Devvrat : Sushil Kumar

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लाजवंती जब जेल पहुंची तो थानेदार उसे देख कर परेशान हो गया ..

“लाजवंती जी, आप फिर आ गयी।”

“एक बार और कोशिश कर के देख लीजिये न.. शायद वो इस बार मिलना चाहें। उन्हें बहुत कुछ ज़रुरी बताना है।”

“पांडे, कैदी ६७० को ले कर आओ ”

थानेदार ने लाजवंती का मन रखने के लिए हवलदार पांडे को अन्दर भेजा..

लाजवंती वहीँ कुर्सी पे बैठ के सोचने लगी कि क्या आज उस का पति देवव्रत उससे मिलेगा या हर बार की तरह आज भी उसे बिना मिले ही लौटना होगा। उस भयानक हादसे को आज पाँच साल होने को आए और उसका पति जेल की सलाखों के पीछे दिन-रात गुजार रहा था। भले ही लोगों ने उसे माफ ना किया हो लेकिन लाजवंती के दिल में अब अपने पति के लिए नरमी उठने लगी थी। बीते समय को याद किया तो लगा जैसे कल ही की बात है।

उसे आज भी याद है जब देवव्रत और लाजवंती अपने बच्चों के साथ गाँव से शहर आ गए थे। देवव्रत को एक साईकिल की दुकान में काम मिल गया था। अपनी लगन, मेहनत और ईमानदारी के दम पर कुछ ही समय में उसने ना केवल मरम्मत का काम सीख लिया, बल्कि नई-पुरानी साईकिल ग्राहकों को बेचने में भी माहिर हो गया था| सेठ ने उसके काम से खुश होकर पगार में इजाफा किया तो उसकी खुशी का ठिकाना ना रहा। शहर के एक अच्छे स्कूल में उसने बच्चों का दाखिला करा दिया : रमेश सातवीं में और महेश चौथी में। लाजो भी नए माहौल और अपने नए घर में रमने लग गई थी। देवव्रत के आने के बाद से दुकान की आमदनी भी बेहतर हो गई थी। इस बात से खुश होकर एक दिन सेठ ने देवव्रत को उसी शहर में खाली पड़ी दूसरी दुकान में भी साइकिल का काम शुरू करने और उसकी पूरी जिम्मेदारी उठाने को कह दिया| उसकी आँखों से खुशी के आँसू छलक आए थे। उसने अपनी मेहनत से इस दुकान की बिक्री को चंद महीनों ही में बढ़ा दिया था| साथ ही बढ़ते हुए काम की थकान दूर करने के लिए शराब का सहारा लेना भी शुरू कर दिया था| एक दिन सेठजी को दिल का दौरा ऐसा पड़ा कि बिस्तर ही पकड़ लिया। सेठ ने दूसरी वाली दुकान देवव्रत को बेचने का प्रस्ताव दे दिया। देवव्रत हालाँकि इसके लिए तैयार नहीं था लेकिन उसने जैसे-तैसे पैसों का इंतज़ाम कर लिया। अब दुकान उसकी हो गई थी और उसका नया नाम था “रमेश साईकिल मार्ट”।

रमेश का कॉलेज अब पूरा हो गया था और उसने दुकान के काम में अपने पिता का हाथ बँटाना शुरू कर दिया था। देवव्रत का घर लौटकर खाने से पहले शराब पीना रोज का नियम हो गया था। जल्दी ही महेश के भविष्य के बारे में सोचते हुए उसने थोक कपड़े की एक और दुकान शुरु कर दी और नाम रखा “महेश गारमेंट्स”। रमेश ने नई दुकान पर बैठना शुरू कर दिया था। शुरू में कुछ महीने काम जमने में गए लेकिन उसके बाद काम बढ़िया चल निकला। तीन साल में यह दुकान भी शहर की नामी दुकानों में गिनी जाने लगी। महेश का कॉलेज पूरा होते ही उसने भी कपड़े की दुकान पर बैठना शुरू कर दिया। देवव्रत दोनों दुकानों की प्रगति से खुश था और रोज घर लौटकर शराब हक़ से पीता था। लाजो ने घर के काम में मदद के लिए एक नौकर भी रख लिया था…नाम था छोटू| देवव्रत ने जब लाजो से रमेश की शादी की बात तो वो बोली, “आपने मेरे मुँह की बात छीन ली। उसके लिए लड़की मैं देखती हूँ।” दो-तीन रिश्तों को देखने के बाद दूसरे शहर का एक रिश्ता सबको समझ में आया। लड़की का नाम था ‘रति’ और वो बहुत सुंदर थी। रमेश ने भी रति को पसंद कर लिया था। फिर क्या था…सगाई का छोटा सा कार्यक्रम हुआ और एक महीने के अंदर शानदार ढंग से शादी हो गई जिसके चर्चे शहर में कई दिनों तक चलते रहे।

