Karan : Navneet Mishra

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भाग-1

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चातक चाँद को देखकर जैसे खुश होता है करन उससे भी अधिक खुश था। नए कपड़ों और गहनों से सजी उसकी दुल्हन उसकी प्रतीक्षा में बैठी थी। इस वातावरण में मुग्ध अनायास ही कब उसका मन बच्चे की भाँति मचल उठा, उसे स्वयं भी भान नहीं हुआ। नयी अनुभूति से अभिभूत स्वयं को आत्मसमर्पित करने बढ़ा ही था कि मन में गूँजती मित्रों की बातों ने उसके पैर जकड़ लिए…

‘आज अगर झुक गया न बेटा, ज़िन्दगी में कभी सीधा खड़ा नहीं हो पाएगा…!’

‘आज तो दिखा देना कि पढ़ लेने से औरत मर्द से बड़ी नहीं हो जाती…!’

‘बस यही दिन है जब या तो सम्हल जाओ या फिसल जाओ…!’

‘हमारी भी इज़्ज़त रख लेना बे! नहीं तो दोस्तों का नाम भी नामर्दों में आ जाएगा…!’

दोस्तों की बातों में ठहाके नमक में मिर्च का काम कर रहे थे। अपनी आत्मा की अनदेखी कर उसने कोमलता को किनारे कर दिया और आगे बढ़ गया, उस रात ही नहीं…शायद जीवन के नए क्षेत्र में भी। 

जानकी की शादी बेमेल विवाह का जीवंत उदाहरण थी। करन माँ बाप का इकलौता बेटा, जिद्दी और बद्तमीज़, पढ़ाई भी पूरी नहीं की और गाँव में अपनी पैतृक सम्पत्ति पर दोस्तों के साथ लफंगई के अलावा कोई काम नहीं। हाई स्कूल में जब तीन बार फेल हो गया तो बचपन के दोस्त जगनाथ के कंधे पर हाथ रख कर बोला था “दोस्त ऐसा कोई मास्टर नहीं जो करन को पास करा दे…” और उसके दोस्त भी उसी के जैसे ठहाका लगा कर हँसते रहे। जानकी से घर में सब खुश थे और उसकी शिक्षा से प्रभावित भी। जानकी ने इसी साल ग्रेजुएशन किया था। घर में उसका बड़ा मान था। करन के पिता बड़े ही शान से बहू के शिक्षित होने की बात करते और यदा-कदा यह भी कि जो कमी बेटे ने रखी थी बहू ने पूरी कर दी। 

जानकी ने अपने व्यवहार से घर में सबका मन मोह लिया था। करन के बाबूजी बहू से बहुत प्रसन्न रहते और घर में उसकी राय को महत्व देते। करन को जानकी का सम्मान अपने अपमान जैसा लगता, यद्यपि कोई उससे कुछ कहता भी नहीं पर उसका मानना था कि जानकी को सम्मान देना उसके पौरुष का अपमान है। करन के लिए दुनिया किसी दुःस्वप्न जैसी हो गयी थी। हर दिन वह इस अपमान भरे जीवन को जीने को विवश था, जानकी जो उसके सुखों के मूल में होनी चाहिए थी, दुख का मूल थी। घर वालों के लाख समझाने पर भी उसके व्यवहार में कोई अंतर नहीं आता। जानकी चाहे जैसे भी उसके प्रति प्रेमातुर रहे, उसके लिए वह कुंठाओं को निकालने का एक माध्यम भर थी। समय बीतने के साथ वह पिता नहीं बन पाने का दोष जानकी पर मढ़ कर वह अपने पौरुष का दिखावा करने से नहीं चूकता था। जानकी यह सब सह लेती कि एक दिन सब ठीक हो जाएगा।

