीठी सी आवाज़ पर उस ने सकपका कर देखा ..  सर पर हरा दुपट्टा ओढ़े बंजारन लड़की थी जो लोटा उसकी ओर करके खड़ी थी| रणछोड़ एकटक उसकी तरह देखता गया तो दुपट्टा मुंह पर ला कर काजल से सजी काली-काली आँखों से मुस्कुरा दी और लोटा रख कर चली गयी | लड़की की आँखों में उसे कुछ दिख गया था जैसे.. उसकी आँखों में कल रात का मंज़र तैरने लगा….

हरे दुपट्टे वाली लड़की की आँखें देख कर उसे उस लड़की का ख्याल आया जिसके साथ उसके पिता ने नशे की दवा पिला कर मंडप में बिठा दिया था.. अपने बाप से उस ने बिल्कुल ऐसी अपेक्षा न की थी ..  वो सोचने लगा कि क्या वो लड़की अभी भी दुल्हन के वेश में बैठी होगी जैसी उसे वो छोड़ के आया था .. हरे हरे सितारों वाली लाल ओढ़नी डाले..

कालिंदी नाम था उसका .. चेहरा तो हल्का सा ही देखा था लेकिन ओढ़नी के नीचे उसके मेहँदी रचे हाथ याद आ रहे हैं उसे..

हो न हो .. उसके पिता और बाकी के घरवालों ने सारा दोष उसके मत्थे मढ़ दिया गया होगा .. लड़की के घर आते ही लड़का घर भाग गया .. अशुभ लड़की .. सितारे, टोटके, झाड फूँक और न जाने क्या क्या ढकोसले होंगे अब बिचारी के नाम पर ..

दोष किसका था .. वो सोचते सोचते चिढ सा गया ..

जैसे गीली मिट्टी पर चलने से पैरों के निशान बन जाते हैं रणछोड़ के कोमल ह्रदय पर भी कई घटनाओं के घटित होने से कुछ निशान बने हुए थे| उसने सारी ज़िन्दगी अपने पिता को हड्डतोड़ मजदूरी करते हुए देखा था| आराम से उनका दूर-दूर तक कोई वास्ता न था| सुबह-शाम बस परिवार पालने के जुगाड़ में लगे रहते| अपने लिए बिलकुल समय न था, परिवार के साथ भी समय न बिता पाते, व्यस्तताएं ही इतनी थीं| कोई नया वार हो या त्यौहार हो उनके पास अपनी सदियों पुरानी व्यस्तताएं हुआ करतीं थीं|

उसे ठीक से याद है, जब उसकी बहन का ब्याह हुआ था तब उन्होंने कई महीने केवल पैसे इकट्ठे करने की उधेड़बुन में गुज़ार दिए थे, और ब्याह के वक़्त भी वो कहीं नज़र नहीं आये| चिंता कर-कर उनके माथे पर गहरी लकीरें खिंच गयीं थीं| उसे कई बार अपने पिता पर बहुत तरस आता| केवल कहने भर को ही उनकी ज़िन्दगी उनकी अपनी थी, वर्ना तो एक-एक लम्हा जैसे गिरवी रखा था| वो अपना जीवन केवल अपने लिए जीना चाहता था, उन्हें देख रणछोड़ ने सोच लिया था कि वो ब्याह नहीं करेगा……मगर उसके पिता को अन्य पिताओं की भांति अपने बेटे के ब्याह के बड़े अरमान थे| वो किसी तौर न माने|

आख़िर उनका वंश कैसे ख़त्म हो जाए| रणछोड़ ने हजारों बार उन्हें समझाने की कोशिश की| पूरी क़ायनात के मुकाबले उनकी शख्सियत कितनी अदना, बौना सी है, किसको उनके वंश की पड़ी है| इतनी बड़ी क़ायनात का कितना छोटा सा हिस्सा थे वो| मगर सदा से ही अपने होने को कितना महत्त्व देते आये| खुद उसे अपने परदादा का नाम याद न था, उनके दादा-परदादा के नाम तो किंचित उसके पिता भी भूल गए होंगे| ऐसे में क्या महत्व है वंश का?? हजारों-लाखों लोग रोज़ जन्मते हैं और मर जाते हैं, इतिहास तो केवल चुनिन्दा लोगों को याद रखता है|

न उसके पिता ने इतिहास में लिखने लायक कोई काम किया न ही वो खुद करने वाला है| और फिर शादी करना और बच्चे पैदा करना ही जीने का एकमात्र मकसद थोड़े ही होता है| मगर उसके पिता को ये सब समझाने की बजाय शायद नदी का रूख मोड़ना आसान काम था| वो नहीं माने और उन्होंने उसे नशा पिला बेसुधी की हालत में उसकी शादी करवा ही डाली…..