शादी के तुरंत बाद रमेश-रति घूमने चले गए। लौटने के बाद रमेश अपनी दुकान में फिर से रम गया| रोज घर लौटने के बाद देवव्रत के पैग भी अब बढ़ गये थे। रमेश की शादी को दो महीने हो गए थे। एक दिन रमेश को काम के सिलसिले में दूसरे शहर जाना पड़ा जहाँ से उसे दो दिन बाद लौटना था। उसी दिन लाजो को अपने एक रिश्तेदार की बेटी की शादी में दूसरे शहर जाना था। लेकिन तबियत कुछ ठीक नहीं थी तो अकेले जाना मुश्किल था। देवव्रत ने महेश से कहा, “तुम चले जाओ माँ के साथ।” “लेकिन पिताजी भैया भी नहीं हैं तो दुकान कौन संभालेगा?” “मैं संभाल लूँगा।” देवव्रत ने कहा|

इस सांत्वना पर महेश माँ के साथ शादी में चला गया। उस दिन छोटू की तबियत ठीक ना होने की वजह से वो काम पर नहीं आया था। रात को दोनों दुकानें बंद करा कर देवव्रत घर आया और आदत के मुताबिक शराब पीने बैठ गया। फ़र्ज के नाते रति ससुर के पास जाकर बोली, “पिताजी आपको कुछ चाहिए तो बता दीजिए। खाना भी तैयार है, जब कहेंगे परोस दूँगी।” देवव्रत ने रति की तरफ देखा तो ठगा सा रह गया। गुलाबी साड़ी में उसका गोरा, गठीला बदन बेहद लुभावना लग रहा था। “बेटा मुझे कुछ नहीं चाहिए। तुम खाना खाकर सो जाओ। मेरा खाना रख देना, मैं बाद में खा लूँगा।” देवव्रत ने रति को ऊपर से नीचे तक घूरते हुए कहा। “ठीक है पिताजी, जैसा आप कहें।” कह कर रति खाना खाने चली गई और उसके बाद अपने कमरे में जो पहली मंज़िल पर था।

उस रात रोज के मुकाबले देवव्रत ने ज्यादा शराब पी ली थी। खाने की मेज पर अपने लिए रखा हुआ खाना भी उसने ठीक से नहीं खाया। जैसे-तैसे वो खाने की मेज से उठा और पहली मंज़िल की सीढ़ी चढ़ने लगा जबकि उसका कमरा नीचे ही था। बहू के कमरे के सामन पहुँच कर उसने दरवाजा खटखटाया। रति नाईट गाऊन में थी लेकिन अभी सोई नहीं थी। आवाज़ सुन कर जल्दी से दुपट्टा लिया और दरवाजा घबरा कर खोलते हुए बोली, “पिताजी आप! कुछ चाहिए था तो आवाज़ दे देते।” “बेटा थोड़ा सिर दर्द हो रहा है। अगर बाम मिल जाए तो लगाकर सो जाऊँ।” रति को एक बार फिर निहारते हुए उसने कहा। “जी पिता जी।” रति यह बोल कर अंदर की तरफ गई और देवव्रत ने कमरे के अंदर आकर कुंडी लगा दी। रति ने आवाज सुनी तो बाम हाथ में लेकर वो पलटी और देखा कि देवव्रत अपनी शर्ट उतार रहा था। “ये क्या कर रहे हैं पिताजी? रति के चेहरे पर पसीना उभर आया था। “बेटा आज गर्मी बहुत है और नीचे कोई भी नहीं है। मैं यहीं सो जाता हूँ।” “लेकिन यह ठीक नहीं है पिताजी… मैं आपकी बहू हूँ… ये आपको शोभा नहीं देता।” लेकिन देवव्रत रति को गाऊन में देखने के बाद बदहवास हो गया था। उसके कदम रति की तरफ बढ़ने लगे। “आप यहाँ से जाइए पिताजी, आप ये ठीक नहीं कर रहे।” रति के स्वर में अब याचना थी। लेकिन देवव्रत के कदम जिस दिशा में बढ़ चले थे, वहाँ से उसका लौटना नामुमकिन था। रति की तमाम विनतियों को अनसुना करते हुए उसने एक ऐसा रिश्ता स्थापित कर दिया जो ससुर-बहु के पावन रिश्ते पर गहरा कलंक था।