घर में सबके स्नेह के बाद भी उसका अंतर्मन रेत और काँटो से भरा हुआ था। पर वह यह सब किसी से भी नहीं कहती। रेत और काँटो के मार्ग पर चल कर भी वह स्वयं को समझा लेती पर समय के साथ एक खालीपन उसमे भरता जा रहा था। कोई अंकुर उसमे फूटना चाहता था पर समय ने जैसे उसे बाँध रखा था। करन इसे अपनी कुंठा के वीभत्स चश्मे से देखता था। इस क्षण में जब जानकी को उसके प्रेम और सहयोग की आवश्यकता थी वह ठीक उसके उलट हर समय उसे काँटे चुभोता रहता। लोग कुछ भी कहें परवाह नहीं होती थी, पर करन का एक-एक शब्द जानकी को विष बुझे बाण की तरह चुभता था। 

उस दिन तो सारी सीमाएं टूट गईं। जानकी घर के काम से फुर्सत पा कर अख़बार लेकर आँगन में बैठी थी। उसकी दृष्टि पन्ने के एक भाग पर बार-बार चली जाती और वह उसे हर बार एक नई उम्मीद से पढ़ने लगती। सोच रही थी करन को दिखाती कि तभी करन सच में ही आ गया। उसे अख़बार पढ़ते देख जल-भुन गया।

“सोच रहा हूँ दूसरी शादी कर लूँ…” जो विष वह वमन करता था उसका यह आरम्भ था “तुम्हरे रेगिस्तान में तो कितनी भी बारिश हो जाए पौध नही उगने वाली…” जानकी के म्लान मुख को देख पैशाचिक मुस्कान के साथ बोला “अख़बार में क्या लिखा है…? उगेगी पौध…?”

जानकी ने उसी सपाट निर्जन रेत जैसा उत्तर दिया “हाँ जी…देखिए एक विज्ञापन है…”

“अरे सारे वैद तो कर चुके जो करना था। ये लोगो का फायदा उठाने वाले हैं सब के सब। खून चूसते हैं लोगों का। कुछ नहीं होना है इससे। कोई डॉक्टर है जिससे तुम्हे न दिखाया हो? बंजर तो बंजर ही होता है” 

“आप करिये न दूसरी शादी…मैं जो कहेंगे कर दूँगी, पर इस बार एक बात मान लीजिए, शहर चलिए मेरे साथ इस बार, आखिरी बार कह रही हूँ आपसे…” जानकी का गला भर आया, निर्झरिणी बह निकली। 

करन आँसुओ से पिघल गया या शायद उसे लगा कि सच में वह जानकी से पीछा छुड़ा सकता है, अगले सोमवार दोनों शहर गए। 

“आप दोनों के टेस्ट होंगे।” डॉक्टर ने कुछ सवाल पूछने के बाद करन से कहा। 

“लेकिन डॉक्टर साहब हमें क्या हुआ है? एक दम भला चंगा हूँ…और आप मेरी पत्नी से पूछिए उसे कभी लगा हो कि मैं कमजोर पड़ा हूँ कभी…”

डॉक्टर उसकी बात सुनता रहा फिर अनयास ही बच्चों की तरह बोला “भई आप तो खुद डॉक्टर हैं…” फिर उसका स्वर कड़क हो गया “जाइए पहले टेस्ट करवाइए!” करन चुपचाप उठा और चला गया। 

अस्पताल से निकलते हुए करन थका और बूढ़ा लग रहा था। जानकी से आँखे मिलाना तो दूर उसकी ओर देखने में भी उसकी आत्मा काँप जाती थी। 

“ये डॉक्टर फ़र्ज़ी है बता रहा हूँ, तुम्हे कभी लगा कि मैं कमज़ोर पड़ा हूँ? नहीं तुम्ही बताओ जो कभी लगा हो?” अपनी सारी शक्ति झोंक कर जानकी से सफाई दे रहा था। 

“आप अम्मा-बाबूजी से कह दीजिएगा कि मुझमें कुछ कमी है, इलाज़ चलेगा और ठीक हो जाएगा।”

“तुम्हे लगता है वो मान जाएँगे?”

“मैं उनसे कुछ नहीं कहूँगी। कह दूँगी कि डॉक्टरी की बातें हैं मुझे क्या पता।”

“दवाई भी तुम्ही खाओगी?”

