Best Of Swalekh : Papa

स्वलेख : जून 18, 2017
मार्गदर्शक : अर्चना अग्रवाल
विषय : पापा 
चयनित रचनाएं
द्वारा : उज्जवल, योगेश, नितीश, डॉ. रेणु, अनुराधा 
{मैं, अर्चना अग्रवाल, इस स्वलेख की संचालिका होने के नाते आप सभी को बधाई देना चाहती हूँ कि रचनात्मक  स्तर उत्तरोत्तर  प्रगतिशील है  परंतु इसके साथ ही कुछ बिन्दुओं पर  विशेष ध्यान देना आवश्यक है। स्वलेख में आप सभी विषय को केन्द्र बिन्दु रखें तथा केवल भावनात्मक चित्रण को नहीं साथ ही वर्तनी और मात्राओं की शुद्धि का भी  होना परम आवश्यक है । हम नवोदित लेखकों को विशेष स्वागत करते हैं, ये कोंपलें हैं जो भविष्य में प्रसून बन खिलेंगी । आप सभी  की रचनाएँ  अच्छी हैं अंततोगत्वा कुछ सर्वश्रेष्ठ  चयनित की  गईं हैं । भविष्य में और अधिक  साहित्य सृजन होगा ऐसी हम सभी की आशा है। }

Ujjwal Tiwari @uzzwal _Tiwari75 

पिता कभी स्मृति नहीं बनते 
क्यो वह सदैव जीवंत रहते है..
अपनी नातिन की मुस्कान के किनारों पर/
अपनी बेटी के सौ दफा टूट कर,फिर खड़े होने के साहस के उजालों के पीछे..
अपने बेटे के बटोरे हुए विश्वास के साथ…
वो हमेशा होते हैं..पिता कभी नहीं मरते..
वे सृष्टि के आरंभ से अंत तक का सफर करते है
अपनी अर्धांगनी की कमनीय आँखों से,
उसकी झुर्रीदार हथेलियों को थामे
वे हाथ छूट भी जाये तो भी वे दिवंगत नहीं बनते !
वो माँ की सुबह की चाय की प्याली थामे होते हैं
वो उनके दोस्तों के किस्सों मे रहते हैं
वो दूर बैठ कर बच्चों को खेलते देखते हैं..
वो पौत्र-पौत्रियों के लिये आशीर्वाद की तरह साथ रहते है
पिता कभी विगत नहीं होते..
पिता बस पिता होते हैं और हममें ज़िंदा रहते है !!

Nitish @2012nitish

वो रेत हैं, संगमरमर सी अदाकारी करे हैं..
मोहब्बत वो मुझसे कितनी सारी करे हैं..!

खुद भी टूटे, शाख़ से कोई फूल गर गिरे..
वो ज़मीनी मिट्टी, जो बंजर को फूलवारी करे हैं..!

मैं सोचता हूँ किसी बात में तो होगा खुद का ज़िक्र…
बस मेरी ही बातें मगर, वो बारी-बारी करे हैं..!

लड़खड़ाती उम्मीदों को हौंसले की बैसाखी देकर..
वो हर पल मेरी जीत की तैय्यारी करे हैं..!

“हानिकारक बापू” की संज्ञा सुन भी मुस्काए..
सिर पर रखकर हाथ, वो दूर हर बीमारी करे हैं..!

हँसने की बात कहते हैं, वो आँसू पोंछकर…
कितनी आसानी से देखो, वो फनकारी करे हैं..!

हर रोज़ हो कोशिश “नितिश” , कल से बेहतर होने की..
मुस्कुरा कर सीख वो, कितनी प्यारी करे हैं..!


Yogesh Soni @yogyee89

मैं हूँ कुछ आप के जैसा , एक अडिग पर्वत सा ,
हो जितनी भी वैचारिक भिन्नता , रहता था सम्मान सदा |
आना चाहा पास , पर रहता था डर का एहसास ,
आपसे प्रशंसा के लिए मन में थी अजब सी प्यास |
कठोर अनुशासन से मुझे वज्र सा बनाया ,
मोह – माया अपना – पराया सबका भान कराया |
मैं बनना चाहता था आपसा , 
पर आपने मुझे “मैं ” बनाया |
आपने अपनी आँखों से मुझे दुनिया दिखाई , 
संघर्ष और त्याग की परिभाषा बताई |
जब जब दुनिया ने तोडा मुझे ,
मुझे जोड़ने में आपने पूरी ताक़त लगायी |
खुश होता था मैं जब – जब ,
मुझसे ज्यादा वह ख़ुशी आपने मनाई |
अब नहीं आप पास मेरे , पर मुझमे आपकी परछाई है 
इस परछाई ने ही मुझे , सदा जीवन में सही राह दिखायी है 