रात भर वो नशे की हालत में पड़ा रहा| न दुल्हन का घूंघट उठा न ही वो सेज का श्रृंगार बनी| नीम अँधेरे जब उसकी आँख खुली, कालिंदी गहरी नींद में थी और वो भारी उधेड़बुन में, ये घर….ये गृहस्थी….बीवी-बच्चे….ये सब नहीं चाहिए था उसे, वो इनके बिना भी खुश था| उसके लिए शादी एक मकडजाल से अधिक कुछ न था| बिना किसी आवाज़ या खडके के वो उठा और चल दिया| दरवाजे तक पहुंचा ही था कि कालिंदी ने करवट बदली और उसके साथ ही सन्नाटे में उसकी पायल की आवाज़ इस कद्र गूंजी कि उसके खून के कतरे-कतरे में एक उबाल सा उठा| वो ठिठक गया| उसने पलटकर देखा| अपनी पत्नी को देख वो अपराधबोध से जड़ हो गया| वो जानता था जिस समाज ने एक मर्द की सोच और समझ को महत्व नहीं दिया वो उसकी अनुपस्थिति में इस मासूम सी लड़की का क्या हाल करेगा| उसका हश्र सोच वो सिहर गया| शादी न करने की ज़िद पर वो अड़ा था और करवाने की ज़िद पर उसके पिता| ऐसे में इस अबोध लड़की का क्या दोष? वो तो अपनी आँखों में हजारों सपने संजोये उन्हें पूरा होते देखने के लिए अगली सुबह के इंतज़ार में सो रही थी|

मगर भविष्य की कोख़ में क्या छुपा है ये कोई भी न जानता था| उसके नए जीवन की शुरुआत ही एक तूफ़ान के साथ होगी ये उसके निश्चिन्त मन को कहाँ पता था| ये समाज ताने मार-मारकर उसकी आत्मा को छलनी कर देगा, वो भी ऐसे अपराध के लिए जिसकी वो कतई दोषी न थी| उसके अंतर्मन ने उसे बहुत झिंझोड़ा| उसे लगा न भाग्य कोई करवट ले और न ही समय की चादर पर ऐसी सिलवटें पड़े जो पूरे जीवनभर एक ग्रहण की भांति नज़र आये| बड़ी देर वो वहां खड़ा अपनेआप से लड़ता रहा, मगर अंततः खुद से हार सब भाग्य पर छोड़छाड़ वो चल पड़ा|कौनसी बस पकड़ी, कैसे यहाँ तक पहुंचा, यहाँ कब से सो रहा है .. उसे याद नहीं आ रहा था ..

हरे दुपट्टे वाली लड़की हंस रही थी| उसकी हंसी से रणछोड़ की फिर तन्द्रा टूटी| उसे देख उसे फिर कालिंदी का ख़याल आ गया | पूरे संसार में उसे किसी की कोई चिंता न थी, केवल उस लड़की  के बारे में सोचकर वो चिंतित था| वो लड़की जिससे वो मिला भी न था वो उसे रह-रहकर याद आती थी| सांझ ढले फिर से औरतें पानी भरने आयीं| आते हुए कोई बचा हुआ खाना ले आई तो कोई पुराने कपडे लत्ते|

पंद्रह बीस दिन तक यही क्रम चला लेकिन जब धीरे धीरे रोटी के साथ सिर्फ नमक आने लगा, उसने पास ही की फैक्ट्री में काम पकड़ लिया| मन न लगा तो चार दिन वो छोड़ के साधुओं कि टोली के साथ हो लिया | एक गाँव से दूसरे गाँव घूमने लगा, गेरुए वस्त्र पहन लिए, जटा बाँध ली, टीका लगा लिया, धीरे-धीरे चिलम का भी शौक चर्रा गया… इस संसार, उस संसार सभी की बातें करना सीख़ गया, ईश्वर… कृपा… मोक्ष… निर्वाण…. लौकिक… अलौकिक… सांसारिक मोहमाया… बहुत सारे भारी-भरकम शब्दों का प्रयोग वो सरलता से करने लगा था|