“वो तो कमरे में रखी रहेगी, आप आकर चुपके से खा लिया कीजिएगा…”

बात वहीं खत्म हो गयी। दोनों घर आ गए। घर में सबके चेहरे पर खुशी आ गयी कि डॉक्टर कह रहा है सब ठीक होने वाला है। 

 

*****

भाग-2

*****

हर बार की तरह इस बार भी हेमन्त अपनी गुलाबी ठंड लिए आया, पर सालों की प्रतीक्षा के बाद आए जीवन के इस उल्लास भरे क्षण के कारण इस बार हेमंत ऋतु की ठंड में गुलाबीपन अधिक था। शहर की बस से जब जानकी और करन उतरे तब तक साँझ ढल चुकी थी, अँधेरा हो गया था। 

“अब तो रिक्शा भी नहीं मिलेगा कैसे जाएँगे गाँव तक। पहले ही कह दिया होता तो बाबूजी प्रकाश को भेज देते…” जानकी ने उलाहना दिया। 

“गोद में उठा लेता हूँ तुम्हे…” उसने जानकी का हाथ पकड़ कर हल्के से दबा दिया “कितनी दूर है ही गाँव अपना…और इसी बहाने थोड़ी प्रैक्टिस भी हो जाएगी बच्चे को घुमाने की…”

हेमन्त की लाली जानकी में समा गई “जाइए भी, आज तक तो कभी उठाए नहीं…” जानकी ने ऐसे कहा मानो उसे चुनौती दे रही हो। उसका मन हो रहा था इस गुलाबी रात में करन उसे सच में ही गोद में उठा ले। करन आगे बढ़ पता कि ऑटो रिक्शा की हेडलाइट में ठिठक गया। 

“प्रकाश! इस समय कहाँ से…”

“भैया सामान छोड़ से बगल के गाँव से आ रहा हूँ। भौजी को देखा तो…”

“कभी हमें भी देख लिया कर।” दोनों ठहाका लगा कर हँस पड़े। करन कहता रहा “यही बस मिली एकदम लास्ट में…सोच ही रहे थे कि अब क्या करें।”

ऑटो में जब घर पहुँचे तो बड़ी बेसब्री से दोनों की राह देखी जा रही थी। जानकी को अम्मा अंदर ले गईं करन बाहर खाट पर बाबूजी के साथ बैठ गया। घर के अंदर से आती चहकती बातों ने बाबूजी को सब बता दिया। बाबूजी सदैव की भाँति पूछने लगे, यात्रा कैसी रही, कोई परेशानी तो नहीं हुई, डॉक्टर ने क्या कहा, इत्यादि। इतने दिनों से उन्हें यही विश्वास था कि जानकी में जो कमी है डॉक्टर के इलाज से सब ठीक हो जाएगा और आज उनका यह विश्वास सच हो गया था। 

“डॉक्टर का प्रयास और ईश्वर की कृपा है। कमी कहाँ नही होती लेकिन देखो बहू अब ठीक है।” बाबूजी की बातों में खुशी झलक रही थी। प्रवाह में कहते चले गए “अब दो प्राणी की जिम्मेदारी है तुम पर। और गंभीर हो जाओ, इन लफंगों की संगति छोड़ दो।”

आज बाबूजी की बात पर करन ने कोई उत्तर नहीं दिया, न तुनक कर कुछ बोला न ही बड़बड़ाया। 

खाना खा कर जब वह कमरे में गया तब जानकी डॉक्टर के पर्चे को पढ़ रही थी। सौर लालटेन की हल्की मद्धिम रौशनी में उसके चमकते चेहरे को करन देखता रह गया। इतने दिनों में इस तरह का सौंदर्य कभी नहीं देखा था उसने, ये वही जानकी है जो शादी के बाद गहनों से सजी हुई भी इतनी सुंदर नहीं थी। वह चुपचाप पलंग के कोने पर बैठ कर उसे देखता रहा, अपलक। जानकी भी पढ़ने में व्यस्त सी दीखती रही फिर अचानक से उसकी ओर देखकर बालसुलभ चंचलता से पूछ बैठी “क्या देख रहे हैं?”

