In conversation with : Shishir Somwanshi

वानिकी वैज्ञानिक और प्रेम पर कविताएँ, यही परिचय है शिशिर सोमवंशी का। सरल-सहज-सरस लेखनी के धनी, शिशिर, जिनकी हर कविता हृदय को स्पर्श करती है। अति व्यस्तता के बाद भी कोई लेखन में अग्रसर रहे तो यह उसके लेखन में अधिकतम रुचि को दर्शाता है और यही मोह उनके लेखन में प्रत्यक्ष झलकता भी है। अपनी पहली पुस्तक ‘मोहभंग के बाद’, जिसे पाठकों ने बहुत सराहा था,  शिशिर अब अपना दूसरा काव्यसंग्रह ‘अपने अपने मोक्ष’ लेकर एक बार फिर आए हैं| इसी अवसर पर उनसे हुई बातचीत के कुछ अंश यहाँ प्रस्तुत हैं। 

शिशिर से उनकी कविताओं के संसार के बारे में जानने के लिए, उनसे संवाद कर रहीं हैं ऋतु दीक्षित 

 


ऋतु : सबसे पहले तो अपनी नयी किताब के बारे में कुछ बताएँ? 

शिशिर : ‘मोहभंग के बाद’ यदि मेरी काव्य यात्रा का आरंभ था तो ‘अपने अपने मोक्ष’ उस का वह  सोपान जहां पहुँच कर कविता सांस लेती है, सुस्ताती है और जीवन का मधुवृष्टि में भीग कर आह्लादित होती है। इस संग्रह में कभी न समाप्त होने वाली इसी जिजीविषा की कवितायें हैं।

मेरी दृष्टि में मृत्यु के पश्चात मोक्ष की संकल्पना बहुधा जीवन में नैराश्य का संचार करती है। जीवन के दुरूह यथार्थ के मध्य स्वयं को प्रिय स्वप्नों की सृष्टि एवं उनका यत्न से पोषण भी जीवंत मोक्ष से किसी अर्थ में कम नहीं होता। हम में से हर किसी के ऐसे अनेकानेक छोटे बड़े मोक्ष हैं जो हमारे अंतस में आशाओं की सरिता को सूखने नहीं देते। ये मोक्ष हमें मरने नहीं देते।

प्रथम दृष्टया आभास होता है ये कवितायें वैविध्य से परिपूर्ण हैं और इन का एक संकलन में एक साथ होना मात्र संयोग है किन्तु वास्तव में इन सभी में विद्यमान मूल तत्व एक ही है- किसी न किसी जीवन की संजीवनी, किसी न किसी का व्यतिगत मोक्ष।


ऋतु : प्रेम और मोक्ष में क्या समानता मानते हैं?

शिशिर : आप ही कहें प्रेम से महान और गहन भाव कोई संभव है? प्रेम से परे न जीवन है, न मृत्यु है और न कोई मोक्ष । प्रेम के इंद्र्धनुष में मित्रता, ममत्व, साहचर्य और स्नेह के रंग सहज ही आ जाते हैं और जीवन को एक गरिमा और एक अर्थ दे जाते हैं। यह मोक्ष नहीं तो और क्या है? मेरी दृष्टि में प्रेम और मोक्ष भिन्न नहीं वरन एक ही हैं।


ऋतु : इस किताब के पीछे कोई कहानी? इस शीर्षक का क्या राज है? 

शिशिर : किताब के पीछे कोई कहानी नहीं है किन्तु इसमें सम्मिलित हर कविता में कोई न कोई कहानी अवश्य है जो कि नितांत स्वाभाविक है। मूलत: इन कविताओं की रचना ने मुझे सुख दिया है और नैराश्य से उबार कर जीवन को वृहद परिप्रेक्ष्य में जीने को प्रेरित किया है।

जहां तक शीर्षक का प्रश्न है वे तो कविताओं की धारा में से ही निकल कर सामने आ जाते हैं और अपने लगने लगते हैं। यह शीर्षक तभी तय हो गया था जब इस संग्रह की प्रथम कृति रची गयी  थी। राज़ यही है कि मेरी कविताओं की ही तरह इस संकलन का शीर्षक भी प्रेरित है, इसीलिए विशेष प्रिय है।


ऋतु : आज के युग में, जब साहित्य पर अंग्रेज़ी भाषा का एक तरह से क़ब्ज़ा है,  हिंदी में लिखना कितनी बड़ी चुनौती  है?