महीनों साधुओं के साथ यूँही ही गुज़र गए | विभिन्न ऋतुओं का आनंद विभिन्न स्थानों पर लिया| मोक्ष…निर्वाण….ईश्वर का तो पता न था….मगर गृहस्थी के झंझट से तो मुक्ति मिल ही गयी थी| और अब तो कमाने का यतन भी न करना पड़ता| दिन में भोग लगी चीज़ें खाता रात को चिलम मार सो जाता|

दिन तो कट जाते मगर रातों के अंधेरों में उसे शांति नहीं मिलती, सारी रात रणछोड़ अजीब से सपनों से लड़ते हुए बिताता…..कभी उसे लगता वो पानी में डूबता जा रहा है, गहरे….बहुत गहरे, उसके गले में बंधा हुआ पत्थर उसे ऊपर न आने देता….कभी लगता कि घने जंगलों में अकेला विचरण कर रहा है, मगर पेड़-पौधे उससे रूठे बैठे हैं, हवा उसे बिना छुए निकल जाती, न पानी में शीतलता बची, न पंछियों के बोलों में मधुरता….कभी लगता किसी पहाड़ी से लुढ़ककर गिर पड़ा है और लुढ़कता ही चला जा रहा है, रास्ते के पत्थर उसके शरीर को छलनी कर रहे हैं, मगर वो फिर से उठ नहीं पा रहा….. उसकी बेचैनी दिनोंदिन बढती जा रही थी|

जिस बात से वो मुंह चुरा रहा था वो सपनों में, नींदों में उसका पीछा कर रही थी| दुनिया से भाग पाना तो आसान था मगर खुद से तो आज तक कोई भी भाग न पाया| वो अपनी पत्नी का दोषी था, और खुद को क्षमा करने में असमर्थ भी…..उसकी एक गैर-जिम्मेदाराना हरक़त की सज़ा एक बेगुनाह जीवन भुगत रहा था!!

उसे कोई हक़ नहीं था अपनी स्वार्थपरता के चलते किसी और को यातना देने का| उसे मंडप में बैठी हुई कालिंदी दिखाई देती| और दिखाई देता उसका और अपना हथजोड़, कितनी स्निग्ध और सौम्य मुस्कान सज गयी थी कालिंदी के चेहरे पर जिस पल दोनों का हथजोड़ हुआ था| बेसुधी के हाल में भी कालिंदी के कोमल हाथ का स्पर्श अपने हाथ पर पाकर वो कितना रोमांचित हो चला था| कुछ पल का साथ अगर ऐसा था तो जीवन भर का साथ कैसा होता!!

समय के साथ उसे ये समझ आ गया था कि भागने में मुक्ति नहीं है बल्कि मुक्ति है जिम्मेदारियों का निर्वाह करने में| बंधन में भी सुख है, वही सुख उसके पिता को भी गृहस्थी से बांधे रहा और वही सुख आज उसे भी गृहस्थी की ओर खींच रहा था| वो उस राह पर चल पड़ा जिससे वो भटक गया था…..असली सत्य की ओर….

रणछोड़ वापिस घर की ओर चल पड़ा .. रास्ते में एक दुपट्टे की दूकान पर हरा लहरिया दुपट्टा देख कर पहले  सर खुजाते हुए हंसने लगा ..और फिर घबरा गया कि कालिंदी घर पे होगी भी कि नहीं .. कहीं वो भी तो घर छोड़ के नही चली गयी ..

रणछोड़ की काटो तो खून नहीं वाली हालत हो चली .. इस से पहले की वोह .. ओह नहीं नहीं .. कुछ बुरा सोचने की गुंजाइश नहीं थी .. उसने फटाफट पहले बस रुकवा कर दुपट्टा खरीदा और फिर आगे ड्राईवर के पास आके बैठ गया .. मिन्नत करने कि भाई कुछ तेज़ चला ले..

समाप्त


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2 Comments Add yours

  1. mohdkausen says:

    असल में कहानी एक ऐसी कला होती है। जिसमे लेखक अपनी कल्पनाओं के रंग भरकर उसे सूंदर बनता है। अंशु इस कला में दिनोदिन निपुण होती जा रही है। कहानी से बहुत कुछ सीखा मैंने, अंशु बहुत अच्छे से आपने कहानी कही है। अंत तो इतना सुन्दर किया है की पाठक अपनी कल्पनाओ से जो चाहे मोड़ दे दे। शानदार जॉब, बिना शक ये कहानी इस थीम की टॉप स्टोरी है।

    1. Bahut shukriya kausen 🙏🙏
      In shabdon se mann mein oorja bhar jati hai, hausla afzaai ka abhar, aage bhi koshish jaari rahegi :))

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