Dr.Renu Mishra @RenMishra 

#चंपा का पेड़
बहुत दिनों बाद इस बार पिता के घर मेरा आना हुआ था. शाम का समय था, बरामदे में बैठे हम सभी शाम की चाय के साथ बातचीत में मशगूल थे. तभी एक चंपा की कली चटकी और उसकी मधुर सुगंध से मन तरंगित हो उठा. आह कितनी अच्छी खुशबू है, मुँह से अनायास ही निकल गया. मेरे डैडी जो मेरे साथ ही बैठे थे बोले, ये खुशबू तुम्हें ही आई है. वो पेड़ बहुत खुश है तुम्हें देख कर और वो कली भी तुम्हारे लिए ही चटकी थी, जाओ उस पेड़ को धन्यवाद दे आओ. हाँ, मेरे पिता ने ही मुझे प्रकृति से प्रेम करना सिखाया. उससे समीप्ता सिखाई और इसी वजह से मुझमें बागवानी का शौक पैदा हुआ. प्रकृति के साथ मेरा तारतम्य बैठा. यही कारण है कि आज मैं खुद को संवेदनशील और सजीव महसूस कर पाती हूँ. वह पेड़ हमारे लॉन में अन्दर ही था, और जब मैं कॉलेज में पढती थी, तब मैंने ही उसे रोपा था, पिता के साथ बगीचे में. पिता के कहने पर मैं उठ कर उस पेड़ तक गयी, प्यार से उसे देखा और उसके तने को जैसे ही मैंने अपने हांथों से स्पर्श किया, हजारों तरंगे मुझमें जैसे प्रवाहित होने लगीं. मैं प्यार से, संवेदना से अभिभूत हो गयी.मन आह्लादित हो उठा ख़ुशी से. कौन कहता है कि पेड़-पौधों में संवेदना नहीं होती, वो जड़ होते हैं. काश उनकी जैसी अगर एक प्रतिशत संवेदना भी हम मनुष्यों में होती तो हम भी कुछ जड़ से चेतन हो जाते. फिर ऐसी प्यार मोहब्बत संसार में रहती कि, किसी देश को सीमा और उसकी रक्षा के लिए सेना ,गोला बारूद,सैन्य संसाधनों की आश्यकता ही ना पड़ती. काश हम पेड़ों को जड़ कहना छोड़ खुद की जड़ता दूर कर पाते. खुद चेतन हो पाते. तो संसार की शक्ल आज कुछ और ही होती.


Anuradha @sai_ki_bitiya

मेहंदी रचती है और उसकी ख़ुशबू में बँध के हम चल पड़ते हैं.. लेकिन डोली में दुल्हन अकेली नहीं आती.. साथ आता हैं बाबुल की सीख का सूट्केस.. माँ की नसीहतें बहन की मोहब्बत.. और पापा के वो छुपे आँसुओं की हकलाहट .. इन सब का सूट्केस हमारे दिल में हमेशा खुला  रहता है.. 

बेटियाँ जब ससुराल के क़ीमती रेशमी सोफों पे बैठ कर पापा को याद करतीं हैं.. घर के वो पतले सख़्त गद्दे .. पुराने पतीले .. चार बार मरम्मत की हुई मेज़.. जंग लग रही टूटियों कीइतनी याद आती है .. वो भी काश इस नए घर में आ सकती .. काश पापा भी आ सकते .. 

और जब पापा आते हैं और बेटी के नए आलीशान घर को देख ख़ुद पर इतराते हैं.. तब मन होता है कि कह सकें.. पापा आप नहीं हो तो ये बस दीवारें है .. फ़र्निचर है .. यहाँ थोड़ी ही रहते हैं हम.. हम तो आप के दिल में रहते हैं .. पतले सख़्त गद्दे .. पुराने पतीले .. चारबार मरम्मत की हुई मेज़.. जंग लग रही टूटियों और आप के साथ..


 

One Comment Add yours

  1. Bahut bahut dhanyawad archanaji ko , unhone hi mujhe prerit kiya 🙏

Leave a Reply

Fill in your details below or click an icon to log in:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out / Change )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out / Change )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out / Change )

Google+ photo

You are commenting using your Google+ account. Log Out / Change )

Connecting to %s