शिशिर : वर्तमान समय में हिन्दी में लिखने से अधिक बड़ी चुनौती उसके पाठक खोजना हो गयी है। हिन्दी लेखन तक स्तरीय माध्यमों और प्रकाशन समूहों की पहुँच नहीं हो पा रही है। लोकप्रियता में भी उतरोत्तर ह्रास हुआ है। इसके लिए स्वयं लेखक, आपसी गुटबंदी और साहित्यिक राजनीति  उत्तरदायी है। हिन्दी लेखक स्वयं लिखते हैं, अपने समूहों मे पढ़ते पढ़ाते हैं, परस्पर प्रशंसा और छद्म पुरस्कार बाँट कर संतुष्ट रहते हैं उनकी पाठकों तक पहुँच ही नहीं हो पाती। मुझे तो लगने लगा है हिन्दी में अब पाठकों से अधिक लेखक हो गए हैं। जबकि सारा लेखन पाठक के लिए होना था। कैसे भी कर के पुनः पाठकों तक पहुँचना सबसे बड़ा काम होगा।   


ऋतु : हिंदी साहित्य को आपके अनुसार बढ़ावा देने में इंटर्नेट और सोशल मीडिया का कितना योगदान है?

शिशिर : वास्तव में भारतीय संगीत की ही तरह भारतीय भाषाओं के लेखन को इंटरनेट और सोशल मीडिया ने संजीवनी प्रदान की है। विगत वर्षों में हिन्दी फॉन्ट की सेल फोन और कम्प्युटर पर व्यापक उपलब्धता ने क्रांतिकारी परिवर्तन सुनिश्चित किया है। हिन्दी लेखकों को इस संभावना को मुक्तहस्त लपक लेना होगा। प्रथम तो इन माध्यमों की पहुँच सहज रूप से विस्तृत है और दूसरे इन पर सूचना का तीव्र प्रचार होता है। हिन्दी में यदि प्रकाशन कठिन हो गया है तो हमें वैकल्पिक तरीके तलाश करने होंगे। मेरा विचार है कि ई पत्रिकाएँ और किताबें अधिक पाठकों तक पहुँच सकने में सक्षम होंगी।


ऋतु : अपने लिखने की प्रक्रिया के बारे में कुछ बताइए- काग़ज़-क़लम, कम्प्यूटर, नोट्बुक – कैसे लिखते  हैं  आप?

शिशिर : पूर्व में मेरे लिखने की प्रक्रिया बड़ी  विचित्र और अव्यवस्थित सी रही। मैं कहीं भी किसी स्कूल, कॉलेज और कार्यालय में कागज़ के टुकड़ों, लिफ़ाफ़े, यात्रा में ट्रेन टिकिट के प्रिंट आउट आदि पर कविता लिख कर अक्सर भूल भी जाता था। समय के साथ संग्रहीत करना आरंभ किया। अब काफ़ी व्यवस्थित हुआ हूँ। कविता के भाव किसी भी नोट पैड पर लिख देता हूँ किन्तु विगत कई वर्षों में कम्प्युटर पर सीधे टाइप करता हूँ। सेल फोन पर हमेशा 100 कवितायें रहती हैं।


ऋतु : आपके विचार में अच्छी कविताओं की क्या ख़ासियत होती है और उनमें क्या समानता है?