मनमानी करने के बाद देवव्रत  नीचे आकर अपने कमरे में सो गया। रति का सब कुछ उसके अपने ही घर में लुट गया था। उसकी पूरी रात आँसूओं के संग ये सोचते हुए बीती की वो अब रमेश को क्या मुँह दिखाएगी। लेकिन वो जानती थी कि वो बेकसूर है और रमेश उसकी बात सुनेगा। अगली सुबह जब रमेश घर लौटा तो तैयार होकर दुकान के लिए निकल पड़ा। रति ने बहुत चाहा कि वो रमेश से बात करे लेकिन ना कर सकी। अब वो रात होने की राह देखने लगी। रात का खाना निपट जाने के बाद सब लोग अपने-अपने कमरों में चले गए। रमेश जब कमरे में पहुँचा तो रति उस से चिपट कर फूट-फूट कर रोने लगी। रमेश ने जब कारण पूछा तो रति का जवाब सुन कर भड़क उठा। ” पिताजी पर ऐसा बेहूदा इल्ज़ाम लगाते हुए तुम्हे शर्म आनी चाहिए।” “मेरा यक़ीन करो रमेश, मैं झूठ क्यों बोलूँगी? लेकिन रमेश ने उसकी एक ना सुनी और दूसरी तरफ मुँह करके सो गया। रति की वो रात भी रोते हुए गुजरी। अगले दिन सुबह रमेश ने यह बात अपनी माँ को बताई तो वो हैरान रह गई। उसने रमेश को समझाते हुए कहा कि रात में दुकान से लौटने पर वो देवव्रत से बात करेगी|

रात में देवव्रत घर लौट कर जब शराब पीने बैठा तो लाजो पास आकर बोली, “आपसे एक बात पूछनी है।” “हाँ बोलो…क्या बात है”? लाजो की बात खत्म होने पर देवव्रत ने रमेश को बुलवाया और बोला “बहू ऐसा क्यों कह रही है, पता नहीं। मैं उस रात ज्यादा पी गया था और ठीक से खाना भी नहीं खाया था| कब सो गया, पता ही नहीं चला|” देवव्रत ने गिलास खाली करते हुए कहा। “लेकिन वो ऐसा क्यों करेगी पिताजी? आखिर पूरे घर की इज़्ज़त का सवाल है|” रमेश ने हैरान होते हुए कहा। “बेटा उसके मन में क्या है, वही जाने| लेकिन यह बात अगर घर से बाहर गई तो अपनी साख मिट्टी में मिल जाएगी|” यह कहते हुए देवव्रत उठ कर वहां से चला गया|

अगले दिन जब रमेश दुकान पर बैठा था तो कुछ परेशान दिख रहा था। रति ने जिस रात का ज़िक्र किया था, उस रात घर में रति और पिताजी के सिवा कोई नहीं था। वो रति की बात पर यकीन करे तो पिता दोषी हुए। पिता के दिए हुए संस्कार और उनकी परवरिश को भूल कर वो कैसे मान ले कि उनसे गलती हुई है। महेश जब कुछ काम से दुकान पहुँचा तो बोला, “भैया आप परेशान दिख रहे हो…सब ठीक तो है।” “सब ठीक है मेरे भाई…बस यही सोच रहा था कि दुकान की बिक्री को और कैसे बढ़ाया जाए?” रमेश ने अपने अंदर चल रहे मंथन को शांत करते हुए जवाब दिया। महेश ने भाई का जवाब सुन तो लिया लेकिन पिछले कुछ दिनों से वो महसूस कर रहा था कि कोई बात तो जरूर है जिससे घर का माहौल बदला हुआ है। नहीं समझ पा रहा था तो बस कि हुआ क्या है!

उस रात जब देवव्रत घर पहुँचा तो शराब लेकर नहीं बैठा। खाना खाकर अपने कमरे में चला गया। लाजो इस बात से हैरान थी। काम निपटा कर जब कमरे में पहुँची तो देखा देवव्रत कुर्सी पर बैठा कुछ सोच रहा है। लाजो ने नज़दीक जाकर पूछा, “क्या बात है?…आज पीने भी नहीं बैठे। “मैंने एक झूठ बोला है तुमसे लाजो। उस रात मुझसे शराब के नशे में ऐसा गुनाह हो गया जिसे मैं भुला नहीं पा रहा हूँ।” देवव्रत के मुँह से यह सुनकर वो सकते में आ गई! अंदर से उसका दिल रो रहा था क्योंकि देवव्रत के इस कृत्य से उसका भरोसा व अभिमान चूर-चूर हो गया था। एक पल में सब कुछ जैसे खत्म हो गया हो। लाजो उस कमरे से चुपचाप बाहर चली गई।