अचानक ही इस सहजता से वह अचकचा गया। सम्पूर्ण चेतना को झकझोरने वाले आघात ने पुरानी स्मृतियों का रूप ले लिया। पौरुष और उसकी विकृत मानसिक अवस्था का प्रदर्शन जानकी को जिस नारकीय परिस्थिति में ले गया था उसके लिए स्वयं को दोषी मान कर उसका हृदय ग्लानि से भर आया था। स्वयं को प्रायश्चित की अग्नि में जला कर शुद्ध करना चाहता था। जानकी अब भी बालसुलभ जिज्ञासा से अपने उत्तर की प्रतीक्षा कर रही थी। करन ने खिसक कर उसका हाथ पकड़ लिया, कोमलता और अपनेपन की नवीन अनुभूति ने उसके अंतर्मन को भावविभोर कर दिया, अश्रु धार बह निकली। जानकी उसके इस अवतार को निश्चल होकर देखती रही। 

तूफान शान्त हुआ उसके बाद करन शांत और दृढ़ स्वर में बोलता रहा  “दिमाग मे गोबर भर गया था… कभी समझ ही नहीं पाया कि…मरद होने का माने होता है पीपल का पेड़…जिसकी छाया में उसका पूरा परिवार निश्चिन्त रहता है…कितना भी आँधी-तूफ़ान आए वह अपनी जगह टिका रहता है…मरद कांटा होता है पर गुलाब की देखभाल के लिए…उसकी रक्षा के लिए…उसे चुभने के लिए नहीं…”

सुबह जब वह उठा तो नई चेतना से भरा हुआ था। बाहर बाबूजी अपने पुराने और घनिष्ठ मित्र श्याम चाचा से मन की बात कह रहे थे। बातों में चिंता भी थी कि अब लड़का सुधर जाय तो अच्छा है। अब भगवान ने सबकी सुन ली है, परिवार में खुशियाँ और उसके कंधों पर जिम्मेवारी आने वाली है।

उसे देख कर चाचा ने अभिनय करते हुए कहा “अब जिमवारी से नहीं भागेगा अपना करन…बहू तो ठीक हो गयी है…ये भी ठीक हो जाएगा।”

“बहू तो ठीक ही थी चाचा…डॉक्टर ने तो मेरा इलाज किया है इतने दिन…” करन का स्वर शांत और दृढ़ था। बाबूजी अचरज से उसे देखते रहे। उनकी पारखी दृष्टि ने देखा कि वह उद्दण्ड और लापरवाह लड़का आज कितनी दृढ़ता और जिम्मेदारी से बोल रहा है। मन ही मन दुगुनी प्रसन्नता से भर उठे, चिंता जाती रही। 

करन दिन चढ़े अपनी मंडली से मिलने गया। जगनाथ को उसने जब बताया कि उसमें पिता बनने के लिए कुछ कमी थी जिसका इलाज उसने जानकी के कहने पर करवाया, और यह भी कि जानकी ही सबकुछ अपने सर पर लेकर झेलती रही, कि उसने कभी यह प्रकट नहीं होने दिया कि कमी किसमे थी, कि जिस जिम्मेदारी को उसे निभाना था, जिस परिवार के लिए उसे सहारा बनना था वो नहीं बना बल्कि जानकी बनी, कि उसे लगता है पुरूष वो नहीं जानकी है; जगनाथ उसे फटी आँखों से देखता रहा। अब करन उसकी मंडली के अनुसार पुरुष नहीं रह गया था। 

समाप्त


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  1. Umda kahanj navneet ji, apne bheetar ki kamzoriyon ko samajhna, sweekarna aur un par vijay pana, sab bahut mushkil kary hain jo mukhya paatr ne bakhoobi kiye aur sahi mayne mein purush kahlaye, bahut bahut badhai!!

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