शिशिर : अच्छी कविता की सबसे बड़ी विशेषता उसमें नूतन और मौलिक भाव का होना है। सभी अच्छी कविताओं कम से कम एक नवीन तत्व अवश्य होता है। पाठक के लिए लेखक के साहित्यिक ज्ञान, विद्वता  और भाषा की विलक्षण शुद्धता के स्थान पर भावों की सुग्राह्यता अधिक महत्व रखती है। अच्छी कविता पाठक की इसी अपेक्षा को पूर्ण करती है।


ऋतु : जो कविताएँ इतना प्रभाव नहीं डाल पातीं, उनमें क्या समानता है?

शिशिर : वह शब्दों का आडंबर होती हैं। कृत्रिम होती हैं और बिना प्रेरणा के लिखी जाती हैं। ऐसी कविताओं    में पाठक को कुछ नया नहीं प्राप्त होता वरन उन्हीं सदियों से चले आ रहे विषय,उपमाएँ, उपमान       और व्यंजनाएं दिखती हैं। कवि का दिल टूटा है तो रोये जा रहा है, किसी ने माँ का आंचल थाम लिया, किसी ने गरीबी, मुफ़लिसी और मज़बूरी को अपना लिया, कोई देश का तोता बन बैठा और     शृंगार रस में पगा देह की गर्मी से ऊपर नहीं उठ पाता,कुछ लोग हैं उन्हें हर विशेष दिवस और   अवसर  पर लिखना ही होता है। ऐसी कवितायें रोमांच नहीं पैदा करतीं।


ऋतु : आप के विचार से सवाल और जवाब में क्या ज़्यादा महत्वपूर्ण है? लेखक के लिए ज़्यादा क्या ज़रूरी है – सवाल खड़े करना या उनके जवाब?

शिशिर : पाठक,आलोचक और लेखक सभी के लिए दोनों बराबर महत्व रखते हैं। हाँ लेखक की ज़िम्मेदारी अन्य दोनों से गुरुतर हो जाती है क्यूंकि उसे कथा-कविताओं में उचित सवाल खड़े करने के साथ साथ उनके उत्तरों के लिए भी तैयार रहना होता है। लेखक किसी मुद्दे पर तटस्थ नहीं  बैठा रह सकता। फिर भी दुखद यह है कुछ लोग रचनाओं पर व्यर्थ के प्रश्न उठाते हैं।


ऋतु : लेखक के तौर पर आपको सबसे ज़्यादा किससे डर लगता है?

शिशिर : अपने आप से। सतत रूप से भय बना रहता है कि अपने स्तर को बना कर रखने में कोई चूक न हो जाए। मेरे विचार और भाव कहीं खो न जाएँ। कभी कभी स्वप्न आते हैं कि मैं लिख नहीं पा रहा हूँ।


ऋतु : आगामी सृजन के रूप में पाठकों को क्या मिलने वाला है?

शिशिर : मेरे हृदय के बहुत समीप कविताओं का संग्रह “आत्मा का अर्धांश” पहले आयेगा। उस के बाद राजस्थान और हिमालय कि पृष्ठभूमि पर मेरा महत्वाकांक्षी उपन्यास जिसका शीर्षक तय नहीं हुआ है।


ऋतु : नवलेखकों-कवियों के लिए कोई संदेश? 

शिशिर : मैंने कई बड़े लेखकों को सुना है खूब लिखो और लिखते समय सोचो नहीं। मैं इसके उलट सलाह दूँगा ख़ूब सोच कर लिखो, यह भी सोचो कि पहले ऐसा लिखा तो नहीं गया है। रचना छोटी हो या बड़ी पर्याप्त समय दे कर लिखो, लिख कर स्वयं पढ़ो और जो सर्वश्रेष्ठ हो वही दूसरों को दो। कवियों के लिए विशेष है कि कविता लेखन को सीमित समय और तुरत फुरत कर ली जाने वाली गतिविधि समझने कि मानसिकता से बचें।  


 

2 Comments Add yours

  1. archanaaggarwal4 says:

    बहुत खूबसूरत , प्रश्न भी और शिशिर जी के उत्तर भी , बहुत कुछ नया सीखने को मिला

  2. बहुत सुंदर 👍👍👍

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