रमेश जब खाना खाकर कमरे में पहुँचा तो देखा रति लेटी हुई थी। “तुमने खाना खाया?” उसने पूछा। रति ने कोई ज़वाब नहीं दिया। “मैं तुमसे कुछ पूछ रहा हूँ रति, ज़वाब दो।” “मेरे साथ गलत हुआ है और मुझे इंसाफ चाहिए।” “मैं समझता हूँ तुम्हारी मनोदशा…” “नहीं, तुम नहीं समझते।” रति ने रमेश की बात बीच में काटते हुए कहा। “मुझे समझते होते तो मेरे साथ होते, मुझे अकेला ना पड़ने देते। मैं अपना परिवार, अपना घर छोड़ कर आई हूँ…किसके भरोसे, सिर्फ तुम्हारे।” यह कहते हुए रति की आँखों से आँसु बह निकले थे। “मुझे समझने की कोशिश करो रति। मैं मान भी लूँ कि तुम्हारे साथ गलत हुआ है, लेकिन पिताजी हैं वो मेरे। मुझे जन्म दिया, अच्छी परवरिश दी…आज जो भी हूँ, उनकी बदौलत हूँ। उनके खिलाफ गया तो यह जिल्लत वो बर्दाश्त नहीं कर सकेंगे।” यह सुनकर रति हताश हो गई और मुँह पलटकर रोती रही।

इस हादसे को बीते लगभग एक महीना हो गया था। एक दिन सुबह सोकर उठने के बाद रति को उल्टी हुई। लाजो को लगा कि खुशखबरी भी हो सकती है। डॉक्टर के मुआएने के बाद परिवार के लिए सच में अच्छी खबर थी…रति माँ बनने वाली थी। घर के सभी लोग बहुत खुश थे…बस रति खुश नहीं थी।

लगभग एक हफ्ते बाद शहर में ही एक कार्यक्रम में सम्मिलित होने के लिए पूरे परिवार को निमंत्रण था। शाम को दुकान से लौट कर जब जाने की तैयारी हो रही थी, रति ने खराब तबियत के चलते जाने से मना कर दिया। सबको लगा रति के लिए आराम करना ही बेहतर होगा। सब लोगों के जाने के बाद रति भी अपने कमरे में चली गई और छोटू भी खाना खाकर सो गया। कार्यक्रम से लौटने में सबको बहुत देर हो गई थी। घर पहुँच कर जब तीन-चार बार घंटी बजाई गई, तब जाकर छोटू ने दरवाज़ा खोला। सब लोग अपने-अपने कमरों की तरफ बढ़ लिए थे। रमेश ऊपर पहुँचा और कमरे के दरवाजे को धीरे से धकेला ताकि शोर ना हो। कमरे में अंधेरा था तो रमेश ने रोशनी करने के लिए स्विच दबाया। जैसे ही कमरे में अंदर की तरफ घूमा, नज़ारा देख कर उसके मुँह से चीख निकल गई, “नहीं…..”। उसकी आवाज़ सुनकर सब लोग उसके कमरे की तरफ भागे। सबसे आगे महेश, फिर देवव्रत, लाजो और छोटू। कमरे में पहुँच कर सबकी आँखें फटी रह गई थीं।

रति का शरीर छत के पंखे से लगे फंदे पर झूल रहा था। उसके प्राण पखेरू उड़ चुके थे। “ये क्या कर दिया तुमने रति।” कह कर रमेश फूट-फूट कर रोने लगा…लाजो फर्श पर गिरने को थी कि महेश ने संभाला। देवव्रत रति के लटकते शरीर को एकटक देख रहा था जैसे वो कुछ कह रही हो। माँ को एक कुर्सी पर बिठाने के बाद महेश की नज़र किनारे की मेज पर रखे लिफाफे पर पड़ी। उसने लिफाफा उठा कर रमेश को दिया जो अभी भी सदमे में था और रोए जा रहा था। रमेश ने लिफाफा हाथ में लिया तो देखा उस पर लिखा था, “रमेश, यह पत्र घर के सभी सदस्यों के सामने तुम ही पढ़ना।” रमेश ने छोटू को इशारे से बाहर जाने को कहा।

उसके बाद रमेश ने पत्र निकाला और बहते आँसुओं पर थोड़ा अंकुश लगाते हुए पढ़ना शुरू किया…”मैं जा रही हूँ रमेश तुम्हारी ज़िंदगी से हमेशा के लिए। मैं माँ बनने वाली हूँ और मुझे खुशी नहीं डर महसूस हो रहा है। मैं नहीं चाहती की यदि लड़की हो तो उस पर इसी तरह का कोई कहर टूटे…अगर लड़का हो तो तुम्हारे जैसा ना हो जो स्त्री के सम्मान और स्वाभिमान की रक्षा हेतू असहाय हो। उस रात पिताजी ने मेरी लाचारी का फायदा उठा कर अपने पौरूष को मुझ पर थोप दिया। तुम मेरे सब कुछ होकर भी मेरे लिए अपने पिताजी के खिलाफ ना जा पाए। यह तुम्हारा पौरूष था। पिताजी ने गलत किया था फिर भी माँ उनके साथ खड़ी रहीं…मैं तो कहीं से भी गलत नहीं थी, फिर भी तुम मेरा साथ ना दे पाए। मैं जीते जी अपना इंसाफ ना पा सकी…शायद मेरी मौत मुझे इंसाफ दिला सके।”

रति का पत्र समाप्त हो गया था। रति ने पत्र नहीं लिखा था, झकझोर देने वाला प्रहार किया था इस खोखले पौरूष प्रधान समाज पर जहाँ जन्म देने वाली नारी को सिर्फ भोगने की एक वस्तु मात्र समझा जाता है। क्या नारी के सौंदर्य को निहारना, उसकी सराहना के लिए होना चाहिए या वासना पूर्ति के लिए? क्या पौरूष यही है कि स्वयं की बेटी को देखने की नज़र वात्सल्य भरी हो और दूसरे की बेटी के लिए हवस भरी।

रमेश ने अपने उद्गारों को समेटते हुए आँसू पोछे और पिताजी के सामने जाकर हाथ जोड़ते हुए बोला, “मैं रति के जीते जी तो नहीं कह सका लेकिन आज मैं आपको रति का दोषी करार देता हूँ।” देवव्रत रमेश के पैरों में गिर पड़ा और बोला “मुझसे भूल हो गई बेटा…मैं बुरा आदमी नहीं हूँ।” “मैं जानता हूँ आपसे एक भूल हुई है लेकिन उसकी कीमत रति को अपनी जान देकर चुकानी पड़ी। आपकी ये एक भूल मुझे आजीवन पीड़ा देती रहेगी।”

रमेश के शब्दों से मानो देवव्रत धरती में मीलों धँस गया था। उसने अपने आँसू पोंछते हुए रमेश से कहा, “बेटा मैंने जो किया है, मैं जानता हूँ वो माफी के लायक नहीं है। फिर भी हो सके तो मुझे माफ कर देना। मैं अपने किए का प्रायश्चित करना चाहता हूँ। तुम पुलिस को बुलाओ ताकि मैं रति के साथ हुई जबरदस्ती और उसकी मौत के लिए खुद को उनके हवाले कर सकूँ।” “ये आप क्या कर रहे हैं।” यह कहकर लाजो बगल वाले कमरे में जाकर उसमें बने मंदिर के सामने गिर कर रोने लगी। घर में चल रहे शोर-शराबे के चलते पड़ोस के घर से किसी ने पुलिस को फोन कर दिया था। कुछ ही देर में पुलिस उनके घर आ गई थी। रति के निर्जीव शरीर को नीचे उतार कर पोस्ट मार्टम के लिए भेज दिया गया था। घर वालों से कुछ पूछ-ताछ और देवव्रत के बयान के बाद पुलिस उसे गिरफ्तार कर अपने साथ ले गई। रति के पत्र और देवव्रत के बयान के आधार पर उसे दोषी पाया गया और आजीवान कारावास की सजा सुनाई गई।  लाजो से मिले बिना ही वो जेल चला गया था।

हवलदार की आवाज़ से लाजो की तंद्रा टूटी। 

“उसने मना कर दिया है .. ” हवलदार ने फिर कहा .. 

लाजवंती ने उसे मायूस नज़रों से देखा मगर हवलदार सर झुकाए खड़ा रहा ..

लाजवंती चुप चाप अपना थैला उठा के बाहर चली गई .. वो जानती थी देवव्रत को .. उसने बहुत बड़ा पाप किया था मगर वो पापी नहीं था .. भूल सभी से होती है लेकिन  पश्चाताप को भी एक प्रण की तरह निभाना … ये इस दुनिया में कुछ ही लोग कर पाते हैं .. अब शायद यही पश्चाताप देवव्रत को अपराध के अँधेरे से स्वयं को क्षमा करने की रौशनी की ओर ले जाएगा .. 

समाप्त


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